छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ स्थित प्रसिद्ध मां बम्लेश्वरी मंदिर में नवरात्रि से पहले विवाद गहरा गया है. गोंड आदिवासी समाज की पारंपरिक आस्था, मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश के नियम और ट्रस्ट के अधिकारों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा बन गया है. इस मामले में खैरागढ़ राजपरिवार के भवानी बहादुर सिंह के बयान ने भी नई बहस छेड़ दी है. फिलहाल प्रशासन दोनों पक्षों के बीच सहमति बनाने की कोशिश कर रहा है.

विवाद की शुरुआत तब हुई, जब गोंड आदिवासी समाज के लोग अपने पारंपरिक आराध्य अंगादेव की डोली लेकर पहाड़ी पर स्थित मुख्य मंदिर पहुंचे. समाज के लोगों का कहना है कि मां बम्लेश्वरी उनके अंगादेव की बहन हैं. ऐसे में सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार उन्हें गर्भगृह में जाकर भेंट चढ़ाने का अधिकार मिलना चाहिए.
दूसरी ओर, मंदिर ट्रस्ट के नियमों के मुताबिक गर्भगृह में केवल नियुक्त पुजारी ही प्रवेश कर सकते हैं. आम श्रद्धालुओं को बाहर से दर्शन करने होते हैं. इसी नियम को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद बढ़ गया. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कुछ लोगों ने गर्भगृह का ताला तोड़ने की कोशिश की और दानपेटी पर चढ़कर अंदर जाने का प्रयास किया. इस दौरान सुरक्षाकर्मियों और समाज के लोगों के बीच धक्कामुक्की भी हुई.
खैरागढ़ राजा भवानी बहादुर सिंह की एंट्री
विवाद में खैरागढ़ राजपरिवार के भवानी बहादुर सिंह के बयान ने मामले को नया मोड़ दे दिया. उन्होंने मंदिर ट्रस्ट पर मनमानी करने का आरोप लगाते हुए कहा कि मंदिर किसी ट्रस्ट की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता का है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। उनके मुताबिक, आदिवासी समाज की आस्था का सम्मान करते हुए सभी पक्षों को साथ लेकर चलना चाहिए.
वहीं, ट्रस्ट के पदाधिकारियों का कहना है कि वर्ष 1976 में मंदिर को शासन ने सार्वजनिक ट्रस्ट को सौंप दिया था. इसके बाद से मंदिर का विकास और व्यवस्था ट्रस्ट के जिम्मे है. ट्रस्ट का तर्क है कि गर्भगृह में प्रवेश के नियम सभी के लिए समान हैं. किसी एक समुदाय को विशेष अनुमति देने से भविष्य में व्यवस्था और सुरक्षा संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं.
आदिवासी अस्मिता से जुड़ा मुद्दा
यह विवाद केवल गर्भगृह में प्रवेश तक सीमित नहीं है. गोंड समाज मंदिर में अपनी पारंपरिक भूमिका और अधिकारों को मान्यता देने की मांग कर रहा है. स्थानीय स्तर पर ट्रस्ट के कामकाज में आदिवासी समाज की भागीदारी को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. प्रसाद की गुणवत्ता को लेकर पहले उठे सवालों ने भी ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर चर्चा को बढ़ाया है.
प्रशासन के सामने शांति बनाए रखने की चुनौती
राजनांदगांव जिले में आदिवासी आबादी की बड़ी मौजूदगी के कारण इस विवाद का राजनीतिक महत्व भी बढ़ गया है. नवरात्रि के दौरान मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं, ऐसे में प्रशासन के सामने कानूनव्यवस्था बनाए रखना अहम चुनौती है.
जिला प्रशासन ने दोनों पक्षों के साथ बैठक बुलाकर समाधान निकालने की कोशिश शुरू की है. कलेक्टर और एसपी ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है. अब देखना होगा कि परंपरा, धार्मिक आस्था और मंदिर के नियमों के बीच सहमति बनती है या विवाद आगे और गहराता है.



