संभल में ताजिया जुलूस के नए रूट पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला आया है. कोर्ट ने नए रूट की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है. याचिकाकर्ताओं ने रेलवे लाइन के विद्युतीकरण के बाद पुराना पारंपरिक मार्ग बंद होने पर नए रूट की अनुमति मांगी थी इस पर कोर्ट ने कहा कि किसी विशेष मार्ग से धार्मिक जुलूस निकालना मौलिक अधिकार का हिस्सा नहीं. कोर्ट ने साफ किया कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, सार्वजनिक शांति और कानूनव्यवस्था के अधीन है.

प्रस्तावित नए मुख्य मार्ग का दूसरे समुदायों द्वारा विरोध किया जा रहा था, जिससे तनाव की स्थिति बन सकती थी. प्रशासन द्वारा नए रूट की अनुमति न मिलने पर हाईकोर्ट में पीआईएल दाखिल की गई थी. इस मामले में कोर्ट ने माना कि प्रशासन द्वारा शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए नए रूट की अनुमति न देने का फैसला पूरी तरह सही है.

याचिकाकर्ता तय समझौते की शर्तों को मानने के लिए बाध्य

हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता साल 2023 में प्रशासन के साथ हुए तय समझौते की शर्तों को मानने के लिए बाध्य है. बता दें कि मामला संभल जिले के हजरतनगर गढ़ी क्षेत्र से जुड़ा हुआ है. याचिकाकर्ताओं की मांग थी कि उन्हें मुहर्रम के दौरान ताजिया और अलम जुलूस को एक नए मार्ग से निकालने की अनुमति दी जाए.

शरीफ अहमद और अन्य की याचिका पर कोर्ट का फैसला

इसके साथ ही कहा गया कि साल 1952 से 2022 तक यह जुलूस एक तय पारंपरिक रास्ते से निकलता था. याचिकाकर्ता शरीफ अहमद और अन्य की याचिका पर कोर्ट ने फैसला सुनाया. जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस अरूण कुमार की डिविजन बेंच ने आदेश दिया.

मोहर्रम कब है?

इस्लाम में मोहर्रम साल के सबसे पाक महीनों में से एक है. इस्लामी कैलेंडर का यह पहला महीना है. इसी के साथ नए हिजरी साल की शुरुआत होती है. मोहर्रम त्याग, बलिदान, न्याय और सत्य की याद दिलाने वाला महीना माना जाता है. मोहर्रम के 10वें दिन को आशूरा कहते हैं. इसे खास तौर से अहम माना जाता है. इस दिन पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद किया जाता है.