उन्हें घुड़सवारी, तीरंदाजी और तलवार चलाने का शौक था. उन्होंने समय के साथ प्रशिक्षण भी लिया. अभ्यास भी किया. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। मातापिता ने उन्हें बेटी होने का एहसास नहीं होने दिया. यह उस जमाने की बात है जब लड़कियों को ऐसे प्रशिक्षण के अवसर न के बराबर मिलते थे. लेकिन उन्होंने हर कला मन लगाकर सीखी. वह तेज दिमाग की थीं. उन्हें अपने लोगों और अपनी धरती से गहरा लगाव था. ऐसी थीं रानी चेन्नम्मा. उन्होंने जीवन में बहुत दुख देखे लेकिन जनता के हितों को सर्वोपरि रखा.

आइए, रानी चेन्नम्मा की जन्म जयंती पर उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ किस्से जानते हैं. रानी चेन्नम्मा का जन्म 23 अक्टूबर 1778 को के काकती नाम के गांव में हुआ था. यह गांव आज के बेलगावी जिले में है. उनके पिता का नाम धुलप्पा गौड़ देसाई और माता का नाम पद्मावती था. परिवार में उन्हें भरपूर प्यार और सम्मान मिला.

चेन्नम्मा बचपन से ही निडर थीं. चेन्नम्मा का विवाह कित्तूर के राजा मल्लसर्ज से हुआ. कित्तूर आज के कर्नाटक में स्थित एक छोटा, पर समृद्ध राज्य था. विवाह के बाद चेन्नम्मा कित्तूर की रानी बनीं. उन्होंने राज परिवार और राज्य के कामकाज को समझा. वह केवल महल तक सीमित नहीं रहीं. वह लोगों की समस्याएं सुनतीं और उनकी सहायता करने का प्रयास करतीं. रानी चेन्नम्मा ने अपने राज्य में न्याय और व्यवस्था को महत्व दिया. वह प्रजा के दुखदर्द को समझती थीं. उनके लिए राजपाट केवल शक्ति का साधन नहीं था. वह इसे लोगों की सेवा की जिम्मेदारी मानती थीं.

पतिबेटे की मौत के बाद भी रानी जनता के साथ खड़ी रहीं

रानी के जीवन में कई दुख आए. उनके पति राजा मल्लसर्ज का निधन हो गया. उनके पुत्र की मृत्यु ने भी उन्हें गहरा आघात पहुंचाया. इसके बाद कित्तूर के सामने उत्तराधिकारी का सवाल खड़ा हुआ. चेन्नम्मा ने शिवलिंगप्पा नाम के एक बालक को गोद लिया और उसे राज्य का उत्तराधिकारी माना. उस समय अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी भारत के अनेक राज्यों पर अपना नियंत्रण बढ़ा रही थी. कंपनी ने शिवलिंगप्पा को कित्तूर का वैध उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया. अंग्रेज अधिकारियों ने राज्य पर अधिकार करने की कोशिश की. रानी ने इसे अपने राज्य के अधिकारों में दखल माना.

चेन्नम्मा का विवाह कित्तूर के राजा मल्लसर्ज से हुआ.

अंग्रेजों के सामने रानी का दो टूक जवाब

रानी चेन्नम्मा ने अंग्रेजों को साफ संदेश दिया. कित्तूर की सत्ता और उसके भविष्य का फैसला कित्तूर के लोग और उनका राज परिवार करेंगे. उन्होंने अपने राज्य को बचाने का निश्चय किया. रानी ने अधिकारियों से बातचीत की कोशिश भी की. लेकिन अंग्रेजों ने उनकी बात नहीं मानी. चेन्नम्मा ने हार मानने के बजाय अपने सैनिकों को तैयार किया. उन्होंने राज्य के सरदारों और लोगों को एकजुट किया. उनके सेनापति और सहयोगी भी उनके साथ खड़े हुए. इनमें गुरु सिद्दप्पा का नाम खास तौर पर याद किया जाता है.

