सब इंडिया यूएस डील की बात करते रहे और भारत ने ना सिर्फ यूएस बल्कि यूके ईयू गल्फ कंट्रीज सभी से डील साइन कर ली। भारतीय इकॉनमी के लिए एक और डील भी हुई है। एक छोटे से देश के साथ लेकिन यह डील बहुत बड़ी है। भारत और चिली के बीच एक नया कॉम्प्रहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट पर बातचीत चल रही है। यह समझौता 2007 के प्रेफरेंशियल ट्रेड एग्रीमेंट को आगे बढ़ाकर बनाया जा रहा है। इसका मकसद दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाना और भारत को क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई सुरक्षित करना है।
फाइनेंसियल ईयर 2024-25 में भारत चिली का व्यापार 3.7 बिलियन डॉल से ज्यादा रहा। भारत चिली से ज्यादातर कॉपर और मिनरल्स मंगाता है। भारत चिली को फार्मासटिकल्स, टेक्सटाइल्स और ऑटो पार्ट्स भेजता है। पुराने रिश्तों की अगर बात करें तो भारत और चिली के रिश्ते 1956 से हैं। 2005 में पीटीए पर बातचीत शुरू हुई थी। 2007 में यह लागू हो गया था। 2017 में इसे और भी बढ़ाया गया। 2019 में एक स्तरी ग्रुप ने सीईपीए बनाने की सलाह दे दी। 2025 में इस पर बातचीत और भी तेज हो गई। अप्रैल 2025 में एक जॉइंट स्टेटमेंट जारी किया गया। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। मई 2025 में पहला राउंड नई दिल्ली में हुआ। दिसंबर 2025 तक कई राउंड्स पूरे हो गए। जनवरी 2026 में मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि बातचीत फाइनल स्टेज में है। फरवरी 2026 तक अभी साइनिंग नहीं हुई है। डील जल्द ही हो सकती है।
सीईपीए में होगा क्या-क्या?
इस एग्रीमेंट में शामिल होगा टेरिफ कम या खत्म करना, सर्विसेस ट्रेड, डिजिटल इकॉनमी रूल्स, इन्वेस्टमेंट प्रोटेक्शन, एमएसएमई सपोर्ट, क्रिटिकल मिनरल्स कॉरपोरेशंस और इससे जॉब्स बढ़ सकती हैं। सप्लाई चेन मजबूत होगी।
भारत के लिए क्रिटिकल मिनरल्स जरूरी क्यों है?
चिली के पास है लिथियम जो कि वर्ल्ड में सेकंड लार्जेस्ट अमाउंट में है। कॉपर चिली इसका टॉप प्रोड्यूसर है। इसके अलावा कोबाल्ट भी चिली के पास है। यह भारत के लिए जरूरी है क्योंकि यह ईवीज, बैटरीज, इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल्स, डिफेंस में इस्तेमाल होते हैं। भारत चाइना पर डिपेंडेंस कम करना चाहता है। इसीलिए चिली से डायरेक्ट सप्लाई चाहता है।





