कोई व्यक्ति चोटी या दाढ़ी रखता है अथवा नहीं या वह जनेऊ पहनता है अथवा उसने कभी जनेऊ धारण ही नहीं किया… ये सवाल किसी की भी निजता का उल्लंघन है, क्योंकि व्यक्ति की इच्छा पर ही ऐसा हो सकता है. किसी जॉब के इंटरव्यू में ऐसे सवाल पूछे जाएं तो इंटरव्यू करने वालों की सोच का पता तो चलता ही है. परंतु ऐसे सवाल पूछे गए वह भी एक सार्वजनिक मंच पर. राम मंदिर के सीईओ पद के लिए जो इंटरव्यू हुए उनमें ऐसे ही सवाल पूछे गए. आपकी भगवान राम में श्रद्धा है, आप पूजा करते हैं, आप शिखा रखते हो या नहीं, जनेऊ पहनते हो या नहीं, मानों राम मंदिर के लिए चयनकर्त्ता को सीईओ नहीं बल्कि पुजारी की तलाश हो. चयनकर्त्ताओं को शायद पता ही नहीं होगा कि जिस धर्म की आस्था के प्रतीक भगवान राम के मंदिर के लिए वे सीईओ हेतु वे ये सवाल पूछ रहे हैं, उस हिंदू धर्म जनेऊ की कोई अनिवार्यता ही नहीं है.

जनेऊ एक संस्कार है, उसे धारण करने की अनिवार्यता नहीं

सनातन धर्म के षोडश संस्कारों में जनेऊ या उपनयन भी एक संस्कार है. इस संस्कार के समय व्यक्ति को जनेऊ पहनाया जाता है पर इसे धारण करने की अनिवार्यता नहीं है. परंपरा में यह द्विज संस्कृति का एक हिस्सा है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। हिंदुओं की कुछ जातियों का विश्वास है कि इस संस्कार के माध्यम से वे आध्यात्मिक रूप से दूसरा जन्म लेते हैं, उन्हीं का उपनयन संस्कार होता है. ये लोग भी अधिकतर कुछ धार्मिक कर्मकांड करते समय ही जनेऊ अनिवार्य रूप से पहनते हैं, बाकी समय नहीं. पर जब आप किसी वैधानिक पद के लिए इंटरव्यू कर रहे हों तो इस तरह के सवाल बेईमानी हैं. आचार्य वासुदेव शरण अग्रवाल ने अपनी पुस्तक पाणिनि कालीन भारत में लिखा है, यह गुरुकुल और पाठशाला में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य था. यहां तक कि स्त्रियों और शूद्रों के लिए भी. विद्यारंभ के पूर्व विद्यालय में ही बच्चों का उपनयन संस्कार होता था.

सनातन के नाम पर विकृतियां

संस्कृत के विद्वान प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी का मानना है, समर्थ स्वामी रामदास ने जनेऊ की अनिवार्यता शुरू करवाई. अन्यथा उसके पहले हिंदुओं में जनेऊ की अनिवार्यता के उदाहरण नहीं मिलते. यदि जनेऊ धारियों के लिए अध्यात्म था तब भक्तिकाल में लगभग कोई भी भक्त कवि जनेऊ धारण करने वाला नहीं था. स्वामी रामानंद ने तो सबको शिष्य बनाया. भले वह ब्राह्मण हो या शूद्र लेकिन शिवाजी के गुरु समर्थ स्वामी रामदास ने सनातन के नाम पर जनेऊ, चोटी आदि को अनिवार्य बताया. इसलिए जितने भी समाज सुधार के आंदोलन चले उनमें इन सबको पाखंड बताया गया. राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फुले, स्वामी दयानंद आदि ने सनातन के नाम पर व्याप्त कुरीतियों पर प्रहार किया. स्वामी दयानंद ने तो कहा, यदि जनेऊ यज्ञ आदि के लिए अनिवार्य है तो हर जाति के व्यक्ति का जनेऊ होगा. आर्य समाज में स्त्रियों, शूद्रों आदि सब का जनेऊ होता है.