आसान नहीं था कित्तूर संघर्ष लेकिन डटी रहीं रानी

1824 में अंग्रेजी सेना ने कित्तूर पर हमला किया. रानी चेन्नम्मा ने अपनी सेना का नेतृत्व किया. वह युद्ध के मैदान में डटकर खड़ी रहीं. उनके सैनिकों ने भी साहस से मुकाबला किया. शुरुआती संघर्ष में कित्तूर की सेना ने अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी. कित्तूर के सैनिकों ने अंग्रेजी सेना के एक अधिकारी, सेंट जॉन ठाकरे को मार गिराया. इस जीत से अंग्रेजों को बड़ा झटका लगा. लेकिन संघर्ष यहीं नहीं रुका. अंग्रेजों ने अधिक सैनिक और हथियार जुटाए. उन्होंने कित्तूर को चारों ओर से घेर लिया. रानी और उनके साथियों ने कई दिनों तक प्रतिरोध किया. सैनिकों की संख्या और साधनों में अंतर था. फिर भी रानी ने अपने राज्य की रक्षा के लिए पूरी शक्ति लगा दी. यह लड़ाई केवल एक किले की रक्षा नहीं थी. यह अपने अधिकार और सम्मान को बचाने की लड़ाई थी.

रानी चेन्नम्मा का संघर्ष अंग्रेजी शासन के शुरुआती दौर में हुआ था.

कई वर्षों तक अंग्रेजों की कैद में रहीं रानी

लंबे संघर्ष के बाद अंग्रेजों ने कित्तूर पर कब्जा कर लिया. रानी चेन्नम्मा को गिरफ्तार कर बेलहोंगल के किले में रखा गया. वह कई वर्षों तक कैद में रहीं. उनका निधन 21 फरवरी 1829 को हुआ. रानी अपने राज्य को स्वतंत्र नहीं बचा सकीं. फिर भी उनका साहस लोगों की स्मृति में जीवित रहा. उन्होंने यह दिखाया कि अन्याय के सामने चुप रहना जरूरी नहीं. एक दृढ़ निश्चयी व्यक्ति बड़ी ताकत को भी चुनौती दे सकता है.

अनेक रूपों में आज भी जीवित हैं रानी चेन्नम्मा

रानी चेन्नम्मा को कर्नाटक की वीरांगना के रूप में याद किया जाता है. उनका संघर्ष अंग्रेजी शासन के शुरुआती दौर में हुआ था. वह उन भारतीय शासकों में थीं जिन्होंने अपने राज्य के अधिकारों के लिए खुलकर विरोध किया. उनकी कहानी यह भी सिखाती है कि नेतृत्व का अर्थ केवल आदेश देना नहीं है. सच्चा नेतृत्व कठिन समय में लोगों के साथ खड़े होने में है. रानी ने अपने सैनिकों और प्रजा को हिम्मत दी. उन्होंने दिखाया कि साहस उम्र, लिंग या पद पर निर्भर नहीं करता. कर्नाटक में रानी चेन्नम्मा की स्मृति अनेक रूपों में जीवित है. उनके नाम पर शिक्षण संस्थान, सड़कें और सार्वजनिक स्थल हैं. कित्तूर में उनके संघर्ष को याद किया जाता है. हर साल लोग उनके जन्म और बलिदान को सम्मान से याद करते हैं.

क्या है रानी चेन्नम्मा की विरासत?

रानी चेन्नम्मा का जन्मदिवस हमें उनके जीवन से प्रेरणा लेने का अवसर देता है. उनका जीवन बताता है कि अपने अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए दृढ़ रहना चाहिए. उन्होंने कठिनाइयों के आगे झुकने से इनकार किया. उन्होंने अपने राज्य और लोगों के लिए संघर्ष किया. आज भी उनकी कहानी बच्चों और युवाओं को साहस, आत्मसम्मान और जिम्मेदारी का संदेश देती है. रानी चेन्नम्मा केवल इतिहास की एक रानी नहीं हैं. वह अपने समय की साहसी नेता थीं. उनकी याद हमें यह विश्वास दिलाती है कि एक व्यक्ति का निश्चय पूरे समाज को प्रेरित कर सकता है. रानी चेन्नम्मा का जीवन संघर्ष से भरा था. लेकिन उनका नाम हार के साथ नहीं, बल्कि साहस और स्वाभिमान के साथ लिया जाता है. यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है.