FD Interest Rates: पिछले चार साल से फिक्स्ड डिपॉजिट पर कम ब्याज से जूझ रहे निवेशकों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है. रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की तीन दिन चली बैठक के बाद बुधवार, 7 अक्टूबर को नीतिगत दरों में बढ़ोतरी का फैसला सुनाया गया. केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट को 5.25 फीसदी से बढ़ाकर 5.50 फीसदी कर दिया है. फरवरी 2023 के बाद ये पहला मौका है जब रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में इजाफा किया है. इससे पहले लगातार दरों में कटौती या ठहराव का रुख बना हुआ था.

दुनिया भर में भूराजनीतिक तनाव, कच्चे तेल के ऊंचे भाव और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सख्त फैसलों के चलते महंगाई का जोखिम लगातार गहरा रहा था. भारत में भी अगस्त के महीने में खुदरा महंगाई दर 4.84 फीसदी दर्ज की गई थी. हालांकि ये आंकड़ा रिजर्व बैंक के 6 फीसदी के तय दायरे के भीतर था, लेकिन इसमें तेजी का रुझान साफ दिख रहा था. इसी महंगाई पर लगाम कसने के लिए केंद्रीय बैंक ने दरों में 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी का कदम उठाया है.
बैंकों पर एफडी दरें बढ़ाने का बढ़ता दबाव
आरबीआई के इस एलान के कुछ ही देर बाद गैरबैंकिंग वित्तीय कंपनी बजाज फाइनेंस ने अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट दरों में 0.40 फीसदी तक की बढ़ोतरी कर दी. जानकारों का मानना है कि अब सरकारी और निजी बैंक भी अपनी एफडी दरों में जल्द बदलाव करेंगे. बैंकबाजार के सीईओ आदिल शेट्टी के मुताबिक, नई जमाओं पर सबसे पहले बढ़ी हुई दरों का फायदा मिलेगा. इसके साथ ही ग्राहकों को ये भी देखना होगा कि उनके कर्ज और जमा पूंजी पर इस बदलाव का कैसा असर पड़ता है.
बैंकों पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव सिर्फ रेपो रेट की वजह से ही नहीं है, बल्कि इसके पीछे नकदी का गणित भी है. 2 अक्टूबर 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, बैंकों का क्रेडिटडिपॉजिट रेशियो 80.83 फीसदी के स्तर पर बना हुआ था. बैंकों के पास 27.62 लाख करोड़ रुपये की कुल जमा के मुकाबले 22.33 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बंटा हुआ था. जब बैंक ज्यादा कर्ज बांटते हैं और जमा की रफ्तार धीमी होती है, तो उन्हें नई पूंजी जुटाने के लिए एफडी पर बेहतर ब्याज देना ही पड़ता है. इसके अलावा डाकघर की सीनियर सिटीजन सेविंग्स स्कीम और सुकन्या समृद्धि योजना में 8.2 फीसदी तक का तय ब्याज मिल रहा है. वहीं सरकारी बॉन्ड पर यील्ड 6.79 फीसदी से लेकर 7.22 फीसदी के दायरे में चल रही है. ऐसे में निवेशकों को अपने पास खींचने के लिए बैंकों को एफडी दरें आकर्षक बनानी ही होंगी.
किस समय, किन अवधियों में बढ़ेगा ज्यादा फायदा
माईमनीमंत्रा के संस्थापक राज खोसला का कहना है कि बैंकों के लिए ब्याज दरें तुरंत बढ़ाने का कोई सरकारी नियम तय नहीं होता. आमतौर पर बैंक आरबीआई के नीतिगत बदलाव के कुछ दिनों से लेकर 4 से 6 हफ्तों के भीतर अपनी दरों को बदलते हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। ये पूरी तरह बैंकों की परिचालन स्थिति और नकदी की जरूरत पर निर्भर करता है.
हालांकि, क्या बैंक लंबी अवधि की एफडी पर भी ब्याज बढ़ाएंगे? मीरा मनी के कोफाउंडर आनंद राठी का मानना है कि बैंक लंबी अवधि की जमा पर शायद बहुत ज्यादा दरें न बढ़ाएं. बैंकों को लगता है कि महंगाई का मौजूदा दबाव थोड़े समय के लिए ही है. इसलिए बैंक लंबे समय के लिए महंगे ब्याज का बोझ उठाने से बचना चाहेंगे. बैंक सबसे पहले छोटी या मध्यम अवधि की नई एफडी पर ही ब्याज दरें बढ़ा सकते हैं. फिलहाल स्मॉल फाइनेंस बैंक 7.10 फीसदी से लेकर 8.10 फीसदी तक का ब्याज दे रहे हैं, जबकि प्रमुख सरकारी बैंक 6.45 से 6.60 फीसदी और निजी बैंक 6.30 से 7 फीसदी के आसपास ब्याज दे रहे हैं.
निवेशकों के लिए क्या है सही प्लान
जिन लोगों की एफडी पहले से चल रही है, उन्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है. उनकी जमा पूंजी पर पहले से तय दर के हिसाब से ही ब्याज मिलता रहेगा. लेकिन नए निवेश या रिन्यूअल के लिए ये समय काफी अनुकूल हो सकता है. जानकारों का कहना है कि ऐसे समय में निवेशकों को ‘लैडरिंग’ का तरीका अपनाना चाहिए.
लैडरिंग का मतलब ये है कि अपने सारे पैसे को किसी एक बड़ी एफडी में एक साथ न बांधें. इसके बजाय अपनी कुल रकम को छोटेछोटे हिस्सों में बांटकर अलगअलग समय पर मैच्योर होने वाली एफडी में लगाएं. इससे आपकी कुछ एफडी नियमित अंतराल पर पूरी होती रहेंगी. जब वो मैच्योर होंगी, तब आप उस पैसे को उस समय की बढ़ी हुई ब्याज दरों पर दोबारा लगा सकेंगे. साथ ही किसी इमरजेंसी में आपके पास जरूरत भर का पैसा भी उपलब्ध रहेगा. इस तरीके से निवेशक ब्याज दरों में होने वाले उतारचढ़ाव के बीच भी लगातार बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं.



