
Earth Rotation Slower: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को अब तक हम गर्मी, बाढ़ या मौसम के बदलने का कारण मानते थे. लेकिन अब इसका असर उससे कहीं आगे निकलता दिखाई दे रहा है. वैज्ञानिकों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से धरती की घूमने की गति में भी हल्का बदलाव देखा गया है. इसका सीधा असर दिन की लंबाई पर पड़ रहा है. इसका मतलब है कि अब धीरे-धीरे दिन थोड़ा लंबा होता जा रहा है. ज्यूरिख और विएना विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इसकी सबसे बड़ी वजह जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का बढ़ता जलस्तर और तेजी से पिघलती बर्फ को माना है. आइए, यहां समझते हैं कि आखिर पृथ्वी की चाल क्यों बिगड़ रही है?
कैसे धीमी पड़ रही है पृथ्वी की चाल?
जैसा कि आपको पता ही होगा कि धरती अपनी धुरी पर घूमती रहती है, जिसकी वजह से दिन और रात होते हैं. लेकिन यह घूमना बिल्कुल एक जैसा नहीं रहता. जब बड़े पैमाने पर ग्लेशियर पिघलते हैं, तो उनका पानी महासागरों में फैल जाता है. इससे धरती पर वजन का संतुलन बदल जाता है. यही बदलाव उसकी घूमने की गति को थोड़ा धीमा कर देता है.
कितना लंबा हो रहा है दिन
यह बदलाव बहुत छोटा है, इसलिए आम लोगों पर इसका असर महसूस नहीं होता. स्टडी में पाया गया कि पृथ्वी की गति में यह बदलाव पिछले 36 लाख सालों में सबसे तेज देखा गया है. इन बीस सालों में पृथ्वी के एक दिन की अवधि में लगभग 1.33 मिलीसेकंड (Millisecond) प्रति सदी की दर से वृद्धि दर्ज की गई है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। अगर इस आधार पर देखें, तो साल 2000 से 2020 के बीच दिन की लंबाई में 1.33 मिलीसेकंड प्रति सदी की बढ़ोतरी हुई है. हालांकि एक मिलीसेकंड (एक सेकंड का हजारवां हिस्सा) बहुत कम लगता है, लेकिन यह लंबे समय में समय के पूरे गणित को बिगाड़ सकता है.
क्यों यह बदलाव है खतरनाक
धरती के घूमने की रफ्तार में बदलाव कोई सामान्य बात नहीं मानी जाती. यह संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन अब ग्रह के मूल संतुलन को भी प्रभावित करने लगा है. पहले ऐसे बदलाव प्राकृतिक कारणों से बहुत लंबे समय में होते थे, लेकिन अब यह प्रक्रिया तेज होती दिख रही है, जो वैज्ञानिकों के लिए चिंता की बात है.
आपके ऊपर क्या होगा असर?
वैज्ञानिकों का कहना है कि एक आम आदमी के जीवन पर इसका कोई सीधा और बड़ा असर नहीं पड़ेगा. इसका मतलब है कि आपको 24 घंटे की जगह अचानक 25 घंटे काम करने की जरूरत नहीं होगी. लेकिन इससे GPS और सैटेलाइट पर फर्क पड़ सकता है. अगर धरती की गति और समय में मिलीसेकंड का भी अंतर आता है, तो लोकेशन और नेविगेशन में बड़ी गलतियां हो सकती हैं. वहीं, स्पेस और परमाणु ऊर्जा से जुड़ी वैज्ञानिक गणनाओं के लिए एक मिलीसेकंड का अंतर भी बड़ी गड़बड़ पैदा कर सकता है. इस बदलाव को बैलेंस करने के लिए समय मापने वाले सिस्टम में बार-बार लीप सेकंड जोड़ने की जरूरत पड़ सकती है, जिससे पूरी दुनिया की घड़ियां एक साथ चल सकें.
समुद्र के पानी की भूमिका
जब बर्फ पिघलती है, तो वह पानी समुद्र में जाकर फैल जाता है. यह पानी खासतौर पर धरती के बीच वाले हिस्सों यानी भूमध्य रेखा के आसपास ज्यादा जमा होता है. इससे धरती का संतुलन बदलता है और वह थोड़ी धीमी गति से घूमने लगती है. यही कारण है कि दिन की अवधि में बदलाव आ रहा है.
भविष्य के लिए चेतावनी
वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर जलवायु परिवर्तन इसी तरह जारी रहा, तो आने वाले समय में यह असर और बढ़ सकता है. इसका मतलब है कि सिर्फ मौसम ही नहीं, बल्कि धरती का संतुलन भी बदलता रहेगा. यह धरती के हर हिस्से को प्रभावित कर रहा है. अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में ऐसे और बदलाव देखने को मिल सकते हैं, जिनका असर सीधे हमारी जिंदगी पर पड़ेगा.




