देश की बड़ी म्यूचुअल फंड कंपनियों में शुमार ICICI प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड ने एक ऐसा फंड लांच किया है. जिसका मकसद ऐसी कंपनियों और शेयरों को तलाशना है, जिन्हें फिलहाल बाजार पसंद नहीं कर रहा है, लेकिन जिनमें आगे सुधार की संभावना हो सकती है. बाजार की भाषा में इसे कॉन्ट्रेरियन इन्वेस्टिंग कहा जाता है. तो क्या है कॉन्ट्रेरियन इन्वेस्टिंग और यह कैसे काम करता है. आइए समझते हैं.

यह एक ओपनएंडेड इक्विटी स्कीम है जो कॉन्ट्रेरियन इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी पर काम करती है. कॉन्ट्रेरियन इन्वेस्टमेंट इस सोच पर आधारित है कि बाजार अक्सर एसेट्स की गलत कीमत तय करते हैं और यह गलत कीमत तय होना हर एसेट क्लास की एक स्वाभाविक विशेषता है. इस फंड में आप 12 अक्टूबर तक निवेश कर सकते है.
कैसे पहचाने सही समय
यह स्कीम ऐसे मौकों की पहचान करने के लिए आम राय से हटकर और रिसर्च पर आधारित तरीका अपनाती है. इसका लक्ष्य ऐसे निवेशक हैं जो लंबे समय के नजरिए से निवेश करना चाहते हैं और बाजार के मूड या धारणा के बदलने का इंतजार करने को तैयार हैं. इस स्कीम को संकरन नरेन, धर्मेश कक्कड़, साक्षात गोयल और गौरव चिकने मिलकर मैनेज करेंगे. ICICI प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड के ED और CIO संकरन नरेन ने कहा, “कॉन्ट्रेरियन इन्वेस्टिंग का मतलब सिर्फ़ सस्ती चीज़ें खरीदना नहीं है. इसके लिए मजबूत रिसर्च और लंबे समय का नजरिया चाहिए. कॉन्ट्रेरियन इन्वेस्टिंग की खासियत यह है कि हम तब खरीदते हैं जब किसी स्टॉक की मांग कम हो, जब खरीदारों के मुकाबले बेचने वाले ज़्यादा हों और इसलिए उसकी कीमत काफी गिर गई हो. उनके मुताबिक, इस स्कीम में अलगअलग मार्केट कैपिटलाइजेशन में निवेश करने की सुविधा है, लेकिन हमारा मुख्य फोकस उन स्टॉक्स की पहचान करना होगा जिनका प्रदर्शन खराब रहा है. जरूरी बात यह है कि रिसर्च के जरिए सही निवेश को पहचाना जाए और इंतजार करने का धैर्य रखा जाए, क्योंकि कॉन्ट्रेरियन स्थिति में बदलाव जल्दी नहीं आता.
कैसे काम करती है कॉन्ट्रा स्ट्रैटेजी
इस रणनीति की सोच है कि बाजार हमेशा किसी कंपनी या एसेट की सही कीमत नहीं लगाता। कई बार खराब सेंटीमेंट, डर या किसी अस्थायी समस्या की वजह से अच्छी कंपनियों के शेयर भी काफी नीचे आ जाते हैं।
ऐसे में कॉन्ट्रेरियन निवेशक भीड़ के साथ चलने के बजाय यह देखता है कि
- क्या शेयर जरूरत से ज्यादा गिर चुका है?
- कंपनी की बुनियाद मजबूत है या नहीं?
- समस्या अस्थायी है या स्थायी?
- भविष्य में कमाई सुधर सकती है या नहीं?
- बाजार का नजरिया बदलने पर शेयर में कितना अपसाइड हो सकता है?
कैसे होता है इसमें निवेश
निवेश शुरू करते समय टीम आम राय से हटकर सोचसमझकर रास्ता चुन सकती है. यह ऐसी कंपनियां ढूंढती है जिनका डेटटूइक्विटी रेश्यो सही हो, संस्थागत हिस्सेदारी पर नजर रखती है और ऐसे मौकों की तलाश करती है जहाँ सेंटीमेंट कमजोर हो लेकिन सामान्य होती कमाई से आगे बढ़ने की संभावना हो. साथ ही, यह उन सेक्टरों का भी ध्यान से मूल्यांकन करती है जिनमें बड़े बदलाव या उथलपुथल हुई हो. जब ‘कॉन्ट्रेरियन मिसप्राइसिंग’ खत्म हो जाए, सेंटीमेंट बदल जाए, या कोई बेहतर स्टॉक मिल जाए , तब उस स्टॉक से बाहर निकला जा सकता है. मार्केट के हर कोने में गलत प्राइसिंग होती है, जिससे कॉन्ट्ररियन मौके बनते हैं. इस उलझन में कई चुनौतियां शामिल हैं, जैसे ग्लोबल ग्रोथ की चिंताएं, वेस्टएशिया में तनाव, विदेशी संस्थागत निवेशकों का पैसा निकालना, सेक्टर में बड़े बदलाव, सेंट्रल बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी, साइक्लिक मंदी, बहुत ज़्यादा कर्ज वाली कंपनियां, वैल्यूएशन और कमाई, और रुपये की गिरती कीमत वगैरह.
भारत और अमेरिका में निवेश के पैटर्न में अंतर
उदाहरण के लिए अमेरिका में S&P 500 इंडेक्स की टॉप 10 कंपनियों का हिस्सा अब 38% है, जबकि 2016 में यह 19% था. ऐसा इसलिए है क्योंकि कुछ चुनिंदा कंपनियों का दबदबा और AI को लेकर भारी उत्साह वैल्यूएशन को ऐतिहासिक ऊंचाई पर ले जा रहा है. इसके उलट, भारत में मार्केट में ज़्यादा कंपनियों की भागीदारी दिखती है, लेकिन अलगअलग सेक्टर से मिलने वाला रिटर्न मिलाजुला और असमान है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। यह अंतर भारत में कॉन्ट्ररियन मौके दिखाता है, जहां पिछड़ने वाले सेक्टर साइक्लिक रिकवरी के लिए अच्छी स्थिति में हैं क्योंकि मार्केट की असमानताएं कम हो रही हैं.



