वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में, भारत ने कच्चे तेल के आयात के लिए लगभग 29 अरब डॉलर यानी 2.75 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त भुगतान किया. जबकि आयात की गई मात्रा एक साल पहले के लगभग बराबर ही थी. इससे पता चलता है कि देश के ऊर्जा बिल में बढ़ोतरी का मुख्य कारण आयात की मात्रा में वृद्धि नहीं, बल्कि ग्लोबल लेवल पर कच्चे तेल की कीमतों में आया भारी उछाल था. पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैलसितंबर के दौरान कच्चे तेल का आयात बिल एक साल पहले के 61.9 अरब डॉलर से बढ़कर 90.6 अरब डॉलर हो गया. वहीं, आयात की मात्रा 1 फीसदी से भी कम बढ़कर 122.7 मिलियन टन रही.

कितना और कैसे हुआ ज्यादा खर्च
असल में, भारत ने कच्चे तेल की लगभग उतनी ही मात्रा आयात की, लेकिन हर बैरल के लिए काफी अधिक कीमत चुकाई. रुपए के हिसाब से देखें तो, देश ने केवल छह महीनों में कच्चे तेल के आयात पर 8.53 लाख करोड़ रुपए खर्च किए. पहली छमाही का यह बिल पूरे वित्त वर्ष 2026 के 125.8 अरब डॉलर के कुल आयात बिल का लगभग 72% है, जो कीमतों में आए इस बड़े झटके के पैमाने को दर्शाता है. यह बढ़ा हुआ आयात बिल तब आया है, जब देश के भीतर फ्यूल की डिमांड में नरमी देखी गई है. अप्रैलसितंबर के दौरान पेट्रोलियम उत्पादों की खपत पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 3.3% घटकर 114.8 मिलियन टन रह गई. इससे साफ होता है कि इंपोर्ट कॉस्ट में बढ़ोतरी का मुख्य कारण कीमतों में उछाल था, न कि मांग में कोई भारी वृद्धि.
पहली और दूसरी तिमाही मेंं अंतर साफ
छह महीनों के इन आंकड़ों में दो बिल्कुल अलगअलग तिमाहियों की स्थिति भी दिखती है. सबसे बड़ा झटका अप्रैलजून में लगा, जब पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गईं. PPAC के आंकड़ों के अनुसार, पहली तिमाही में भारत का कच्चे तेल आयात बिल पिछले साल के मुकाबले 61 फीसदी बढ़कर 49.8 अरब डॉलर हो गया, जबकि आयात की मात्रा घटकर 59.8 मिलियन टन रह गई थी.
जुलाईसितंबर के दौरान यह दबाव कुछ कम हुआ. पहली छमाही और पहली तिमाही के आंकड़ों के आधार पर, भारत ने दूसरी तिमाही में कच्चे तेल पर लगभग 40.8 अरब डॉलर खर्च किए. यह पिछली तिमाही के मुकाबले करीब 9 अरब डॉलर कम है, जबकि इस दौरान आयात बढ़कर लगभग 62.9 मिलियन टन हो गया था. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इसका मतलब यह है कि भारत ने Q1 की तुलना में Q2 में अधिक कच्चे तेल का आयात किया, लेकिन इसके लिए कम भुगतान किया, क्योंकि वित्त वर्ष की शुरुआत में कीमतों में आया भारी उछाल अब कुछ कम हो गया था.
सितंबर में बढ़ा बिल
सितंबर में यह राहत फिर से खत्म होने लगी. इस महीने भारत ने 21.7 मिलियन टन कच्चे तेल का आयात किया, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 6.6% अधिक है. लेकिन, आयात बिल एक साल पहले के 10.5 बिलियन डॉलर से बढ़कर 15.4 बिलियन डॉलर हो गया. ऐसा वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में फिर से आए उछाल के कारण हुआ. सितंबर में भारतीय कच्चे तेल की बास्केट की औसत कीमत 116.09 डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि एक साल पहले यह 69.61 डॉलर प्रति बैरल थी. ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत 116.77 डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि पिछले साल सितंबर में यह 68.02 डॉलर थी.
बाहरी खातों पर बुरा असर
भारत कीमतों में होने वाले ऐसे उतारचढ़ाव से काफी प्रभावित होता है, क्योंकि देश में खपत होने वाले हर 10 बैरल कच्चे तेल में से लगभग 9 बैरल का आयात किया जाता है. अप्रैलसितंबर के दौरान कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता 88.1% रही. वहीं, घरेलू स्तर पर कच्चे तेल का उत्पादन पिछले साल की इसी अवधि के 14.2 मिलियन टन से घटकर 13.7 मिलियन टन रह गया. कच्चे तेल की अधिक लागत का असर देश के बाहरी खातों पर भी पड़ रहा है. अप्रैलसितंबर के दौरान भारत का नेट तेल और गैस आयात बिल एक साल पहले के 60.2 बिलियन डॉलर से बढ़कर 81.1 बिलियन डॉलर हो गया. देश के कुल वस्तु आयात में पेट्रोलियम आयात का हिस्सा 22.7% रहा, जबकि पिछले साल की इसी अवधि में यह 19.5% था.
इकोनॉमी पर पड़ रहा है असर
इस दबाव का असर व्यापक अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है. वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में भारत का चालू खाता घाटा बढ़कर 4.2 बिलियन डॉलर हो गया, जो एक साल पहले 3.4 बिलियन डॉलर था. ऊर्जा की बढ़ती लागत के कारण आयात का बोझ और बढ़ गया है. इस सेक्टर पर नजर रखने वाले एक विश्लेषक ने कहा कि भारत के लिए मुख्य जोखिम बिल्कुल स्पष्ट है: देश को अपना क्रूड बिल तेज़ी से बढ़ाने के लिए बहुत ज़्यादा तेल आयात करने की जरूरत नहीं है. घरेलू उत्पादन में गिरावट और आयात पर 88% से ज्यादा की निर्भरता को देखते हुए, इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इससे बहुत जल्दी व्यापार बिल बढ़ सकता है, चालू खाते पर दबाव आ सकता है और पूरी अर्थव्यवस्था में लागत बढ़ सकती है.



