
नई दिल्ली. दक्षिणी लेबनान के योहमोर गांव की शांत फिजाओं में जब आसमान से आग के गोले बरसे तो वो सिर्फ बम नहीं थे] वो सफेद मौत का तांडव था. इजरायल पर आरोप है कि उसने हिज्बुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाने के बहाने अंतरराष्ट्रीय कानूनों को ताक पर रखकर व्हाइट फॉस्फोरस का इस्तेमाल किया है. मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच की हालिया रिपोर्ट और जियोलोकेटेड तस्वीरों ने इस विवादित हथियार के इस्तेमाल की पुष्टि कर दुनिया को झकझोर दिया है.
क्या है यह सफेद मौत?
सफेद फॉस्फोरस कोई साधारण विस्फोटक नहीं बल्कि एक बेहद घातक रासायनिक पदार्थ है. मोम जैसा दिखने वाला यह रसायन जैसे ही हवा के संपर्क में आता है ऑक्सीजन के साथ खुद-ब-खुद जलने लगता है. इसकी भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह 815 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान पैदा करता है.
इंसानी शरीर 50-60 डिग्री की गर्मी में झुलसने लगता है. उसके लिए 815 डिग्री का तापमान साक्षात यमराज के समान है. जब यह रसायन त्वचा पर गिरता है तो यह मांस को गलाते हुए सीधा हड्डियों तक पहुंच जाता है. इसके घाव कभी ठीक नहीं होते और इससे निकलने वाला धुआं फेफड़ों को इस कदर छलनी कर देता है कि इंसान तिल-तिल कर दम तोड़ देता है.
जलती इमारतें और चीखते सन्नाटे
HRW के रिसर्चर रामजी कैस के मुताबिक इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान के योहमोर जैसे रिहायशी इलाकों में आर्टिलरी के जरिए फॉस्फोरस दागा है. चौंकाने वाली बात यह है कि यह हमला तब हुआ जब इजरायल ने पहले ही लोगों को इलाका खाली करने की चेतावनी दी थी. हालांकि जमीनी हकीकत यह है कि इन हमलों के समय वहां कितने नागरिक मौजूद थे इसका सटीक आंकड़ा अभी साफ नहीं है.
इजरायली सेना अक्सर यह तर्क देती है कि वह सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल केवल स्मोक स्क्रीन (धुआं पैदा करने) के लिए करती है ताकि दुश्मन की नजरों से बचा जा सके. लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत नागरिक आबादी के बीच इसका उपयोग अंधाधुंध नुकसान की श्रेणी में आता है जो एक युद्ध अपराध के समान है.
मानवीय संकट
लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट रूह कंपा देने वाली है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। 2 मार्च 2026 से 8 मार्च 2026 के बीच हुए हमलों में:
• कुल मौतें: 400 (जिनमें 83 बच्चे और 42 महिलाएं शामिल हैं)
• घायल: 1130 से अधिक
• निशाना: दक्षिणी लेबनान, बेकां घाटी और बेरूत के रिहायशी इलाके.
स्वास्थ्य मंत्री राकान नासरेद्दीन ने इसे एक गहरा मानवीय संकट करार दिया है. रिहायशी इलाकों में इस केमिकल का गिरना न केवल तत्काल मौत का कारण बन रहा है बल्कि जीवित बचे लोगों के लिए ऑर्गन फेलियर और गहरे इन्फेक्शन जैसी लाइलाज बीमारियां भी छोड़ जा रहा है.






