भारत की रक्षा ताकत और हथियारों की बढ़ती मांग का असर अब यूरोप में भी दिखाई दे रहा है. भारत यूरोप को हथियारों का निर्यात करने वाला दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बनकर उभरा है. डिफेंस सेक्रेटरी राजेश कुमार सिंह के मुताबिक, रूसयूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने यूरोपीय देशों को 8,271 करोड़ रुपये के गोलाबारूद की सप्लाई की है.

ट्रेड डेटा मॉनिटर के आंकड़ों के अनुसार, इस सप्लाई में तोपों के गोले और मोर्टार के गोले जैसे सैन्य इस्तेमाल के अहम गोलाबारूद शामिल हैं.यह आंकड़ा भारत के बढ़ते रक्षा उत्पादन और हथियार निर्यात की क्षमता को दिखाता है. एक समय तक हथियारों के आयात पर निर्भर रहने वाला भारत अब अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रहा है.
वैश्विक बाजार में भारतीय रक्षा उत्पादों के लिए नए अवसर
भारत की रक्षा कंपनियां स्वदेशी हथियारों और सैन्य उपकरणों के उत्पादन पर जोर दे रही हैं. इससे देश की रक्षा औद्योगिक क्षमता को बढ़ावा मिल रहा है और वैश्विक बाजार में भारतीय रक्षा उत्पादों के लिए नए अवसर बन रहे हैं.
डिफेंस सेक्रेटरी राजेश कुमार सिंह ने शुक्रवार को कहा कि भारत यूरोप को हथियार निर्यात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बनकर उभरा है. इसके पीछे ‘रीआर्म यूरोप’ पहल के तहत हथियारों की बढ़ती मांग और भारत में घरेलू विनिर्माण आधार का विस्तार मुख्य कारण हैं.
शुक्रवार को आयोजित ‘केपीएमजी अग्रसर भारत मंच 2026’ कार्यक्रम में, सिंह ने जोर देकर कहा कि भारत का लक्ष्य अपने डिफेंस इंडस्ट्रियल बेस को और अधिक व्यापक बनाना है. पहले यह मुख्य रूप से लगभग 16 सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों तक ही सीमित था, लेकिन अब इसमें प्राइवेट सेक्टर,छोटे और मीडियम सेक्टर और भारत में तेजी से मजबूत हो रहे स्टार्टअप इकोसिस्टम को भी शामिल किया जा रहा है.
10 वर्षों में भारत के रक्षा इकोसिस्टम में वृद्धि
डिफेंस सेक्रेटरी ने बताया कि इस बदलाव के आर्थिक और परिचालन संबंधी ठोस लाभ वैश्विक स्तर पर दिखने लगे हैं. उन्होंने कहा, ‘पिछले 10 वर्षों में भारत के रक्षा इकोसिस्टम में जबरदस्त वृद्धि हुई है. 16 बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के अलावा, अब हमारे पास औद्योगिक लाइसेंस वाली लगभग 840 बड़ी और मध्यम आकार की कंपनियां हैं. इसके साथ ही, स्टार्टअप्स सहित लगभग 17,000 छोटे और मीडियम सेक्टर भी इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं.इस विविध औद्योगिक आधार का परिणाम घरेलू बिक्री के मूल्य में साफ नजर आ रहा है, जो अब लगभग 17 बिलियन यूरो तक पहुंच गया है’.
भारत का निर्यात अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया
हाल की व्यापार रिपोर्टों पर चर्चा करते हुए, डिफेंस सेक्रेटरी ने बताया कि पिछले एक साल में अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति काफी हद तक भारत के पक्ष में बदल गई है. सिंह ने कहा, ‘हमारा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये के अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है. मैंने कल ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट पढ़ी, जिसमें बताया गया था कि पिछले एक साल में भारत अचानक यूरोप को हथियार निर्यात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया है. इसका मुख्य कारण ‘रीआर्म यूरोप’ पहल है. नतीजतन, यूरोप को बड़ी संख्या में विभिन्न प्रकार के मानक गोलाबारूद, आर्टिलरी शेल , और छोटेबड़े कैलिबर वाले गोलाबारूद का निर्यात किया जाने लगा है’.
80 से अधिक देशों को निर्यात
उन्होंने आगे कहा, ‘अब हम 80 से अधिक देशों को निर्यात करते हैं. नीति के स्तर पर, हम यह सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं कि हर साल हमारे पूंजीगत व्यय का 75% हिस्सा—जो सालाना लगभग 20 से 25 बिलियन डॉलर के बीच होता है—देश के भीतर ही खर्च हो. साथ ही, तकनीकी आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने के लिए हम ‘IDDM’ को प्राथमिकता देते हैं’.
डिफेंस सेक्रेटरी सिंह के अनुसार, भारत का रक्षा निर्यात अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है, जिसके तहत दुनिया भर के 80 से अधिक देशों को रक्षा उत्पाद भेजे जा रहे हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। भारी तोपखाने और गोलाबारूद के अलावा, भारत से निर्यात किए जाने वाले रक्षा सामानों में हेलमेट और बुलेटप्रूफ जैकेट जैसे सामरिक उपकरण से लेकर छोटे हथियार तक शामिल हैं.
