एक छोटे बच्चे ने अपने दादाजी से पूछा, ‘दादाजी, देश की सेवा करने के लिए मुझे क्या करना चाहिए? दादाजी मुस्कुराए और बोले, पहले मेरे लिए एक गिलास पानी लेकर आओ. बच्चा दौड़कर रसोई में गया और पानी ले आया. दादाजी ने पूछा, तुमने अभी क्या किया? बच्चे ने कहा, आपको पानी दिया. क्यों? क्योंकि आपको प्यास लगी थी. दादाजी ने फिर पूछा, क्या तुमने अच्छा काम किया? बच्चे ने सिर हिलाकर हां कहा. दादाजी बोले, ‘तो तुमने देशसेवा की शुरुआत कर दी.

बच्चा हैरान हो गया. बोला, ‘लेकिन दादाजी, मैंने देश की सेवा के बारे में पूछा था, आपकी सेवा के बारे में नहीं. दादाजी मुस्कुराए और बोले, अच्छा, यह बताओ कि देश में रहते कौन हैं? शायद देशभक्ति को समझने की शुरुआत यहीं से होती है. किसी बड़े भाषण, समारोह या कठिन परिभाषा से नहीं, बल्कि प्यासे इंसान को एक गिलास पानी देने से. क्योंकि नक्शे पर दिखाई देने वाला देश सबसे पहले करोड़ों इंसानों का घर है. और शायद देश से प्यार करने से पहले हमें उसमें रहने वाले लोगों को पहचानना सीखना चाहिए.

आज़ादी के लिए जान देने वाले लोग

हमने देशभक्ति को इतना बड़ा शब्द बना दिया है कि एक साधारण इंसान को लगता है कि उसका इससे क्या संबंध. हमारे मन में सीमा पर खड़े सैनिक, आज़ादी के लिए जान देने वाले लोग, बड़े अधिकारी और देश के लिए फैसले लेने वाले नेता आते हैं. इन सबका योगदान सम्मान के योग्य है. लेकिन इस तस्वीर में हम उस साधारण आदमी और औरत को भूल जाते हैं जो हर सुबह उठते हैं, काम पर जाते हैं, थककर घर लौटते हैं और अगले दिन फिर वही करते हैं.

बिना जाने देश की सेवा कर रहे हों?

क्या हो अगर वे भी बिना जाने देश की सेवा कर रहे हों? शाम को हम बाजार से सब्जी खरीदते हैं. पैसे देते हैं और घर लौट आते हैं. लेकिन कभी सोचा है कि वह सब्जी हमारे घर तक कैसे पहुंची? कहीं एक किसान सुबह चार बजे उठा होगा. किसी ने उसके लिए खाना बनाया होगा. किसी ने खेत में पानी दिया, पौधों की देखभाल की और मौसम की चिंता की होगी. फिर किसी ने फसल काटी, किसी ने गाड़ी में लादी, कोई रात भर गाड़ी चलाकर मंडी पहुंचा और किसी ने उसे दुकान पर सजाया.

क्या यह भी देशसेवा नहीं है?

हमारे घर तक पहुंचने से पहले उस सब्जी को कितने हाथों ने छुआ होगा. किसान हमें नहीं जानता. गाड़ी चलाने वाला शायद कभी हमारे शहर नहीं आया होगा. दुकानदार कभी हमारे घर नहीं पहुंचेगा. फिर भी इन सबने हमारे परिवार के भोजन में अपना योगदान दिया. वे देशसेवा की घोषणा करके काम पर नहीं निकले थे. वे अपना परिवार पाल रहे थे. लेकिन ऐसा करते हुए हमारे परिवार का भी पेट भर रहे थे. क्या यह भी देशसेवा नहीं है?

