भारत के अंतिम मुगल बादशाह के रूप में बहादुर शाह ज़फ़र का नाम लिया जाता है. उनका पूरा नाम मिर्ज़ा अबू ज़फ़र सिराजुद्दीन मुहम्मद बहादुर शाह था. उन्होंने 28 सितंबर 1837 को दिल्ली की सल्तनत संभाली थी. तब अंग्रेजों का प्रभाव बढ़ चुका था. मुगल सल्तनत कमजोर हो चली थी या यूं कहिए कि नाममात्र ही बची थी. बातबात में बादशाह को अंग्रेजों की शरण लेनी पड़ती. साहित्य में रुचि रखने की वजह से अनेक साहित्यकारों का बहादुर शाह जफर के पास आनाजाना था.

वे अकेले मुगल बादशाह थे, जो अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व किया. वे बादशाह होने के साथसाथ शायर भी थे. उनकी शायरी में उदासी, बिछोह, समय की नश्वरता और अपने वतन से प्रेम की झलक मिलती है. देखिए, एक झलक.
कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कूएयार में
इन दो लाइनों में उनका अपने प्रिय वतन में दफन होने की इच्छा और उससे दूर रह जाने का दर्द सामने आता है. ज़फ़र का जीवन ऐसे दौर में बीता, जब मुगल सल्तनत की ताकत बहुत कम हो चुकी थी. एक समय मुगल बादशाहों का शासन बड़े भूभाग पर था. लेकिन उन्नीसवीं सदी तक उनकी सत्ता दिल्ली और लाल किले तक सिमट गई थी. असली ताकत धीरेधीरे अंग्रेजों के हाथों में जा चुकी थी.
बहादुर शाह जफर. फोटो: Getty Images
शायरी से यूं ही नहीं जुड़ा नाम
बहादुर शाह ज़फ़र को उर्दू शायरी से गहरा लगाव था. वे खुद भी शेर और ग़ज़लें लिखते थे. ज़फ़र उनका तख़ल्लुस था. तख़ल्लुस वह नाम होता है, जिसे शायर अपनी रचनाओं में इस्तेमाल करता है. ज़फ़र के दौर में दिल्ली साहित्य और शायरी का बड़ा केंद्र थी. उनके दरबार में कई नामी शायर आते थे. मिर्ज़ा ग़ालिब और शेख़ इब्राहिम ज़ौक़ जैसे कवियों का नाम भी उस समय के साहित्यिक माहौल के साथ जुड़ता है. ज़फ़र ने शायरी को केवल मनोरंजन नहीं माना. यह उनके लिए अपने मन की बात कहने का माध्यम भी थी. उनकी रचनाओं में खुशी से अधिक दर्द और बिछोह दिखाई देता है.
देखिए उनका एक और शेर.
लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलमएनापायेदार में
उनके जीवन में सत्ता का कमजोर होना, 1857 का विद्रोह, गिरफ्तारी और देश से दूर निर्वासन जैसे दुखद मोड़ आए. इस पृष्ठभूमि में उनकी शायरी को पढ़ने पर वतन और पहचान की चिंता साफ महसूस होती है. ज़फ़र से जोड़ी जाने वाली एक मशहूर ग़ज़ल में उजड़े हुए घर और दुनिया की अस्थिरता का भाव है.
28 सितंबर 1837 को संभाली थी गद्दी
बहादुर शाह ज़फ़र के पिता अकबर शाह द्वितीय थे. पिता की मृत्यु के बाद 28 सितंबर 1837 को ज़फ़र ने मुगल गद्दी संभाली. उस समय वे लगभग 62 वर्ष के थे. उनकी ताजपोशी के साथ मुगल शासन का नाम तो कायम रहा, लेकिन बादशाह की वास्तविक राजनीतिक शक्ति बहुत सीमित थी. दिल्ली में अंग्रेज़ों का प्रभाव बढ़ चुका था. बादशाह को कई अहम फैसलों में अंग्रेज़ अधिकारियों की दखलंदाज़ी का सामना करना पड़ता था.
मुगलों का लाल किला. फोटो: Pexels
उनके पास विशाल सेना या बड़ा खजाना नहीं था. वे अपने पूर्वजों की तरह पूरे भारत पर शासन नहीं कर सकते थे. इस कारण उनका शासन अधिकतर प्रतीकात्मक बनकर रह गया. फिर भी मुगल बादशाह की उपाधि का लोगों के मन में महत्व था. दिल्ली का लाल किला और बादशाह का नाम उस पुराने शासन की याद दिलाते थे. जफर की दो लाइनें और देखिए, जइसमें विरह भी है, उदासी भी है और एक अलग तरह का भाव भी.
