Himachal Se: रामपुर । हिमाचल प्रदेश के शिमला जिला के रामपुर उपमंडल में सतलुज नदी पर बना एक पुल अब लोगों के लिए सुविधा नहीं बल्कि “मौत का रास्ता” बनता जा रहा है। ग्राम पंचायत क्याव के पास स्थित यह पुल वर्षों पुरानी बाढ़ के बाद से लगातार कमजोर होता गया, लेकिन लोक निर्माण विभाग की कथित लापरवाही के चलते आज तक इसका स्थायी समाधान नहीं हो पाया। अब हालात ऐसे हैं कि पुल एक तरफ झुक चुका है और ग्रामीण हर दिन डर के साये में इसे पार करने को मजबूर हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार कई साल पहले सतलुज में आई भीषण बाढ़ ने पुल की नींव को भारी नुकसान पहुंचाया था। उस समय विभाग ने अस्थायी मरम्मत कर पुल को दोबारा चालू तो कर दिया, लेकिन समय के साथ इसकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई। अब पुल के नीचे की जमीन खिसक चुकी है और संरचना में भी दरारें साफ दिखाई देने लगी हैं। बरसात नजदीक आते ही ग्रामीणों की चिंता और बढ़ गई है।
ग्रामीणों का कहना है कि यह पुल बड़बोन, पा, अन्ना, कूट, सुरू समेत कई गांवों की जीवनरेखा है। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। स्कूली बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और पशुपालक रोजाना इसी रास्ते से गुजरते हैं। बरसात के दौरान जब वैकल्पिक रास्ते बंद हो जाते हैं, तब यही पुल लोगों की मजबूरी बन जाता है। लोगों का आरोप है कि पुल से गुजरते समय कई बार कंपन महसूस होता है, जिससे किसी बड़े हादसे का डर लगातार बना रहता है।
सिर्फ पुल ही नहीं, गानवीक्यावकूट प्रधानमंत्री सड़क की हालत को लेकर भी ग्रामीणों में भारी नाराजगी है। सड़क कई जगह बेहद संकरी है और सुरक्षा के लिए क्रैश बैरियर तक नहीं लगाए गए हैं। हाल ही में क्षेत्र में हुए सड़क हादसे में एक युवक की मौत के बाद लोगों का गुस्सा और भड़क गया है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते सड़क और पुल की मरम्मत कर दी जाती, तो कई हादसों को रोका जा सकता था।
स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि वे कई बार लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों से मिल चुके हैं। पत्र लिखे गए, ज्ञापन दिए गए और प्रतिनिधिमंडल भी भेजे गए, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला। लोगों का कहना है कि अब हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।
ग्रामीणों ने सरकार और प्रशासन से पुल की तत्काल तकनीकी जांच करवाने और इसके पुनर्निर्माण की मांग की है। लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो क्षेत्र के लोग आंदोलन और जनसंघर्ष का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।