AI Layoffs: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई आज दुनियाभर में कामकाज के तरीकों को तेजी से बदल रहा है. लेकिन नौकरियों पर पड़ने वाला इसका असर सबके लिए एक जैसा नहीं है. इस बदलाव में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की नौकरी जाने का जोखिम कहीं ज्यादा है. दफ्तरों में एडमिनिस्ट्रेशन, क्लर्क और रोजमर्रा के रूटीन कामों में करोड़ों महिलाएं काम करती आई हैं. अब एआई सबसे पहले इन्हीं कामों को ऑटोमेट कर रहा है. इतिहास की पिछली तकनीकी क्रांतियां हमें एक साफ चेतावनी देती हैं. जब भी कोई नई इंडस्ट्री खड़ी होती है, तो मौके जरूर बनते हैं. लेकिन जिन कर्मचारियों का पुराना हुनर काम का नहीं रहता, उन्हें उसी सैलरी और सुरक्षा वाली दूसरी नौकरी ढूंढने में भारी संघर्ष करना पड़ता है. नीति बनाने वालों और कंपनियों के सामने अब ये बड़ी चिंता है कि तकनीकी तरक्की आर्थिक मौके तो लाएगी, लेकिन कर्मचारियों के एक बड़े वर्ग को बेरोजगारी के मुहाने पर भी छोड़ देगी.

क्लर्क के काम पर एआई की सीधी मार
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की कुछ महीने पहले छपी एक रिसर्च इस खतरे की गंभीरता को सामने लाती है. इस रिपोर्ट के अनुसार, ज्यादा कमाई वाले देशों में लगभग हर 10 में से 1 महिला ऐसे पेशे में काम कर रही है, जहां एआई से नौकरी जाने का जोखिम सबसे ऊंचा है. रिकॉर्ड रखने, फाइलें संभालने और सामान्य जानकारी प्रोसेस करने वाले कामों में महिलाओं की संख्या बहुत ज्यादा है. इंस्टीट्यूट फॉर विमेन्स पॉलिसी रिसर्च की सीनियर रिसर्च फेलो एरियाना हेगेविश कहती हैं कि एआई का पूरा फोकस रूटीन कामों, नंबरों और पैटर्न को पकड़ने पर है. ये ठीक वही क्लेरिकल और एडमिनिस्ट्रेटिव काम हैं, जिन्हें बड़ी संख्या में महिलाएं संभालती हैं. उनके मुताबिक आज भी 90 फीसदी सेक्रेटरी और क्लर्क महिलाएं ही हैं.
ये खतरा सिर्फ छंटनी तक सीमित नहीं है. जब तकनीक किसी जमेजमाए पद को खत्म करती है, तो निकाले गए कर्मचारियों को मजबूरी में कम सैलरी वाला काम पकड़ना पड़ता है या फिर वे हमेशा के लिए कामकाज छोड़ देते हैं. मशहूर अर्थशास्त्री डेविड ऑटर बताते हैं कि ज्यादातर लोग अपने करियर की शुरुआत में जो काम चुनते हैं, उसी के इर्दगिर्द पूरी जिंदगी गुजार देते हैं. लोग बारबार अपना करियर नहीं बदलते. ऐसे में अगर तकनीक की वजह से उनके काम की अहमियत अचानक खत्म हो जाए, तो उनके लिए उसी स्तर की दूसरी नौकरी पाना बेहद मुश्किल हो जाता है. आखिर में उन्हें अपने स्तर से नीचे का ही कोई काम करना पड़ता है.
टेलीफोन ऑपरेटरों के इतिहास में छिपा है बड़ा सबक
बड़े पैमाने पर होने वाला ऑटोमेशन क्या असर डालता है, इसे अमेरिकी टेलीफोन ऑपरेटरों के इतिहास से आसानी से समझा जा सकता है. 1940 के दशक में अमेरिका में टेलीफोन ऑपरेटरों के 95 फीसदी पदों पर महिलाएं थीं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इस काम के लिए कड़ी ट्रेनिंग, रफ्तार और सटीकता की जरूरत होती थी. उस दौर में महिलाओं को इस काम के बदले काफी अच्छी सैलरी मिलती थी. लेकिन जब ऑटोमेटेड टेलीफोन स्विचिंग सिस्टम आए, तो ऑपरेटरों की जरूरत धीरेधीरे खत्म हो गई.
