उम्र बढ़ने के साथ शरीर में मांसपेशियों का कम होना नॉर्मल माना जाता है. रिसर्च कहती है कि 60 की उम्र के बाद हर साल 1 से 2 फीसदी मांसपेशियां घटने लगती है. लेकिन आजकल लोगों को 30 की उम्र के बाद ही ये दिक्कत होने लगी है. साइंटिफिक इसे सार्कोपेनिया पुकारा जाता है. इसको लेकर कई शोध किए गए जिसमें बताया जाता है कि जिनकी डाइट खराबा है या फिर डायबिटीज है उन्हें सार्कोपेनिया जैसी बीमारी अपनी चपेट में ले लेती है. इसके होने पर मांसपेशियां घटना एक बड़ा लक्षण है लेकिन और भी कई हेल्थ प्रॉब्लम्स होती हैं.

ऐसा देखा गया है कि लोग ये मान लेते हैं अगर उनकी मांसपेशियां कम हो रही है तो इसकी वजह बढ़ती है उम्र है. जबकि कहानी कुछ और ही होती है और अधिकतर ये जान ही नहीं पाते हैं कि उन्हें सार्कोपेनिया हुआ है. चलिए आपको बताते हैं इश बीमारी से जुड़ी कुछ रोचक बातें…

क्या होती है सार्कोपेनिया की बीमारी

सार्कोपेनिया… मांसपेशियों के कम होने या कमजोर पड़ने की प्रॉब्लम जो उम्र के बढ़ने पर होती है. सबसे पहले 1989 में डॉ. इरविन रोसेनबर्ग ने इस शब्द का इस्तेमाल किया था. साल 2016 में सार्कोपेनिया को ऑफिशियली बीमारी घोषित किया गया. इसके 10 साल बाद जेरियाट्रिक सोसाइटी ऑफ इंडिया ने भारत में सार्कोपेनिया से जुड़ी गाइडलाइन जारी कीं. इसका उद्देश्य था कि लोगों को मांसपेशियों की कमजोरी का समय से पहले पता चल सके और जल्दी इलाज शुरू हो पाए.

पहले के आंकड़े देखे जाए तो सिर्फ 4 फीसदी यंगस्टर इसके मरीज थे लेकिन धीरेधीरे ये 35 फीसदी तक पहुंच गया है. एक्सपर्ट बताते हैं कि इसके होने के कई कारण हैं, जिसमें सबसे बड़ी वजह डायबिटीज है. उम्रदराज होने पर इसका होना नॉर्मल है लेकिन यंगस्टर में स्टेरॉयड का यूज भी सार्कोपेनिया के मामले बढ़ा रहा है.

डायबिटीज वालों पर खतरा ज्यादा

डायबिटीज वालों की बात करें तो टाइप 1 और टाइप 2 में सार्कोपेनिया होने लगती है. इंसुलिन एक एनाबोलिक हार्मोन है जो मांसपेशियां, फैट और दूसरे टिशू के बनने में काम आता है. टाइप 1 वालों में इंसुलिन कम होने लगता है तो मांसपेशियों का कमजोर या कम होना स्वाभाविक है. दूसरी तरह टाइप 2 डायबिटीज वालों में इंसुलिन रेजिस्टेंस होने लगता है. ऐसे में ये हार्मोन ठीक वैसे काम नहीं कर पाता जैसा उसे करना चाहिए. एक्सपर्ट बताते हैं कि इस कारण केटाबोलिज्म बढ़ने लगता है और ये भी मसल्स को नुकसान पहुंचाता है.

डॉक्टर एन के सोनी का कहना है कि डायबिटीज इस परेशानी को और बढ़ा सकती है. जब लंबे समय तक ब्लड शुगर ज्यादा रहती है, तो शरीर के लिए नए मसल्स बनाना और उन्हें बचाकर रखना मुश्किल हो जाता है. मसल्स का टूटना बढ़ जाता है, नए मसल्स बनने की रफ्तार कम हो जाती है, और कई बार उन नसों पर भी असर पड़ता है जो मसल्स को कंट्रोल करती हैं.

एक्सपर्ट ने क्या कहा

ठीक से प्रोटीन न लेना डॉक्टर एन के सोनी कहते हैं कि हमारे शरीर में मसल्स लगातार टूटते भी हैं और दोबारा बनते भी रहते हैं. लेकिन उन्हें दोबारा बनने के लिए शरीर को हर दिन अच्छी क्वालिटी का प्रोटीन चाहिए. दिक्कत यह है कि ज़्यादातर लोग अपनी रोज़ की डाइट से उतना प्रोटीन ले ही नहीं पाते, जितना शरीर को चाहिए. अगर यह लंबे समय तक चलता रहे, तो शरीर के लिए मसल्स को बनाए रखना मुश्किल हो जाता है. धीरे धीरे मसल्स कम होने लगते हैं और ताकत भी कम होने लगती है.

सीटिंग जॉब भी है वजह इसके साथ आजकल ज्यादातर लोगों की लाइफस्टाइल भी ऐसी है कि वे घंटों बैठकर काम करते हैं और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग या वेट एक्सरसाइज बिल्कुल नहीं करते. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। जब मसल्स का इस्तेमाल कम होता है, तो शरीर भी धीरे धीरे उन्हें कम करना शुरू कर देता है. इसलिए लोगों को कमजोरी महसूस हो सकती है, चलने फिरने की रफ्तार कम हो सकती है और मसल्स पहले की तुलना में पतले लगने लगते हैं. इस बीमारी को मेडिकल साइंस में सार्कोपेनिया कहा जाता है. प्रोटीन नेचुरल वाली लेनी चाहिए जैसे की दाल, अंकुरित चने, दूध, पनीर , अंडे आदि. प्रोटीन पाउडर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं.

ध्यान रखें ये बातें एक्सपर्ट कहते हैं कि सार्कोपेनिया को काफी हद तक रोका जा सकता है. अगर आप रोज सही तरीके से प्रोटीन लें, हफ्ते में नियमित स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करें, एक्टिव रहें और डायबिटीज को कंट्रोल में रखें, तो लंबे समय तक अपने मसल्स और अपनी ताकत दोनों को बनाए रखा जा सकता है.