अब उस सफाईकर्मी के बारे में सोचिए जो हमारे जागने से पहले सड़क साफ करता है. हमें साफ सड़क दिखाई देती है, लेकिन उसे साफ करने वाला इंसान अक्सर दिखाई नहीं देता. कूड़ा नहीं उठता तो शिकायत करते हैं, लेकिन सफाई हो जाती है तो शायद ध्यान भी नहीं जाता. अस्पताल में कोई मरीज की चादर बदलता है. बस चालक बच्चों को सुरक्षित स्कूल पहुंचाता है. मैकेनिक एम्बुलेंस ठीक करता है.

सभी लोग एक दिन अपना काम बंद कर दें तो क्या होगा?

मां बच्चे को सच बोलना सिखाती है. शिक्षक कमजोर विद्यार्थी को थोड़ा अतिरिक्त समय देता है. कोई अनजान व्यक्ति बुजुर्ग महिला को सड़क पार करवाता है. इन कामों पर शायद कभी पदक नहीं मिलेगा. किसी किताब में इनके नाम नहीं लिखे जाएंगे. लेकिन सोचिए, अगर ये सभी लोग एक दिन अपना काम बंद कर दें तो क्या होगा? ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। तब समझ आएगा कि हमारी जिंदगी कितने अनजान लोगों की मेहनत पर चल रही है.

यहीं एक बड़ा सवाल उठता है. आखिर देश है क्या? पहाड़, नदियाँ, शहर, गांव और सीमाएं निश्चित रूप से देश का हिस्सा हैं. लेकिन देश उन सीमाओं के भीतर रहने वाले लोगों के आपसी रिश्तों से भी बनता है. वह भरोसा, जिससे हम अनजान दुकानदार से सामान खरीदते हैं. वह संवेदना, जिससे कोई गिरे हुए व्यक्ति को उठाता है. वह ईमानदारी, जिससे ग्राहक दुकानदार के तराजू पर विश्वास करता है. देश केवल हमारे पैरों के नीचे की जमीन नहीं है. देश वह जीवन भी है, जिसे हम एकदूसरे के लिए संभव बनाते हैं.

पत्रकारिता के अपने लंबे सफर में मैंने देश को कई रूपों में देखा है. कभी बड़ी उपलब्धियां खबर बनती हैं, कभी संघर्ष, दुख, असफलता या अनिश्चितता. महत्वपूर्ण लोग बोलते हैं. फैसले होते हैं. बहस शुरू होती है और समाप्त हो जाती है. लेकिन इन सबके बाहर एक दूसरा देश चुपचाप चलता रहता है. लोग सुबह उठते हैं, बच्चों को स्कूल भेजते हैं, दुकानें खोलते हैं, काम पर जाते हैं और परिवार की देखभाल करते हैं. कैमरे बंद हो जाते हैं, लेकिन देश का जीवन नहीं रुकता.

घर में सीखी ईमानदारी सैकड़ों लोगों तक पहुंची

सबसे सुंदर बात यह है कि इनमें से बहुतसे लोगों को पता भी नहीं होता कि वे कितना बड़ा योगदान दे रहे हैं. मां जब बच्चे को ईमानदारी सिखाती है, तो वह यह नहीं सोचती कि देश बना रही है. वह केवल एक अच्छा इंसान तैयार कर रही होती है. लेकिन वही बच्चा बड़ा होकर किसी का पड़ोसी, साथी, कर्मचारी या अधिकारी बनेगा. घर में सीखी ईमानदारी सैकड़ों लोगों तक पहुंच सकती है. खाने की मेज पर दी गई छोटीसी सीख बहुत दूर तक जा सकती है.

लेकिन एक अंतर समझना जरूरी है. हर काम अपने आप देशसेवा नहीं बन जाता. ग्राहक को धोखा देने वाला दुकानदार केवल दुकान चलाने के कारण देशसेवक नहीं हो जाता. सरकारी धन का गलत इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति बड़े पद पर बैठकर देशभक्ति का दावा नहीं कर सकता. दूसरों को नुकसान पहुंचाने वाला इंसान देश के प्रति प्रेम की ऊंची बातें करके महान नहीं बन जाता. महत्वपूर्ण यह है कि हम काम कैसे करते हैं और उससे दूसरों के जीवन पर क्या असर पड़ता है.