दक्षिण भारत के मंदिरों के रिसीवर तो जनेऊ नहीं पहनते

अगर जनेऊ मंदिर ट्रस्ट के लिए अनिवार्य है तो दक्षिण भारत में तिरुपति आदि अनेक मंदिर है, जहां डीएम ही मंदिर का रिसीवर होता है, वह क्या जनेऊ धारण करता है? जवाब होगा, शायद नहीं. जनेऊ, शिखा आदि मंदिर के पुजारियों, वहां के कार्यकर्त्ताओं के लिए तो अनिवार्य होगा किंतु किसी मंदिर के सीईओ के लिए इसकी अनिवार्यता हास्यास्पद होगी. यूं भी सीईओ एक सरकारी पद है. उसका काम है, पब्लिक के पैसे का दुरुपयोग न हो. इसके लिए उसका प्रशासनिक रूप से कुशल होना, भीड़ को मैनेज कर लेना और मंदिर से हुई आय पर निगरानी रखना मुख्य काम है. वह खुद जनेऊ पहनता है या नहीं पहनता है, तिलक लगाता है या नहीं आदि प्रश्न फिजूल हैं. यदि व्यक्ति प्रशासनिक रूप से कुशल है तो उसके सनातनी होने की अनिवार्यता भी नहीं होनी चाहिए. यूं जब हिंदुओं के तमाम कानूनों में सभी भारतीय धर्मों, जातियों को हिंदू परिभाषा के अंतर्गत किया गया हो तो फिर ऐसे प्रश्न क्यों?

मांसाहार और शाकाहार जैसे प्रश्न भी फालतू

खानपान में शाकाहारी होने जैसे सवाल भी हैं. ये व्यक्ति की निजी आस्थाओं वाले सवाल हैं. इससे उसके सार्वजनिक जीवन पर कोई असर नहीं पड़ता. स्वयं भगवान राम अपने वानप्रस्थ के समय हिरण का शिकार करने जाते हैं. लोक जीवन में अयोध्या की एक हिरणी का विलाप बहुत मशहूर है. राजा दशरथ के महल में पुत्र प्राप्ति के अवसर पर उत्सव हो रहा है. तमाम तरह के पकवान बनाए जा रहे हैं. उसी समय एक हिरणी अपने मृगछौने को लेकर विलाप करती है. वह कहती है, चारत हिरन राजा मारिलौ, जे कर मांस रांधे रसोइया, खलवा मढ़ाय राम खेलिहैं, जबजब बाजे ढपलिया, तबतब सालै करेजवा! अर्थात हिरणी बोलती है, मेरा पति घास चर रहा था, उसी की हत्या कर उसके मांस को रसोइये ने रांधा है. इसी की खाल को मढ़ाकर बालक राम के लिए ढपली बनेगी. जबजब वह ढपली बजेगी, मेरे कलेजे में तीर की तरह चुभेगी.

शाक विदुर घर खायो री!

इसी लोकगीत में आगे कहा गया है कि हिरणी कलपते हुए श्राप देती है जिस तरह मुझे पति वियोग सहना पड़ रहा है, उसी तरह राम को भी पत्नी वियोग सहना पड़ेगा. इससे यह तो पता चलता ही है कि लोक में राम के शाकाहारी होने की कोई भी कथा नहीं मिलती. यूं भी राम का जो काल माना जाता है, तब तक मानव सभ्यता में कृषि का चलन बहुत कम था. यज्ञ और हवन में पशु बलि आम थी. अलबत्ता कृष्ण की कथा के समय पशु बलि बहुत कम हुई और शाकाहार को प्रतिष्ठा मिली. कृष्ण के बारे में कहा ही जाता है कि जब वे पांडवों की तरफ से पांच गांवों की मांग को लेकर हस्तिनापुर गए तब उन्होंने दुर्योधन के पकवान छोड़कर विदुर के यहां शाकाहारी भोजन किया. यह कथा सर्वत्र उपलब्ध है, दुर्योधन की मेवा त्यागी, शाक विदुर घर खायो री! तब राम मंदिर के लिए सीईओ चुनने वालों ने ऐसा नाहक सवाल क्यों पूछा?

