कल मैंने राहत इंदौरी का एक वीडियो क्लिप सुना. उसे सुनकर मैं इतना भावुक हो गया कि मैंने उसे दोबारा सुना. शुरुआत में मेरे चेहरे पर मुस्कान थी. वे अपने जानेपहचाने अंदाज में एक किस्सा सुना रहे थे. किसी ने उन्हें जिहादी कह दिया था और वे मजाक में बता रहे थे कि पूरी रात सोचते रहे कि आखिर उन्होंने ऐसा क्या कर दिया कि जिंदगी के इतने साल गुजर जाने के बाद उन्हें अपनी एक नई पहचान का पता चला. लेकिन धीरेधीरे उनके शब्दों से मजाक गायब होने लगा और उनकी आवाज में कुछ बहुत गहरा उतर आया.

अब यह किसी आरोप का जवाब देते हुए एक शायर की बात नहीं रह गई थी. यह उम्र गुजार चुका एक इंसान था, जो एक बहुत छोटासा सवाल पूछ रहा था. पूरी जिंदगी एक देश में जी लेने के बाद भी किसी इंसान को कितनी बार बताना पड़ता है कि यही उसका घर है? और फिर उनकी बात उस यादगार शेर तक पहुंचती है, मैं जब मर जाऊं, मेरी अलग पहचान लिख देना, लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना.

अपने ही घर से अपना रिश्ता

उस शेर को सुनने के बाद मैं बहुत देर तक उसके बारे में सोचता रहा. हिन्दुस्तान शब्द के बारे में नहीं, बल्कि पहचान के बारे में. पांच साल का बच्चा सुबह उठकर यह नहीं सोचता कि जिस घर में वह रहता है, वह उसका घर है भी या नहीं. वह बस उस घर के कमरों में दौड़ता है. उसे मालूम है पानी कहां रखा है. उसे पता है अंधेरे में घर का कौनसा कोना उसे डराता है. वह रसोई की खुशबू पहचानता है. अभी तक किसी ने उसे यह नहीं सिखाया कि एक दिन उसे अपने ही घर से अपना रिश्ता समझाना पड़ सकता है. शायद इस कहानी की पहली परत यही है. घर तब तक बहुत स्वाभाविक लगता है, जब तक कोई हमसे यह न पूछ ले कि साबित करो, यह तुम्हारा घर है.

मैं कैसे मान लूं कि यह तुम्हारा घर है?

फिर इसकी दूसरी परत खुलती है. जब कोई ऐसी चीज, जिसे हमने पूरी जिंदगी अपना माना हो, अचानक सवाल बन जाए, तो हमारे भीतर क्या होता है? सोचिए, एक बूढ़ा आदमी उस घर के बाहर खड़ा है जिसमें वह 60 साल से रह रहा है. कोई उससे पूछता है, मैं कैसे मान लूं कि यह तुम्हारा घर है? वह कागज दिखा सकता है. लेकिन कागज निकालने से पहले उसके भीतर कुछ और घटता है. एक बहुत छोटीसी चोट लगती है. इसलिए नहीं कि किसी व्यवस्था में जांच या कागज की जरूरत नहीं होनी चाहिए. समाज नियमों और रिकॉर्ड से भी चलता है.

क्या तुम मुझे पहचान नहीं पाए?

चोट कहीं और लगती है. उसके भीतर शायद एक सवाल उठता है, इतने साल बाद भी क्या तुम मुझे पहचान नहीं पाए? हम अपनी उम्र प्रमाणपत्र से साबित कर सकते हैं, पता किसी दस्तावेज से बता सकते हैं. लेकिन बचपन की बारिश की खुशबू कैसे साबित करेंगे? वह भाषा कैसे साबित करेंगे, जिसमें पहली बार रोए थे? वह गली कैसे साबित करेंगे जहां चलना सीखा था? और वह मिट्टी कैसे साबित करेंगे जिसमें एक दिन मिल जाना है?

