भारत में बाल विवाह कानूनी रूप से प्रतिबंधित है, लेकिन गुजरात के वाडिया में कई परिवार अपनी बेटियों की कम उम्र में सगाई को एक तरह का सुरक्षा कवच मानते हैं- एक ऐसा रास्ता, जिससे वे शादी के बाद गांव से बाहर जा सकें और देह व्यापार में धकेले जाने से बच जाएं.

बचपन में ‘सगाई’ या देह व्यापार…गुजरात के वाडिया गांव में कई बच्चियों के सामने मानो जीवन की राह इन्हीं दो विकल्पों के बीच सिमटकर रह गई है. देह व्यापार से जुड़ी अपनी पुरानी पहचान का बोझ ढो रहे इस गांव में यह किसी गुजरे दौर की कहानी नहीं, बल्कि आज की हकीकत है. यहां कई परिवार अपनी बेटियों को उस दलदल से बचाने की कोशिश में महज सात साल की उम्र में उनकी सगाई कर देते हैं, जिसमें पीढ़ियों से उनके परिवार की महिलाएं फंसती रही हैं.
अहमदाबाद से करीब 200 किलोमीटर दूर स्थित वाडिया उस भारत से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है, जहां लैंगिक समानता, शिक्षा और बेहतर भविष्य की आकांक्षाओं की बात होती है. यहां की महिलाएं उन भूमिकाओं की बेड़ियां तोड़ने के लिए संघर्ष कर रही हैं, जिन्हें इतिहास और सामाजिक परिस्थितियों ने पीढ़ियों से उनपर थोप रखा है. परंपरागत रूप से घुमंतू समुदाय के इस गांव में महिलाओं को दशकों से देह व्यापार में धकेला जाता रहा है, जबकि परिवार के पुरुष उनके लिए ‘ग्राहक’ तलाशने का काम करते रहे हैं. यह सिलसिला आज भी पूरी तरह थमा नहीं है.
करीब 750 लोगों की आबादी वाले इस गांव की महिलाएं आज भी सामाजिक बेड़ियों को तोड़ने के लिए संघर्ष कर रही हैं. हर सुबह गांव के कुछ पुरुष पालनपुर-थराद राजमार्ग पर काम की तलाश में नहीं, बल्कि राहगीरों, ट्रक चालकों और आसपास के इलाकों से आने वाले पुरुषों को अपनी महिलाओं के लिए ग्राहक बनाने के इरादे से जाते हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। लैंगिक समानता और शिक्षा की बातों के बीच वाडिया गांव उस भारत की तस्वीर दिखाता है, जहां बेटियां सुरक्षित भविष्य के लिए बचपन की कुर्बानी देने को मजबूर हैं.
वाडिया गांव में देह व्यापार के दलदल से अपनी बेटियों को दूर रखने के लिए परिवार एक ऐसी मजबूरी का सहारा ले रहे हैं, जो खुद समाज में एक बुराई मानी जाती है. यहां एक कुप्रथा से बेटियों को बचाने के लिए बचपन में ही उनकी सगाई कराई जा रही है. गांव में यह एक अलिखित नियम बन चुका है कि जिस लड़की की सगाई या शादी तय हो जाती है, उसे देह व्यापार में नहीं धकेला जाएगा.
गांव की पली-बढ़ी 19 साल की एक युवती इस पूरे अंतर्विरोध और संघर्ष की जीती-जागती मिसाल है. उसकी मां और दादी दोनों इसी धंधे से जुड़ी रही हैं, लेकिन वह अब गांव से दूर एक कॉलेज में नर्सिंग की पढ़ाई कर रही है. शादीशुदा हो चुकी इस युवती ने बताया कि जब उसका रिश्ता तय हुआ, तब उसकी उम्र महज 11 साल थी.
नाम न छापने की शर्त पर युवती ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि उसने बचपन से अपने पिता और रिश्तेदारों को मां और दादी के लिए ग्राहक लाते देखा. गरीबी के चलते यह वहां की आम व्यवस्था बन चुकी थी. हालात इतने बिगड़े थे कि उसकी मां को यह भी पक्के तौर पर नहीं पता था कि जिन्हें वह पिता मानती है, वही उसके असली पिता हैं. इसके बावजूद मां ने ठान लिया था कि बेटी को इस रास्ते पर नहीं जाने देंगी. नतीजतन 11 साल की उम्र में सामूहिक समारोह में उसकी सगाई करा दी गई और 18 साल की होते ही शादी कर दी गई.
ऐसी ही कहानी चंद्रा सरानिया की भी है. 15 साल की उम्र में देह व्यापार में धकेली गईं चंद्रा अब एक छोटी डेरी चलाती हैं. उनके परिवार को 1963 में सरकार से खेती की जमीन मिली थी, लेकिन सिंचाई के अभाव में कमाई नहीं हुई और मजबूरी में उन्हें इस काम में उतरना पड़ा. उन्होंने इसी कमाई से दो बेटों और एक बेटी को पाला. चंद्रा बताती हैं कि जब उन्होंने बेटी की शादी की बात उठाई तो लोगों ने कहा कि यह यहां की लड़कियों की नियति है. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी, 12 साल की उम्र में बेटी की सगाई कराई और 18 की उम्र में विवाह करवाकर उसका भविष्य सुरक्षित कर दिया. सामाजिक कार्यकर्ताओं और परिवारों की यह पहल अब कई बच्चियों को नई राह दिखा रही है.