बोस्टन यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री जेम्स फेगेनबॉम और ड्यूक यूनिवर्सिटी के डेनियल पी. ग्रॉस ने साल 2020 में पुराने डेटा के आधार पर इस बदलाव का अध्ययन किया. उन्होंने पाया कि इस तकनीकी झटके ने वहां काम कर रही महिलाओं से उनकी नौकरियां और करियर छीन लिए. करीब 75,000 ऑपरेटरों की नौकरियां खत्म हो गईं. कई अनुभवी महिलाओं को कम पैसे वाली नौकरियों में जाना पड़ा या फिर घर बैठना पड़ा. हालांकि, नई पीढ़ी की युवा महिलाओं ने खुद को नए माहौल के हिसाब से ढाला और दूसरे क्षेत्रों में अच्छी नौकरियां हासिल कर लीं. एआई के दौर के लिए भी ये फर्क समझना जरूरी है. लंबे समय में बाजार में नई नौकरियां भले ही आ जाएं, लेकिन जो कर्मचारी पहले से इन असुरक्षित पदों पर टिके हैं, तुरंत नुकसान तो उन्हें ही उठाना पड़ेगा.
वॉशिंग मशीन से लेकर पर्सनल कंप्यूटर तक का सफर
ऐसा नहीं है कि हर तकनीकी बदलाव ने महिलाओं के मौकों को कम ही किया है. घरों में इस्तेमाल होने वाली मशीनों, खासकर वॉशिंग मशीन ने बिना पैसे वाले घरेलू कामकाज का समय काफी घटा दिया. इससे महिलाओं के लिए बाहर निकलकर कमाई करना आसान हो गया. 1950 से 1980 के बीच अमेरिका में कामकाजी महिलाओं की संख्या 2.5 करोड़ से ज्यादा बढ़ी. लेबर फोर्स में उनकी भागीदारी 34 फीसदी से बढ़कर 52 फीसदी पर पहुंच गई. अर्थव्यवस्था बढ़ी तो रिटेल, हॉस्पिटैलिटी, चाइल्डकेयर और ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन में जमकर नौकरियां निकलीं. पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री जेरेमी ग्रीनवुड और अन्य शोधकर्ताओं ने घरेलू मशीनों को महिलाओं के लिए ‘आजादी का इंजन’ बताया था, क्योंकि इन्होंने घर के काम का बोझ हल्का कर दिया था.
इसके बाद 1980 में पर्सनल कंप्यूटर ने एक नया बदलाव किया. उस समय अमेरिका में करीब 47 लाख लोग सेक्रेटरी, स्टेनोग्राफर और टाइपिस्ट का काम करते थे, जिनमें 98 फीसदी से ज्यादा महिलाएं थीं. कंप्यूटर और वर्डप्रोसेसिंग सॉफ्टवेयर आने के बाद मैनेजर और अधिकारी खुद ही ये काम करने लगे, जिसके लिए पहले अलग से स्टाफ होता था. फिर भी, कंप्यूटर ने महिलाओं को नए औजार दिए, जिससे उन्होंने नई स्किल्स सीखीं और कंपनियों के लिए खुद को ज्यादा उपयोगी बनाया.
क्या नई नौकरियां कर पाएंगी इस नुकसान की भरपाई?
आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि ऑटोमेशन से जो लोग बेरोजगार होंगे, क्या एआई उनके लिए उतनी ही नई और अच्छी सैलरी वाली नौकरियां पैदा कर पाएगा? साल 2022 में मार्कस डिलेंडर और एलिजा फॉरसाइथ के एक रिसर्च पेपर में सामने आया कि जिन कंपनियों ने ऑफिस के कामकाज के लिए नए सॉफ्टवेयर अपनाए, वहां इस सेक्टर की नौकरियों में 1 फीसदी की गिरावट आई. वहीं दूसरी तरफ, कॉलेज से ग्रेजुएट कर्मचारियों की सैलरी में 3 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई. आज के समय में महिलाओं की उच्च शिक्षा और मैनेजर के पदों तक बढ़ी पहुंच उन्हें कुछ हद तक सुरक्षा दे सकती है. लेकिन जिस तेजी से एआई अब जटिल प्रोफेशनल कामों में भी दखल दे रहा है, उससे खतरे का ये दायरा और भी बड़ा होता जा रहा है.



