हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम करते समय कंपनियों द्वारा कोई न कोई टेक्निकल वजह बताकर क्लेम रिजेक्ट कर देना बेहद आम बात हो चुकी है। हालांकि, जब मामला जायज होता है और मरीज अदालत का दरवाजा खटखटाता है, तो कंपनियों की मनमानी पर लगाम भी लगती है। ऐसा ही एक मामला गुजरात के अहमदाबाद से सामने आया है, जहां उपभोक्ता अदालत ने बीमा कंपनी के रुख को गलत ठहराते हुए मरीज के परिवार को पूरी क्लेम राशि लौटाने का आदेश दिया है।

क्या है पूरा मामला?
यह मामला गुजरात के अहमदाबाद का है। मार्च 2019 में एक 13 साल की बच्ची को पीठ के निचले हिस्से में तेज दर्द और बाएं पैर में खिंचाव की शिकायत के बाद एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वहां डॉक्टरों ने जांच के बाद बच्ची की रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से यानी ‘L5S1 प्रोलैप्स्ड इंटरवर्टेब्रल डिस्क’ की सर्जरी की।
बच्ची के मातापिता के पास ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की मेडिक्लेम पॉलिसी थी। इलाज में कुल 1.6 लाख रुपये का खर्च आया, जिसके रीइम्बर्समेंट के लिए परिवार ने बीमा कंपनी के पास क्लेम फाइल किया।
बीमा कंपनी ने क्यों खारिज किया था क्लेम?
बीमा कंपनी ने पॉलिसी की शर्तों का हवाला देते हुए इस क्लेम को देने से साफ इनकार कर दिया। कंपनी ने मेडिकल रिकॉर्ड पेश करते हुए तर्क दिया कि बच्ची का वजन 72 किलोग्राम था और उसका बॉडी मास इंडेक्स 26.1 था, जो उसे ‘ओवरवेट’ की श्रेणी में रखता है।
कंपनी का दावा था कि यह सर्जरी असल में वजन कम करने से जुड़ा एक प्रोग्राम या प्रक्रिया है और पॉलिसी की शर्तों के मुताबिक मोटापे या वजन घटाने के इलाज का खर्च कवर नहीं होता है।
अस्पताल और डॉक्टरों का पक्ष
बीमा कंपनी के इस रवैये से परेशान होकर परिवार ने अहमदाबाद जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में शिकायत दर्ज कराई। सुनवाई के दौरान अस्पताल और डॉक्टरों ने स्थिति साफ की।
अस्पताल ने आयोग को स्पष्ट किया कि मरीज का इलाज सिर्फ और सिर्फ रीढ़ की हड्डी की बीमारी के लिए किया गया था और इसमें मोटापे से जुड़ा कोई इलाज शामिल नहीं था। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। डॉक्टरों ने यह भी बताया कि डिस्क की यह समस्या ‘इडियोपैथिक’ थी और इसका मोटापे या अधिक वजन से कोई सीधा संबंध नहीं था।
उपभोक्ता आयोग का फैसला
उपभोक्ता आयोग ने शिकायतकर्ता के तर्कों और अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट को सही माना। आयोग ने बीमा कंपनी के क्लेम रिजेक्ट करने के फैसले को गलत ठहराया और कंपनी को आदेश दिया कि वह बच्ची के परिवार को क्लेम की पूरी रकम 1.6 लाख रुपये का भुगतान करे। इसके अलावा, कानूनी लड़ाई में हुए खर्च के तौर पर 4,000 रुपये अलग से देने का निर्देश दिया।



