
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान दिए गए एक बयान को लेकर इन दिनों सियासी और सामाजिक गलियारों में जबरदस्त भूचाल आया हुआ है. ब्रिटेन में मौजूद बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने इस पूरे विवाद पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए तीखी और दो-टूक सफाई दी है. दरअसल, लिलुआ में आयोजित कथा के दौरान उन्होंने पंडालों और दुर्गा पूजा के आसपास मांस के सेवन और बलि प्रथा को लेकर कुछ टिप्पणियां की थीं, जिसके बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक हलकों तक में बवाल मच गया था. पंडित धीरेंद्र शास्त्री ने ब्रिटेन से ही अपनी सफाई में स्पष्ट किया है कि उनके बयानों का गलत मतलब निकाला गया है और सनसनी फैलाने के लिए बातों का अनर्थ किया गया है. उन्होंने दो टूक कहा कि वे किसी के भी खान-पान या जीने की स्वतंत्रता पर पाबंदी लगाने का कोई अधिकार नहीं रखते हैं, लेकिन एक धर्मगुरु होने के नाते धर्म और शास्त्रों की बात कहना उनका कर्तव्य है, जिसे वे आगे भी पूरी बेबाकी के साथ निभाते रहेंगे.
मां कभी बेटे की बलि नहीं मांगती, स्वाद के लिए होती है हिंसा
बलि प्रथा पर खुलकर बोलते हुए धीरेंद्र शास्त्री ने बेहद तीखा और बड़ा बयान दिया है. उन्होंने सवालिया अंदाज में कहा कि वो भला कैसी मां है जो अपने ही मासूम बेटे की बलि मांगेगी? यदि किसी मां को बलि चाहिए भी होगी तो वह खुद ले लेंगी, इंसान उसे काटने वाला कौन होता है? उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जो लोग जीव-जंतुओं की बलि दे रहे हैं या मांस काट रहे हैं, वे किसी देवी या परंपरा के लिए नहीं बल्कि केवल अपने चटपटे स्वाद के लिए जीव हत्या कर रहे हैं. शास्त्री ने दलील दी कि हर जीव को इस धरती पर जीने का पूरा हक है क्योंकि कण-कण में और हर जीव में भगवान शिव का वास माना गया है.
हम किसी के खाने पर पाबंदी नहीं लगाते, अहिंसा का पाठ पढ़ाना हमारा धर्म
अपने ऊपर लग रहे तमाम आरोपों का खंडन करते हुए धीरेंद्र शास्त्री ने कहा कि उनकी आदत कभी भी किसी के पहनावे या खान-पान की शैली पर उंगली उठाने की नहीं रही है. उन्होंने बंगाल की कथा का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने सिर्फ इतनी सी बात कही थी कि दुर्गा पूजा के पावन पंडालों के आसपास पवित्रता और शुद्धता का माहौल बनाए रखा जाना चाहिए और कम से कम पंडाल के नीचे मांस का सेवन नहीं होना चाहिए. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिन्हें खाना है, वे अपने घरों में जाकर खाएं, वे किसी को रोकने वाले कोई नहीं होते हैं.
विवेकानंद और परमहंस की भूमि है बंगाल, शास्त्र की बात कहना हमारा फर्ज
खुद को भारत और बंगाल की महान संस्कृति का हिस्सा बताते हुए उन्होंने कहा कि वे स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस के आदर्शों को मानने वाले लोग हैं. वे बंगाल की सांस्कृतिक विरासत का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन एक धार्मिक गुरु होने के नाते जीव हिंसा के खिलाफ आवाज उठाना उनका शास्त्र-सम्मत कर्तव्य है. उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में यह भी साफ कर दिया कि बलि प्रथा और हिंसा के खिलाफ बोलना उनका काम है, अब चाहे किसी को यह बात अच्छी लगे या बुरी, वे अपनी बात पर पूरी तरह कायम रहेंगे और सच्चाई कहते रहेंगे.



