देश में लोन बांटने के तरीके को आसान बनाने के लिए बैंक और गैरबैंकिंग वित्तीय कंपनियां मिलकर काम कर रही हैं. इस साझी व्यवस्था को वित्तीय भाषा में कोलेंडिंग कहा जाता है. इस मॉडल के जरिए दूरदराज के इलाकों तक कर्ज पहुंचाना आसान हुआ है, लेकिन इसमें टैक्स को लेकर लंबे समय से संशय बना हुआ था. अब इस उलझन को सुलझाने के लिए जीएसटी काउंसिल की फिटमेंट कमेटी ने एक बड़ा प्रस्ताव तैयार किया है. कमेटी ने सिफारिश की है कि कोलेंडिंग मॉडल में एनबीएफसी की ओर से बैंकों को दी जाने वाली सेवाओं पर 18 फीसदी जीएसटी लगाया जाए. ध्यान देने वाली बात ये है कि ये टैक्स अभी लागू नहीं हुआ है, बल्कि इसे लागू करने की तैयारी चल रही है.

कमेटी के इस कदम का मकसद वित्तीय सेक्टर में चल रहे कानूनी विवादों को खत्म करना है. आम कर्जदारों के लिए राहत की बात ये है कि मूल लोन पर लगने वाले ब्याज को टैक्स से पूरी तरह बाहर ही रखा जाएगा. यानी ग्राहकों की जेब पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा. 18 फीसदी टैक्स का ये प्रस्ताव केवल उसी सर्विस हिस्से के लिए है, जो एनबीएफसी बैंक को देती है.

कोलेंडिंग व्यवस्था पर टैक्स का नया प्रस्ताव

कोलेंडिंग व्यवस्था में बैंक और एनबीएफसी मिलकर किसी ग्राहक के लोन का पैसा जुटाते हैं. इसमें ज्यादातर पूंजी बैंक लगाता है, जबकि ग्राहक को जोड़ने, उसके दस्तावेजों की पड़ताल करने और लोन की देखरेख का काम एनबीएफसी करती है. इस पूरी प्रक्रिया से जो कुल ब्याज आता है, उसे दोनों संस्थान पहले से तय अनुपात में आपस में बांटते हैं.

इसे एक सीधे उदाहरण से समझा जा सकता है. मान लीजिए किसी ग्राहक को 16 फीसदी की मिलीजुली ब्याज दर पर लोन दिया गया. इसमें से बैंक को उसके पैसे पर 10 फीसदी ब्याज मिलना तय हुआ है. बाकी बचा 6 फीसदी हिस्सा ग्राहक लाने वाली एनबीएफसी अपने पास रख लेती है. पिछले साल इंडस्ट्री ने सरकार से पूछा था कि एनबीएफसी के पास बचे इस 6 फीसदी हिस्से को क्या माना जाए? अगर इसे ब्याज माना जाता, तो नियमों के तहत इस पर कोई टैक्स नहीं बनता. वहीं टैक्स विभाग इसे सर्विस फीस मान रहा था. इसी वजह से कंपनियों को टैक्स नोटिस मिल रहे थे. अब फिटमेंट कमेटी ने प्रस्ताव दिया है कि इसे बैंक को दी जाने वाली सेवा मानकर 18 फीसदी जीएसटी के दायरे में लाया जाए.

आरबीआई के फॉर्मूले से तय होगी सर्विस वैल्यू

फिटमेंट कमेटी ने सिर्फ टैक्स दर का सुझाव ही नहीं दिया, बल्कि ये भी तय करने की सिफारिश की है कि सर्विस की कीमत कैसे आंकी जाएगी. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इसके लिए भारतीय रिजर्व बैंक के तय दिशानिर्देशों को पैमाना बनाया जाएगा.

नियम साफ होने से टैक्स विभाग और कर्ज देने वाले संस्थानों के बीच विवाद की गुंजाइश खत्म हो जाएगी. बैंक और फिनटेक प्लेटफॉर्म बिना किसी कानूनी डर के आपस में साझीदारी कर सकेंगे. पहले सटीक नियम न होने से कंपनियों को लंबे मुकदमों का सामना करना पड़ता था. अब ग्राहक लाने, कागजी जांच और लोन रिकवरी जैसी सेवाओं की वैल्यू सीधे बैंकिंग रेगुलेटर के नियमों से तय होगी.

बैंक शाखाओं के आपसी ट्रांसफर पर बड़ी राहत

फिटमेंट कमेटी ने कोलेंडिंग के अलावा बैंकों के अपने आंतरिक कामकाज से जुड़ा एक और अहम प्रस्ताव रखा है. कई बार बैंक अपनी ही एक शाखा से दूसरी शाखा में फंड ट्रांसफर करते हैं. इस लेनदेन को बहीखातों में दर्ज करने के लिए कुछ सांकेतिक या नोशनल चार्ज लिखे जाते हैं.

काउंसिल ने प्रस्ताव दिया है कि इन आंतरिक शुल्कों को भी ब्याज की तरह ही माना जाए. ऐसा होने से इन शुल्कों पर अलग से कोई टैक्स नहीं लगेगा. बैंकों को अपनी ही शाखाओं के बीच पैसे के ट्रांसफर पर अतिरिक्त टैक्स देनदारी से बड़ी राहत मिलेगी.

जीएसटी काउंसिल की बैठक में अंतिम फैसला

फिटमेंट कमेटी ने ये तमाम सुझाव सभी संबंधित पक्षों से बातचीत के बाद तैयार किए हैं. इन सभी प्रस्तावों को विचार के लिए जीएसटी काउंसिल के सामने रखा जाएगा. काउंसिल की अगली बैठक 8 अक्टूबर को होनी तय है.

अगर जीएसटी काउंसिल इस प्रस्ताव को मंजूरी दे देती है, तो उसके बाद वित्त मंत्रालय की तरफ से औपचारिक सर्कुलर जारी किया जाएगा. तभी ये नई व्यवस्था लागू होगी. ये प्रस्ताव सरकार के उस बड़े सुधार का हिस्सा है, जिसके तहत वित्तीय सेक्टर की टैक्स से जुड़ी पुरानी कमियों को दूर किया जा रहा है.