फिर मैं इसकी तीसरी परत तक पहुंचा और वह थोड़ी असहज करने वाली थी. सवाल केवल यह नहीं है कि जब मेरी पहचान पर शक किया जाए तो मुझे कैसा लगेगा. उससे कठिन सवाल यह है कि जब मैं किसी दूसरे की पहचान पर शक करता हूं, तब मेरे भीतर क्या हो रहा होता है? मान लीजिए दो लोग 40 साल से एक ही गली में रहते हैं. उनकी प्रार्थनाएं अलग हैं. खाना अलग है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। नाम अलग सुनाई देते हैं. एक सुबह उनमें से एक को लगने लगता है कि दूसरे को अब अपने बारे में सफाई देनी चाहिए. हो सकता है दूसरे इंसान में कुछ भी न बदला हो. बदलाव पहले इंसान की नजर में आया हो. दुनिया को एक परिवार मानने की पुरानी सीख की असली परीक्षा किताबों में नहीं, हमारे अपने मोहल्ले में होती है.

‘दूर से देश बहुत बड़ा दिखाई देता है’

पत्रकारिता के अपने वर्षों में मैंने एक बात महसूस की है. दूर से देश बहुत बड़ा दिखाई देता है. नक्शे में उसकी सीमाएं होती हैं. भाषणों में बड़ेबड़े शब्द होते हैं. लेकिन जमीन पर देश बहुत साधारण लोगों से बनता है. दफ्तर के बाहर चाय बेचने वाला, नीचे इंतजार करता ड्राइवर, गलियारा साफ करती महिला, देर रात घर लौटता रिपोर्टर और फोन करके पूछती मां, खाना खा लिया? ये लोग लगभग हर बात पर एकदूसरे से अलग हो सकते हैं, फिर भी हर व्यक्ति अपने भीतर उसी देश का एक छोटासा हिस्सा लेकर चलता है. देश केवल जमीन नहीं होता. वह करोड़ों लोगों की निजी यादों का एक साथ रहना भी होता है.

कहानी जरूर सुनी जानी चाहिए

यह फर्क समझना भी जरूरी है कि किसी का नाम मतदाता सूची से हट जाना अपनेआप उसकी नागरिकता खत्म हो जाना नहीं है. दोनों अलग बातें हैं. लेकिन यदि किसी योग्य मतदाता का नाम गलत तरीके से बाहर हो जाए, तो उसकी कहानी जरूर सुनी जानी चाहिए. सवाल केवल यह नहीं कि किसी सूची या कंप्यूटर से एक नाम गायब कैसे हुआ. सवाल यह भी है कि उस इंसान के भीतर क्या हुआ जिसका नाम गायब हुआ. उसे गुस्सा आया? डर लगा? अपमान महसूस हुआ? या उसने रिकॉर्ड ठीक कराया और आगे बढ़ गया? इसका जवाब हमें उसकी ओर से तय नहीं करना चाहिए. हमें उससे पूछना चाहिए.

किसी दूसरे इंसान से सबूत मांगना आसान

शायद उस शायर की बात मुझे आखिर में बाहर की दुनिया से वापस अपने भीतर ही ले आई. किसी दूसरे इंसान से सबूत मांगना आसान है. मुश्किल है अपने भीतर बैठी उस अदृश्य अदालत को देखना, जहां हम हर दिन तय करते रहते हैं कि कौन अपना है और कौन दूसरा. शायद नागरिक होने का सबसे गहरा अर्थ वहीं से शुरू होता है. किसी दूसरे से उसके प्रेम का प्रमाण मांगने से नहीं, बल्कि खुद से यह पूछने से कि हमें उसके प्रेम पर शक क्यों हुआ.

हमें क्यों लगा कि यह घर उससे ज्यादा हमारा है?

राहत इंदौरी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका वह शेर इसलिए जीवित है क्योंकि उसमें छिपा सवाल किसी एक समय या बहस से बड़ा है. एक दिन हमारे कागज, पद, मतभेद और सारी निश्चितताएं यहीं रह जाएंगी. मिट्टी हमें अपने भीतर लेने से पहले हमारा नाम नहीं पूछेगी. किसी दूसरे से यह साबित करने को कहने से पहले कि यह उसका भी घर है, क्या हमने कभी खुद से पूछा है कि हमें क्यों लगा कि यह घर उससे ज्यादा हमारा है?