उम्रएदराज़ मांग के लाए थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए, दो इंतज़ार में
1857 का विद्रोह और ज़फ़र की भूमिका
1857 में जब सैनिकों ने अंग्रेज़ों के खिलाफ विद्रोह किया तो उन्होंने बाहदूर शाह जफर को आंदोलन का नेतृत्व करने की अपील की. मेरठ से शुरू हुआ विद्रोह जब दिल्ली पहुंचा तब बहादुर शाह जफर बुजुर्ग हो चले थे. उनके पास विद्रोह को चलाने के लिए मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था नहीं थी. फिर भी उन्होंने विद्रोहियों की मांग स्वीकार की. कई जगहों पर विद्रोहियों और अंग्रेज़ी सेना के बीच संघर्ष हुआ.
अलगअलग समूहों के अपने उद्देश्य और योजनाएं थीं. उनके बीच तालमेल बनाए रखना कठिन था. अंग्रेज़ों के पास बेहतर संसाधन और सैन्य ताकत थी. धीरेधीरे उन्होंने विद्रोह को दबा दिया. सितंबर 1857 में अंग्रेज़ों ने दिल्ली पर फिर से नियंत्रण कर लिया. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। ज़फ़र ने हुमायूं के मकबरे में शरण ली. अंग्रेज़ अधिकारी विलियम हॉडसन ने उन्हें गिरफ्तार किया. बाद में उनके बेटों मिर्ज़ा मुग़ल और मिर्ज़ा ख़िज़्र सुल्तान तथा पोते अबू बकर की हत्या कर दी गई. इस घटना ने ज़फ़र के जीवन को और भी दुख से भर दिया. वे लिखते हैं
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहां है दिलएदाग़दार में
बहादुर शाह जफर. फोटो: Getty Images
इस तरह हुआ मुगल शासन का अंत
गिरफ्तारी के बाद अंग्रेज़ों ने ज़फ़र पर मुकदमा चलाया. उन पर विद्रोह में शामिल होने और अंग्रेज़ी सत्ता के खिलाफ काम करने के आरोप लगाए गए. मुकदमे के बाद उन्हें भारत से दूर भेजने का फैसला किया गया. 1858 में बहादुर शाह ज़फ़र को रंगून भेज दिया गया. रंगून उस समय बर्मा में था. आज वह स्थान म्यांमार के यांगून नाम से जाना जाता है. ज़फ़र के निर्वासन के साथ मुगल शासन की बचीखुची राजनीतिक पहचान भी समाप्त हो गई. 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन खत्म करके भारत का शासन सीधे ब्रिटिश राज के अधीन कर दिया गया. इस तरह मुगल बादशाहत का अंत केवल एक व्यक्ति की हार नहीं थी. यह भारत में मुगल सत्ता के अंतिम अध्याय का अंत था.
रंगून में बीते आखिरी दिन
रंगून में ज़फ़र को परिवार के कुछ सदस्यों के साथ कैद जैसी निगरानी में रखा गया. उनका जीवन कठिन और एकाकी था. वे दिल्ली, अपने पुराने जीवन और अपने देश से दूर थे. उनकी शायरी में इस दूरी का दर्द महसूस होता है. बहादुर शाह ज़फ़र का निधन 7 नवंबर 1862 को रंगून में हुआ. उन्हें वहीं दफनाया गया. उनकी कब्र आज म्यांमार के यांगून में है. इस तरह भारत का अंतिम मुगल बादशाह अपने वतन से दूर, निर्वासन की धरती पर दफन हुआ.
बहादुर शाह ज़फ़र की कहानी सत्ता के उत्थान और पतन की कहानी है. वे ऐसे बादशाह थे जिनके पास नाम और उपाधि तो थी, लेकिन शासन की ताकत बहुत कम थी. 1857 के विद्रोह ने उन्हें फिर से इतिहास के केंद्र में ला दिया. पर विद्रोह की हार ने उन्हें कैदी और निर्वासित बना दिया. उनकी शायरी आज भी इसलिए याद की जाती है, क्योंकि उसमें एक उजड़े हुए जीवन की आवाज़ सुनाई देती है. उनकी कविता में वतन से दूर होने का दुख, बीते समय की याद और इंसानी जीवन की नश्वरता जैसे भाव मिलते हैं. उनकी कब्र म्यांमार में है, लेकिन उनका नाम भारत के इतिहास और उर्दू साहित्य दोनों में दर्ज है.



