जिस तरह भगवान विष्‍णु के पाताल लोक जाकर विश्राम करने और जागने की दोनों एकादशी – देवशयनी और देवउठनी एकादशी बेहद अहम हैं. वैसे ही परिवर्तिनी एकादशी का भी हिंदू धर्म में विशेष महत्‍व है, क्‍योंकि इस दिन योगनिद्रा में लीन भगवान विष्‍णु करवट बदलते हैं. परिवर्तिनी एकादशी, भाद्रपद शुक्‍ल एकादशी को कहते हैं. लेकिन क्‍या आपको पता है कि इसी दिन भगवान करवट क्‍यों बदलते हैं और क्‍यों इस दिन भगवान विष्‍णु के वामन अवतार की विशेष रूप से पूजा की जाती है. बता दें कि इस साल 21 सितंबर 2026 को परिवर्तिनी एकादशी है.

क्‍यों बदलते हैं करवट?
जिस तरह सामान्‍य व्‍यक्ति पूरी रात विश्राम करने के दौरान बीच-बीच में अपनी करवट बदलता है, वैसे ही धार्मिक मान्‍यता है कि भगवान विष्‍णु भी 4 महीने की निद्रा के दौरान करवट बदलते हैं. हिंदू कैलेंडर के चौथे महीने आषाढ़ के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी यानी कि देवशयनी एकादशी को भगवान विष्‍णु योगनिद्रा में जाते हैं और 8वे महीने कार्तिक मास के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी यानी कि देवउठनी एकादशी को जागते हैं.

इस दौरान हिंदू कैलेंडर के छठवे महीने भाद्रपद मास के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी भगवान विष्‍णु की 4 महीने की योगनिद्रा का मध्‍य होती है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। धार्मिक मान्‍यता है कि विश्राम कर रहे श्रीहरि विष्‍णु इस एकादशी पर थोड़ा हिलते हैं, अपनी करवट बदलते हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी या पार्श्‍व एकादशी कहते हैं. इस दिन व्रत रखने और पूजा करने का विशेष महत्‍व है.

वामन अवतार से भी है संबंध
इसके अलावा परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्‍णु के वामन अवतार की पूजा करने का भी विधान है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी एकादशी पर भगवान विष्‍णु ने राजा बलि का घमंड तोड़ने के लिए वामन अवतार लेकर भिक्षा में 3 पग धरती मांगी थी और 2 पग में ही पूरा पृथ्‍वी लोक और स्‍वर्ग लोक नाप लिया था. इसके बाद भगवान को तीसरा पग रखने के लिए राजा बलि ने अपना सिर आगे कर लिया था.

तब भगवान विष्‍णु ने बलि की इस भक्ति से प्रसन्‍न होकर उसे पाताल लोक का राजा बना दिया था और हर साल 4 महीने के लिए पाताल लोक आकर विश्राम करने का वचन दिया था. मान्‍यता है कि तब से हर साल भगवान विष्‍णु 4 महीने पाताल लोक जाकर विश्राम करते हैं, जिस समय को चातुर्मास कहा जाता है. साल 2026 में चातुर्मास 25 जुलाई को प्रारंभ हुआ था और 21 नवंबर को समाप्‍त होगा.