Monday, March 9, 2026
Business

अरे ये क्या! बैंक को बस टारगेट पूरा करना है, ग्राहकों को बेच रहे गलत प्रोडक्ट; कहीं आप भी तो नहीं हो रहे शिकार!..

अरे ये क्या! बैंक को बस टारगेट पूरा करना है, ग्राहकों को बेच रहे गलत प्रोडक्ट; कहीं आप भी तो नहीं हो रहे शिकार!..
अरे ये क्या! बैंक को बस टारगेट पूरा करना है, ग्राहकों को बेच रहे गलत प्रोडक्ट; कहीं आप भी तो नहीं हो रहे शिकार!..

Banking Sector : अगर आप फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) रिन्यू कराने के लिए बैंक जाते हैं और आपका रिलेशनशिप मैनेजर आपको उससे बेहतर रिटर्न देने वाले किसी निवेश प्लान का सुझाव देता है, तो ये सामान्य बात लगती है. ऐसे प्लान में टैक्स बेनिफिट, बाजार से जुड़े रिटर्न और लॉन्ग टर्म में एसेट्स बनाने के वादे किए जाते हैं. लेकिन कई मामलों में कुछ महीनों या सालों बाद ग्राहकों को पता चलता है कि जिस प्रोडक्ट में उन्होंने निवेश किया, उसमें लंबा लॉक-इन पीरियड, जटिल शर्तें और उम्मीद से कम रिटर्न होता है. देश में बड़ी संख्या में ग्राहकों ने ऐसी ही शिकायतें की हैं.

आमतौर पर लोग इसके लिए सबसे पहले बैंक के रिलेशनशिप मैनेजर को जिम्मेदार ठहराते हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। हालांकि, बैंक कर्मचारियों से बातचीत और इंडस्ट्री के आंकड़े बताते हैं कि इसके पीछे अक्सर बैंकों की आक्रामक सेल्स टारगेट संस्कृति भी बड़ी वजह होती है.

बैंक कर्मचारियों पर भारी सेल्स दबाव
भारत के बैंकिंग सिस्टम में बीमा और निवेश प्रोडक्ट्स की मिस-सेलिंग को लेकर लंबे समय से शिकायतें सामने आती रही हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण आक्रामक सेल्स टारगेट और कमीशन बेस्ड व्यवस्था है.

15 राज्यों के 20 बैंकों में सर्वे
1 फाइनेंस मैगजीन द्वारा 15 राज्यों के 20 बैंकों के 1,655 रिलेशनशिप मैनेजरों पर किए गए एक सर्वे में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए. 84% से अधिक कर्मचारियों ने कहा कि उन्हें सेल्स टारगेट पूरा करने का भारी दबाव झेलना पड़ता है. 57.56% कर्मचारियों ने माना कि उन्हें कभी-कभी ‘किसी भी कीमत पर’ वित्तीय उत्पाद बेचने के निर्देश दिए जाते हैं, भले ही वह ग्राहक के लिए उपयुक्त न हो. 51.52% कर्मचारियों ने बताया कि टारगेट पूरा न होने पर उन्हें नौकरी जाने का डर रहता है. कई कर्मचारियों ने सर्वे में अपनी परेशानियां भी साझा कीं.

एक निजी बैंक के रिलेशनशिप मैनेजर ने कहा, ‘हर सुबह रिव्यू मीटिंग में डांट पड़ती है और अवास्तविक टारगेट दिए जाते हैं. इससे रोज नौकरी छोड़ने का मन करता है.’ एक अन्य कर्मचारी ने बताया कि कई बार लोन से जुड़े फैसलों में भी प्रोडक्ट बिक्री का दबाव होता है. हमें कहा जाता है कि अगर ग्राहक बीमा पॉलिसी नहीं खरीदता, तो उसके लोन को मंजूरी न दें.’

कई कर्मचारियों को खुद नहीं होती पूरी जानकारी
सर्वे से यह भी सामने आया कि कई रिलेशनशिप मैनेजर जिन प्रोडक्ट्स को बेचते हैं. उनके बारे में पूरी जानकारी नहीं रखते हैं. 85.29% कर्मचारियों को डायरेक्ट और रेगुलर म्यूचुअल फंड के बीच अंतर नहीं पता था. करीब 75% को ELSS के टैक्स फायदे की जानकारी नहीं थी. 98% कर्मचारियों को वास्तविक और नाममात्र रिटर्न (Real vs Nominal return) का अंतर समझ में नहीं आता.

बैंक कर्मचारियों की क्या है सफाई?
बैंक कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें इन उत्पादों पर व्यक्तिगत कमीशन नहीं मिलता. एक बैंक मैनेजर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, ये धारणा गलत है कि बैंक स्टाफ इन उत्पादों पर कमीशन कमाता है. ज्यादातर मामलों में हम सिर्फ टारगेट पूरा करने और नौकरी बचाने की कोशिश कर रहे होते हैं. हालांकि, अगर टारगेट पूरे नहीं होते तो कर्मचारियों को खराब परफॉर्मेंस रेटिंग, लगातार निगरानी और वरिष्ठ अधिकारियों के दबाव का सामना करना पड़ता है.

बैंकों को मिलता है भारी कमीशन
भले ही कर्मचारियों को सीधे कमीशन न मिलता हो. लेकिन बैंक इन उत्पादों की बिक्री से बड़ी कमाई करते हैं. वित्त वर्ष 2023-24 में मार्केट कैप के हिसाब से शीर्ष 15 बैंकों ने बीमा, म्यूचुअल फंड और अन्य वित्तीय प्रोडक्ट बेचकर लगभग 21,773 करोड़ रुपये कमीशन के रूप में कमाए. कुछ बैंकों में कमीशन, ब्रोकरेज और एक्सचेंज से होने वाली आय कुल आय का 25% तक हिस्सा बन चुकी है.

बैंकों और बीमा कंपनियों की साझेदारी
इस पूरे सिस्टम की जड़ में बैंकएश्योरेंस (Bancassurance) मॉडल है. इसमें बैंक बीमा कंपनियों के लिए वितरण साझेदार की तरह काम करते हैं. कई बड़े बैंक अपने ही कॉरपोरेट समूह की बीमा कंपनियों के उत्पाद बेचते हैं. बैंक शाखाएं इन पॉलिसियों के प्रमुख बिक्री केंद्र बन जाती हैं और कर्मचारियों को इन्हें ग्राहकों को बेचने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है.

ग्राहकों को बाद में होता है नुकसान
इस व्यवस्था का असर अक्सर कई साल बाद दिखता है. बीमा उद्योग के आंकड़े बताते हैं कि करीब आधी जीवन बीमा पॉलिसियां पांच साल के भीतर बंद हो जाती हैं. कई ग्राहक प्रीमियम जारी नहीं रख पाते या उन्हें अपेक्षित रिटर्न नहीं मिलता. ऐसे मामलों में पॉलिसी जल्दी सरेंडर करने पर निवेश का एक हिस्सा भी खत्म हो सकता है.

me.sumitji@gmail.com

Leave a Reply