धर्मशाला। हिमाचल प्रदेश की सियासत ने अपने एक ऐसे कद्दावर और बेबाक नेता को खो दिया है, जिनका नाम भारतीय लोकतंत्र के एक बेहद दिलचस्प और अनूठे रिकॉर्ड के साथ दर्ज है। विजय सिंह मनकोटिया सिर्फ अपने तीखे और बागी तेवरों के लिए ही नहीं, बल्कि इस बात के लिए भी हमेशा याद किए जाएंगे कि अपने दशकों लंबे और सफल सियासी सफर में उन्होंने कभी खुद को वोट नहीं दिया। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। सुनने में यह भले ही हैरान करने वाला लगे, लेकिन मेजर मनकोटिया के इस अनोखे रिकॉर्ड के पीछे भौगोलिक और कानूनी वजह थी। दरअसल उनका पैतृक निवास स्थान तियारा गांव में था, जो पड़ोसी कांगड़ा विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता था।

इसी कारण उनका नाम हमेशा कांगड़ा सीट की मतदाता सूची में दर्ज रहा, लेकिन वह चुनाव शाहपुर से लड़ते थे और मतदान करने कांगड़ा जाते थे। अपने खुद के एक वोट के बिना भी वे 1982, 1985, 1990, 1993 और 2003 में भारी मतों से जीतकर विधानसभा पहुंचे। दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के साथ उनका मनमुटाव हमेशा सुर्खियों में रहा। वीरभद्र सरकार में मंत्री रहते हुए भी, जब उन्हें व्यवस्था में खामी दिखी, तो उन्होंने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने में संकोच नहीं किया।

सत्ता की मलाई नहीं, अपनी शर्तों पर की राजनीति

मेजर मनमोटिया सियासी सफरनामा कभी किसी एक दल की चौखट तक सीमित नहीं रहा। वह एक ऐसे जननेता थे, जिन्होंने सत्ता की मलाई खाने के बजाय हमेशा अपनी शर्तों पर राजनीति की। कांग्रेस से बगावत के बाद उन्होंने वीपी सिंह के जनमोर्चा और जनता दल का हिमाचल में नेतृत्व किया। 2007 में उन्होंने बसपा के टिकट पर धर्मशाला से भी चुनाव लड़ा। 2022 के विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया था। आज भले ही वे इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हिमाचल के इतिहास में उनकी यह अनूठी कहानी हमेशा जीवंत रहेगी कि कैसे एक जननेता ने जनता के दिलों पर राज किया।