साल 2026 में भारतीय शेयर बाजार एक बेहद अजीब मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है. एक तरफ जहां देश की दिग्गज कंपनियों के शेयरों पर भारी दबाव बना हुआ है, वहीं दूसरी तरफ छोटी कंपनियां लगातार रफ्तार पकड़ रही हैं. आंकड़ों पर नजर डालें तो इस साल निफ्टी में करीब 14% की बड़ी गिरावट आ चुकी है. इसके उलट, निफ्टी मिडकैप 150 इंडेक्स में सिर्फ 2% की मामूली गिरावट आई है, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 8% और निफ्टी माइक्रोकेप 250 इंडेक्स 15% तक चढ़ चुका है.

इस बड़े अंतर की मुख्य वजह विदेशी निवेशकों की आक्रामक बिकवाली है. विदेशी संस्थागत निवेशकों ने इस साल भारतीय बाजार से रिकॉर्ड 2.8 लाख करोड़ रुपये के शेयर बेचे हैं. इस भारी बिकवाली का सबसे ज्यादा असर बड़े लार्जकैप शेयरों पर पड़ा है.
लार्जकैप में बड़ा मौका, 2020 जैसे स्तर पर वैल्यूएशन
बाजार की इस उठापटक ने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जहां हाल के दिनों में सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाले लार्जकैप शेयर अब निवेशकों को सबसे सुरक्षित मौका दे रहे हैं. डीएसपी म्यूचुअल फंड ने बाजार के इस बंटवारे को एक बड़ा विरोधाभास बताया है. डीएसपी म्यूचुअल फंड के चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर अनीश तवाकले का कहना है कि इस समय जोखिम और मुनाफे का समीकरण पूरी तरह लार्जकैप के पक्ष में है. उनका मानना है कि निवेशकों को हालिया तेजी के पीछे भागने के बजाय उन हिस्सों में पैसा लगाना चाहिए, जो पिछले कुछ सालों में पीछे छूट गए हैं.
ब्रोकरेज फर्म नोमुरा के अनुसार, निफ्टी 50 फिलहाल अपने एक साल आगे के अनुमानित मुनाफे के मुकाबले 16.9 के पीई रेश्यो पर ट्रेड कर रहा है. ये स्तर कोरोना महामारी के बाद के 17 से 22 के दायरे से नीचे है. जून 2020 के कोरोना संकट के बाद निफ्टी पहली बार इतने सस्ते वैल्यूएशन पर आया है. नोमुरा ने निफ्टी के वैल्यूएशन मल्टीपल को 18.5 से घटाकर 17 कर दिया है और मार्च 2027 के लिए 24,000 का लक्ष्य रखा है.
एल्केमी कैपिटल मैनेजमेंट के डिप्टी सीआईओ आलोक अग्रवाल के मुताबिक, सितंबर 2024 में निफ्टी का पीई 21.5 था, जो सितंबर 2026 में घटकर 17.4 पर आ गया है. इस दौरान इंडेक्स में 11% की गिरावट आई, जबकि कंपनियों की कमाई लगातार बढ़ती रही. आलोक अग्रवाल का कहना है कि मौजूदा कीमतें पूरी तरह वाजिब हैं और लंबे समय के लिए बेहतर रिटर्न की शुरुआत आमतौर पर ऐसे ही स्तरों से होती है. डीएसपी के आंकड़ों के मुताबिक, निफ्टी 100 अपने पांच साल के औसत पीई से 12% की छूट पर मिल रहा है.
स्मॉलकैप में भारी जोखिम, क्या दोहराएगा पुराना इतिहास?
लार्जकैप के मुकाबले छोटी कंपनियों की स्थिति काफी चिंता पैदा करने वाली है. नोमुरा की रिपोर्ट बताती है कि निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 23.7 के पीई रेश्यो पर चल रहा है. ये महामारी से पहले के 1415 के दायरे से बहुत ज्यादा है. निफ्टी 50 के मुकाबले स्मॉलकैप का 39.3% का प्रीमियम पिछले एक दशक में सबसे ऊंचे स्तर पर है. डीएसपी के आंकड़ों से पता चलता है कि निफ्टी स्मॉलकैप 250 इंडेक्स 33 के पीई पर और निफ्टी मिडकैप 150 इंडेक्स 27.6 के पीई पर कारोबार कर रहा है.