सही पैसे लौटाने वाला दुकानदार, स्कूल बनाते समय खराब सामान इस्तेमाल करने से इनकार करने वाला मजदूर, गरीब और अमीर के साथ समान व्यवहार करने वाला अधिकारी और ईमानदारी से अपना कर चुकाने वाला नागरिक, ये सभी अपने आचरण से समाज को मजबूत करते हैं. देशभक्ति केवल हमारे पद से नहीं, हमारे व्यवहार से भी पहचानी जाती है.

हम अपने देश से प्यार करते हैं?

अब सवाल थोड़ा और भीतर उतरता है. हमें बारबार यह साबित करने की जरूरत क्यों महसूस होती है कि हम अपने देश से प्यार करते हैं? हम चाहते हैं कि लोग हमारी भावनाएं देखें और हमें अच्छा नागरिक मानें. कोई हमारी सोच से असहमत हो तो हमें बुरा लग सकता है. लेकिन दो लोग एक ही देश से प्यार करते हुए भी उसके भविष्य के बारे में अलग राय रख सकते हैं. मातापिता भी बच्चे के भविष्य पर असहमत होते हैं.

इसका मतलब यह नहीं कि कोई एक बच्चे से कम प्यार करता है. प्रेम का अर्थ हमेशा सहमति नहीं होता. कभीकभी प्रेम कठिन सवाल भी पूछता है. क्या मैं उस नागरिक का सम्मान कर सकता हूं जिसकी राय मुझसे अलग है? क्या उसके अधिकार मेरे अधिकारों जितने ही महत्वपूर्ण हैं? क्या मैं उस व्यक्ति के साथ भी न्याय कर सकता हूं, जिसे मैं पसंद नहीं करता? हमारा संविधान हम भारत के लोग से शुरू होता है. कितने सरल और गहरे शब्द हैं.

नागरिक का सम्मान

शुरुआत किसी शक्तिशाली व्यक्ति, अमीर परिवार या बड़े पद से नहीं होती. शुरुआत हम सब से होती है. इस देश में रहने वाले नागरिक अपने ही देश में मेहमान नहीं हैं. भाषा, धर्म, विचार, धन या रहनसहन अलग होने से किसी नागरिक का सम्मान कम नहीं हो जाता. कल्पना कीजिए, दो पड़ोसी हैं. पहला हर दिन देशप्रेम की बड़ीबड़ी बातें करता है. हर समारोह में जाता है और अपनी देशभक्ति दिखाता है. लेकिन अपने कर्मचारियों से बुरा व्यवहार करता है, मौका मिलने पर धोखा देता है और बिना स्वार्थ किसी की मदद नहीं करता.

दूसरा पड़ोसी देशभक्ति पर बहुत कम बोलता है. वह अपने कर्मचारियों को उचित मेहनताना देता है, आसपास सफाई रखता है, जरूरतमंदों की मदद करता है और बच्चों को दूसरों का सम्मान करना सिखाता है.

देशभक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन गलत

दोनों में देश की सेवा कौन ज्यादा कर रहा है? इसका मतलब यह नहीं कि देशभक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन गलत है. उससे लोगों को प्रेरणा मिल सकती है. लेकिन उसका असली अर्थ तब बढ़ता है जब हमारा रोजमर्रा का व्यवहार भी वही बातें कहता है. शायद हमने लोगों से यह पूछने में बहुत समय लगाया कि वे देश से कितना प्यार करते हैं, लेकिन यह पूछना भूल गए कि वह प्यार उनकी जिंदगी में दिखाई कहां देता है.