‘हम दुनिया के तीसरे सबसे बड़े हथियार निर्यातक बन गए’
इस बात पर जोर देते हुए कि भारत के रक्षा निर्यात में सामरिक सामानों और युद्धक प्लेटफॉर्मों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है, सिंह ने कहा, ‘मैंने बताया था कि हम दुनिया के तीसरे सबसे बड़े हथियार निर्यातक बन गए हैं, जिसका एक मुख्य कारण आर्टिलरी है. इसके अलावा, हम कई तरह के उपकरण निर्यात करते हैं, जिनमें बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट से लेकर छोटे हथियार तक शामिल हैं। कई खरीदार, खासकर दक्षिणपूर्व एशिया में, ऐसे अनुबंधों पर बातचीत कर रहे हैं जो अभी सार्वजनिक चर्चा के दायरे में हैं. इस तरह, हमारे पास रक्षा से जुड़े विभिन्न प्रकार के उपकरणों की एक पूरी श्रृंखला है—जैसे कि कई तरह के छोटे हथियार, आर्टिलरी और अलगअलग तरह के गन सिस्टम’.
उन्होंने आगे कहा कि ये वे मुख्य प्लेटफॉर्म हैं जिन्हें हम 80 से अधिक देशों को निर्यात करते हैं. उन्होंने बताया ‘पहले हम अपने सबसे बड़े रक्षा आपूर्तिकर्ता के रूप में रूस पर निर्भर थे. आज भी हमारे पास रूस के बने कई उपकरण मौजूद हैं, लेकिन समय के साथ यह निर्भरता कम हुई है और हमने अपने विकल्पों का विस्तार किया है. अब हमारे कुछ यूरोपीय देशों—विशेष रूप से फ्रांस—के साथ काफी मजबूत द्विपक्षीय संबंध हैं. इसके अलावा, कई अन्य देशों के साथ भी हमारे अच्छे संबंध हैं. रूस के बाद, रक्षा आयात में फ्रांस की हिस्सेदारी सबसे अधिक है, रक्षा क्षेत्र में फ्रांस और इज़राइल की हिस्सेदारी लगभग बराबर है. हाल ही में मैंने ग्रीस और साइप्रस का दौरा किया है—ये ऐसे देश हैं जिनके साथ हमारी रणनीतिक सोच काफी हद तक मेल खाती है. ये हमारे नए साझेदार हैं और हमारे लिए एक प्रवेश द्वार की तरह भी हैं’.
सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि अपने निर्यात के दायरे को इस तरह बढ़ाने से भारत को अंतरराष्ट्रीय मांग को पूरा करने के लिए अपने उत्पादन को तेजी से बढ़ाने में मदद मिलती है.उन्होंने कहा, ‘भारत यूरोप के हथियार खरीद कार्यक्रमों में और अधिक भागीदारी करना चाहता है. सीधे तौर पर नहीं, बल्कि यूरोप में संयुक्त उद्यम स्थापित करके. इसके साथ ही, यूरोपीय साझेदार भी भारत में संयुक्त उद्यम स्थापित कर सकते हैं ताकि वे हमारे रक्षा बाजार तक पहुंच सकें, और हम यूरोप में संयुक्त उद्यम स्थापित कर सकते हैं ताकि हम यूरोपीय सरकारी कार्यक्रमों का हिस्सा बन सकें’.
‘स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े नियमों का पालन करना होगा’
डिफेंस सेक्रेटरी ने आगे कहा, ‘जो विदेशी कंपनियां भारत के घरेलू खरीद कार्यक्रमों में शामिल होना चाहती हैं, उन्हें स्थानीय विनिर्माण से जुड़े नियमों का पालन करना होगा. हालांकि, अधिकारियों ने यह भी माना है कि अलगअलग क्षेत्रों के ‘ऑफसेट फ्रेमवर्क’ में कुछ समानताएं हैं. यूरोपीय कंपनियों का भारत के आकर्षक रक्षा खरीद कार्यक्रमों में स्वागत है, लेकिन अधिकारियों ने जोर देकर कहा कि विदेशी कंपनियों को स्थानीय विनिर्माण के मानकों का सख्ती से पालन करना होगा’.
सिंह ने आगे कहा कि यूरोपीय देश भी भारत के हथियार खरीद कार्यक्रमों में हिस्सा ले सकते हैं, लेकिन उन्हें हमारे ‘मेक इन इंडिया’ के मानकों को पूरा करना होगा. उन्होंने कहा, ‘यूरोपीय देश भारत के हथियार खरीद कार्यक्रमों में शामिल हो सकते हैं, लेकिन उन्हें हमारे ‘मेक इन इंडिया’ के नियमों को पूरा करना होगा. जब हम यूरोप के साथ काम करना चाहते हैं, तो हम समझते हैं कि वहां भी कुछ हद तक ऐसे ही नियम हैं, बस वहां के नियम थोड़े कम सख्त हैं. मुझे लगता है कि वहां स्थानीयकरण की आवश्यकता लगभग 25% है, जबकि भारत में यह कम से कम 50% है, लेकिन इन कार्यक्रमों का मूल उद्देश्य एक जैसा ही है. मुझे उम्मीद है कि यह साझेदारी समझौता एक ऐसी स्थिति की नींव रखेगा, जहां यूरोपीय और भारतीय रक्षा निर्माताओं के बीच सप्लाई चेन और अधिक एकीकृत हो सकेगी और हम इसी दिशा में काम करना चाहते हैं’.