डीएसपी का साफ कहना है कि अब छोटी कंपनियों को अपने इस ऊंचे वैल्यूएशन को सही साबित करने के लिए बेहद शानदार नतीजे दिखाने होंगे. अगर नतीजे उम्मीद से थोड़े भी कमजोर रहे, तो बड़ी गिरावट आ सकती है. पिछले एक साल में स्मॉलकैप ने सेंसेक्स के मुकाबले 21.5% और मिडकैप ने 14.1% ज्यादा रिटर्न दिया है. इतिहास बताता है कि जब भी ऐसा बड़ा अंतर बना है, उसके बाद बाजार में तीखा सुधार आया है. साल 2007, 2010 और 2017 में भी जब स्मॉलकैप ने ऐसा शिखर छुआ था, तब अगले 24 महीनों में स्मॉलकैप में औसतन 30% और मिडकैप में 21% की तेज गिरावट दर्ज की गई थी.
डिफेंसिव सेक्टर सस्ते, साइक्लिकल शेयरों की चमक बढ़ी
मौजूदा बाजार का एक और पहलू सेक्टर्स का बदला हुआ मिजाज है. आमतौर पर प्राइवेट बैंक, आईटी और रोजमर्रा के सामान बनाने वाली एफएमसीजी कंपनियों को सुरक्षित माना जाता है. बाजार में हमेशा इन सेक्टर्स को साइक्लिकल शेयरों के मुकाबले करीब 70% तक का प्रीमियम मिलता रहा है. लेकिन अब ये ऐतिहासिक प्रीमियम पूरी तरह खत्म हो चुका है. ऐसा अंतर आखिरी बार साल 2007 के बूम के दौरान देखा गया था.
डीएसपी के सेक्टर विश्लेषण से साफ है कि आईटी, प्राइवेट बैंक, एफएमसीजी और वित्तीय सेवाओं में रिटर्न अपने पुराने रिकॉर्ड के मुकाबले पूरी तरह धुल चुके हैं. दूसरी तरफ सरकारी बैंक, कैपिटल गुड्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और टेलीकॉम जैसे साइक्लिकल सेक्टर अपने पुराने औसत से काफी ऊपर ट्रेड कर रहे हैं. नोमुरा ने भी पाया है कि फाइनेंशियल, आईटी और कंजम्पशन सेक्टर के वैल्यूएशन में भारी गिरावट आई है. नोमुरा का रुख फाइनेंशियल और आईटी पर पॉजिटिव है, जबकि उसने कंजम्पशन सेक्टर को लेकर सतर्क रहने की सलाह दी है.
लंबी अवधि के निवेशकों के लिए मुनाफे की सही प्लान
ऐसे बाजार में आम निवेशकों को क्या रास्ता चुनना चाहिए? नोमुरा की सलाह है कि निवेशकों को सिर्फ हवाहवाई बातों के पीछे भागने से बचना चाहिए. निवेशकों को उन सेक्टर्स पर ध्यान देना चाहिए जहां वैल्यूएशन सस्ता है और कारोबार मजबूत है. ब्रोकरेज फर्म ने ऑटो एंसिलरी, इंजीनियरिंग, फार्मा, बिजली उपकरण, डेटा सेंटर, पावर इंफ्रास्ट्रक्चर और एआई आधारित आईटी सेवाओं को पसंदीदा बताया है.
अगर कोई निवेशक मिडकैप और स्मॉलकैप में बना रहना चाहता है, तो उसे बाजार से पूरी तरह बाहर निकलने की जरूरत नहीं है. अनीश तवाकले की सलाह है कि ऐसे समय में अनुभवी फंड मैनेजरों के जरिए ही निवेश करना सही रहता है. वहीं आलोक अग्रवाल का मानना है कि कम से कम सात साल का नजरिया रखने वाले और मंदी के झटके झेलने की क्षमता रखने वाले निवेशक अपने कुल इक्विटी पोर्टफोलियो का 35% से 50% हिस्सा मिडकैप और स्मॉलकैप में रख सकते हैं. लेकिन ये फैसला संभावित रिटर्न को देखकर नहीं, बल्कि गिरावट सहने की अपनी क्षमता के आधार पर लेना चाहिए.
बाजार का मौजूदा जोखिम और मुनाफे का समीकरण साफ तौर पर लार्जकैप के पक्ष में दिख रहा है. छोटी कंपनियों के पास गलती की कोई गुंजाइश नहीं बची है. ऐसे में असली समझदारी उन शेयरों के पीछे भागने में नहीं है जो पहले ही बहुत दौड़ चुके हैं, बल्कि उन मजबूत लार्जकैप कंपनियों को पहचानने में है जहां विदेशी बिकवाली का सारा असर कीमतों में पहले ही समा चुका है.