इस बात को अपने जीवन से जोड़कर देखिए. आपका भोजन किसने उगाया? घर तक बिजली किसने पहुंचाई? आपको सुरक्षित मंजिल तक कौन लेकर गया? अस्पताल में आपके किसी अपने की देखभाल करने में किन लोगों का हाथ था? मुश्किल समय में किस अनजान व्यक्ति ने मदद की? शायद आप उनके नाम नहीं जानते और वे आपका नाम नहीं जानते. फिर भी उनके जीवन का एक हिस्सा आपके जीवन से जुड़ा हुआ है. हम अलगअलग होकर भी पूरी तरह अलग नहीं हैं. जानेअनजाने एकदूसरे का सहारा बनकर जी रहे हैं. यही विचार सफलता का अर्थ भी बदल देता है.

मेरे होने से किसका जीवन थोड़ा बेहतर हुआ?

हम वर्षों तक पैसा कमाने, बड़ा पद पाने और पहचान बनाने में लगे रहते हैं. इसमें कुछ गलत नहीं है. लेकिन जिंदगी के किसी मोड़ पर एक दूसरा सवाल उठता है. मैंने जो कुछ पाया, उसके अलावा मेरे होने से किसका जीवन थोड़ा बेहतर हुआ? यह सवाल पांच साल के बच्चे और 95 साल के बुजुर्ग, दोनों का है. बच्चा सोच सकता है कि उसने अपना खाना बांटा या दोस्त की मदद की. बड़ा इंसान सोच सकता है कि उसने ईमानदारी से जिम्मेदारी निभाई या नहीं. बुजुर्ग पीछे मुड़कर उन लोगों को याद कर सकता है जिनकी जिंदगी उसने थोड़ी आसान बनाई.

आज रात सोने से पहले अपने दिन को थोड़ा अलग तरीके से याद कीजिए. केवल यह मत गिनिए कि कितना कमाया, कितना काम किया या कितनी तारीफ मिली. वह एक पल याद कीजिए जब आपके कारण किसी को थोड़ा सहारा मिला. शायद आपने धैर्य से किसी की बात सुनी. अपना काम ठीक से किया. गलत फायदा उठाने से इनकार किया. या किसी ऐसे व्यक्ति की मदद की जो बदले में आपको कुछ नहीं दे सकता था. करोड़ों लोगों के देश में यह बहुत छोटी बात लग सकती है. लेकिन करोड़ों लोगों का देश ऐसी ही करोड़ों छोटी बातों से बनता है.

बच्चे की ईमानदारी कितने लोगों के काम आई

किसान कभी नहीं जान पाएगा कि उसके उगाए अन्न से कितने बच्चों का पेट भरा. सफाईकर्मी उन सभी लोगों से नहीं मिलेगा जो उसकी साफ की हुई सड़क पर चलते हैं. मां शायद कभी नहीं देख पाएगी कि उसके बच्चे की ईमानदारी कितने लोगों के काम आई. और सड़क पार कराने वाला व्यक्ति शायद उस बुजुर्ग महिला से दोबारा कभी न मिले. लेकिन इससे उनके किए अच्छे काम का महत्व कम नहीं होता.

बिना जाने देशभक्त बनने का मौका?

शायद देशभक्ति की सबसे सुंदर बात यही है. इसे हमेशा पहनकर दिखाना, ऊंची आवाज में कहना या दुनिया के सामने साबित करना जरूरी नहीं. कई बार यह हमारे जीने के तरीके में होती है. हमारे काम में, हमारी ईमानदारी में, दूसरों के प्रति हमारे व्यवहार में और उस मदद में जिसके बदले हम कुछ नहीं चाहते. दादाजी के लिए लाया गया एक गिलास पानी पूरे देश को नहीं बदल सकता था. लेकिन उस बच्चे ने एक ऐसी बात समझनी शुरू कर दी थी जो आगे चलकर लोगों के प्रति उसका पूरा व्यवहार बदल सकती थी. अगर देश की सेवा की शुरुआत उसमें रहने वाले इंसानों की परवाह करने से होती है, तो आज हमने कितनी बार बिना जाने देशभक्त बनने का मौका पाया?