: राजस्थान हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक अहम मामले में पति को दिए गए तलाक के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी बिना किसी वैध कारण या शारीरिक अक्षमता के लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाने से इनकार करती है, तो मामले की परिस्थितियों के आधार पर इसे मानसिक क्रूरता माना जा सकता है। अदालत ने पत्नी की दोनों अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पति को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक दिया गया था।

2018 में हुई थी शादी, कुछ समय बाद अलग रहने लगे पतिपत्नी
मामले के मुताबिक पतिपत्नी की शादी साल 2018 में हुई थी। पति का आरोप था कि शादी के बाद पत्नी करीब 10 दिन उसके साथ रही और इसके बाद नौकरी के सिलसिले में जैसलमेर चली गई। बाद में पति भी उसके साथ करीब 15 से 20 दिन तक रहा। पति ने आरोप लगाया कि इसके बाद दोनों के बीच वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं हुए।
पति ने अदालत में यह भी आरोप लगाया कि पत्नी उसके पेशे को लेकर उसे ताने देती थी, उसके साथ रहने से इनकार करती थी और कई मौकों पर आत्महत्या करने की धमकी भी देती थी। पति का कहना था कि पत्नी के इस व्यवहार से उसे मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा।
पत्नी ने आरोपों को बताया गलत
वहीं पत्नी ने पति के आरोपों का विरोध किया। उसका कहना था कि पति छोटीछोटी बातों पर विवाद करता था और उस पर अपनी नौकरी छोड़ने या अपनी आधी सैलरी उसे देने का दबाव बनाता था। पत्नी ने अदालत के सामने यह भी कहा कि वह पति के साथ वैवाहिक जीवन जारी रखने के लिए तैयार थी।
दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद फैमिली कोर्ट ने साल 2024 में पति को क्रूरता के आधार पर तलाक दे दिया था। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। साथ ही पत्नी की वैवाहिक अधिकारों की बहाली से जुड़ी याचिका भी खारिज कर दी गई थी।
पत्नी ने हाईकोर्ट में दी थी चुनौती
फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ पत्नी ने राजस्थान हाईकोर्ट का रुख किया। उसने तलाक के आदेश के साथसाथ वैवाहिक अधिकारों की बहाली से जुड़ी याचिका खारिज किए जाने को भी चुनौती दी।
जस्टिस मुन्नूरी लक्ष्मण और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों और मामले में सामने आए साक्ष्यों का परीक्षण किया।
लंबे समय तक शारीरिक संबंध से इनकार पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने पाया कि मामले में पत्नी की ओर से लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाने से इनकार किए जाने का आरोप सामने आया था। अदालत के सामने ऐसी कोई शारीरिक अक्षमता भी स्थापित नहीं हुई, जिसके कारण वैवाहिक संबंध संभव नहीं हो पाते।
कोर्ट के अनुसार, यदि किसी मामले में बिना किसी वैध कारण या शारीरिक के आधार पर पति को तलाक दिया था। ऐसे में उस फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई पर्याप्त कानूनी आधार नहीं बनता।
इसके बाद हाईकोर्ट ने पत्नी की दोनों अपील खारिज कर दीं और फैमिली कोर्ट के साल 2024 के फैसले को बरकरार रखा। यानी इस मामले में पति को दिया गया तलाक कायम रहा।
क्या है कोर्ट के फैसले का अहम पहलू?
इस फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कोर्ट ने लंबे समय तक वैवाहिक संबंध से इनकार को हर मामले में स्वतः मानसिक क्रूरता नहीं माना है। बल्कि अदालत ने इसे मामले की परिस्थितियों, उपलब्ध साक्ष्यों, किसी वैध कारण की मौजूदगी और दोनों पक्षों के आचरण के आधार पर देखा है। इस मामले में शारीरिक संबंध से लंबे समय तक इनकार के साथ आत्महत्या की धमकी के आरोप को भी कोर्ट ने मानसिक क्रूरता के आकलन में महत्वपूर्ण माना।


