ईरान के साथ युद्ध की स्थिति को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। शनिवार को अमेरिका और यूरोप के कई शहरों में ‘नो किंग्स’ रैलियां निकाली गईं। इन रैलियों में लाखों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरे और ट्रंप सरकार के फैसलों के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर किया।
प्रदर्शनों का मुख्य केंद्र रहा मिनेसोटा
अमेरिका का मिनेसोटा राज्य इन विरोध प्रदर्शनों का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा। सेंट पॉल में स्थित मिनेसोटा कैपिटल के बाहर हजारों लोग जमा हुए। प्रदर्शन के दौरान कई लोगों ने अमेरिका के झंडे को उल्टा पकड़ रखा था, जिसे संकट या परेशानी का ऐतिहासिक संकेत माना जाता है।
🚨 Official count confirmed:
More than 8 million people participated in No Kings Day today.
One of the largest single-day demonstrations in American history.
3,000 cities. Every state. Every coast.
Philadelphia. Atlanta. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। Dallas. St. Paul. DC. San Francisco. San Diego. New…— Brian Allen (@allenanalysis)
रैलियों में जुटी भारी भीड़
आयोजकों के अनुसार, इस बार करीब 90 लाख लोगों के शामिल होने की उम्मीद जताई गई थी। इससे पहले जून में हुई रैलियों में 50 लाख और अक्टूबर में 70 लाख लोग शामिल हुए थे। हालांकि, इस बार के सटीक आंकड़े आने अभी बाकी हैं, लेकिन अमेरिका के सभी 50 राज्यों में 3,100 से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए गए।
सरकार और विरोधियों की प्रतिक्रिया
व्हाइट हाउस की प्रवक्ता एबिगेल जैक्सन ने इन रैलियों को वामपंथी संगठनों की साजिश बताया है। वहीं, नेशनल रिपब्लिकन कांग्रेसनल कमिटी (NRCC) ने भी इसकी कड़ी आलोचना करते हुए इसे ‘अमेरिका-विरोधी’ मंच करार दिया। उनका कहना है कि इन रैलियों के जरिए हिंसक विचारधारा को बढ़ावा दिया जा रहा है।
दुनिया भर में फैला विरोध प्रदर्शन
यह विरोध सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है। ब्रिटेन, इटली और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी प्रदर्शनों की योजना बनाई गई है। जिन देशों में राजा का शासन है, वहां इन रैलियों को ‘नो टाइरेंट्स’ (कोई तानाशाह नहीं) नाम दिया गया है। रोम और लंदन में प्रदर्शनकारियों ने ईरान पर इजरायल और अमेरिका के हमलों का विरोध किया और नस्लवाद के खिलाफ नारे लगाए।