हिंदू धर्म में कोई भी कालातीत नहीं

हिंदू धर्म बहुत विशाल है. इसमें असंख्य मत हैं और न जाने कितने पंथ. वे परस्पर टकराते भी हैं किंतु कहीं कटुता नहीं है. हर विचित्रता के लिए एक कथा है. जिस किसी ने भी आचार्य विष्णु शर्मा की पंचतंत्र पढ़ी होगी, उसे पता होगा कि हर कथा से एक अलग कथा निकलती है. कथा सरित्सागर में भी ऐसा ही है. मजे की बात कि बौद्ध और जैन कथाओं में भी अनेक प्रसंग हैं. बौद्धों की जातक कथाओं में तो हर बार तथागत नया रूप धारण करते हैं लेकिन दर्शन की धारा निरंतर बहती रहती है. हिंदुओं में ही जो छह प्रमुख दर्शन हैं, उनमें से अधिकांश ईश्वर के प्रति अविश्वास जताते हैं. वेदों में भी उस कर्त्ता के प्रति संशय है. कहा ही गया है कि वह ऊपर जो अदृश्य बना रहता है, पता नहीं है भी कि नहीं. उसके कर्त्ता होने पर भी संदेह है. यह जो संशय है, वही हिंदू धर्म की विशेषता है. हिंदू धर्म कोई निर्णय नहीं सुनाता. किसी भी पुस्तक को कालातीत नहीं मानता!

हिंदुओं में राजा ईश्वर नहीं है

राजा के ईश्वर होने की कल्पना पश्चिम की देन है. ग्रीक और रोमन राजाओं ने जब देशों को लूटना शुरू किया तब कहा गया, राजा ईश्वर का रूप है इसलिए राजा का आदेश ईश्वरीय आदेश है. इस्लाम के उदय के बाद भी ऐसी ही कल्पना है. पर हमारे यहां किसी मत में राजा को ईश्वर नहीं माना गया. हमारे राजा राम से अधिक पूजा हनुमान जी की होती है. अयोध्या में ही हनुमान गढ़ी और सरयू नदी में स्नान की प्रतिष्ठा अधिक है. आज भी किसी भी पारिवारिक कार्य में सबसे पहले मातृकाएं न्यौती जाती हैं फिर गणेश जी और हनुमान जी. गणेश और हनुमान दोनों विद्या और बुद्धि के देवता हैं. दोनों ही अतुलित बलशाली और विद्या एवं बुद्धि में प्रतिष्ठित हैं. हनुमान जी से बल, बुद्धि, विद्या की मांग की जाती है साथ ही हर कष्ट के निवारण हेतु उनकी पूजा होती है.

तुलसी भी शारीरिक संकट के समय हनुमान की शरण में

रामचरितमानस जैसा सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ लिखने वाले तुलसी भी जब शारीरिक व्याधियों का शिकार हुए तो उन्होंने हनुमानाष्टक लिखी. इसमें वे राजा राम से शिकायत करते हैं कि जीवन भर आपकी आराधना की पर मुझे व्याधियों से दूर नहीं किया प्रभु! इसलिए वे हनुमान जी के गुण गाते हैं. एक तरह से यह राम के समानांतर किसी देवता को खड़ा करने का प्रयास है. इसलिए लोक आस्थाओं और स्वविवेक को गड्डमड्ड नहीं करना चाहिए. सीईओ के पद के लिए कई आईएएस, आईपीएस और सेना के अधिकारी इंटरव्यू हेतु आ रहे हैं. उनसे ऐसे सवाल पूछना विवेक का सत्यानाश करना है.