शेयर बाजार में लगातार 8 हफ्तों से जारी गिरावट का सिलसिला आखिरकार थम गया है. 5 अक्टूबर को कारोबारी हफ्ते के पहले ही दिन दलाल स्ट्रीट पर रौनक लौटी और दोनों प्रमुख सूचकांक हरे निशान में बंद हुए. सेंसेक्स 473 अंकों की छलांग लगाकर 72,382 के स्तर पर पहुंच गया, जबकि निफ्टी 134 अंक चढ़कर 22,556 पर बंद हुआ. इस तेजी में सबसे आगे मिडकैप और स्मॉलकैप शेयर रहे, जहां निवेशकों ने जमकर लिवाली की. इसके साथ ही कैपिटल मार्केट, एफएमसीजी, पीएसई और एनर्जी सेक्टर के शेयरों ने भी बाजार को सहारा दिया. हालांकि फार्मा शेयरों में सुस्ती रही और आईटी इंडेक्स बढ़त गंवाकर सपाट बंद हुआ. बैंक निफ्टी 263 अंक सुधरकर 54,714 और मिडकैप इंडेक्स 392 अंक उछलकर 59,124 के स्तर पर बंद हुआ. बाजार की चौड़ाई भी मजबूत रही, जहां निफ्टी के 50 में से 31 और सेंसेक्स के 30 में से 20 शेयरों में तेजी दर्ज की गई. डॉलर के मुकाबले रुपया भी दो पैसे मजबूत होकर 96.29 के स्तर पर बंद हुआ.

लगातार 8 हफ्तों की मंदी के बाद बाजार में लौटी हरियाली ने निवेशकों को असमंजस में डाल दिया है. सवाल ये है कि क्या ये बाजार में एकमुश्त पैसा झोंकने का सही समय है या अभी थोड़ा ठहरना चाहिए? जानेमाने ब्रोकरेज हाउस मोतीलाल ओसवाल प्राइवेट वेल्थ की अल्फा स्ट्रैटेजिस्ट रिपोर्ट से इस उलझन को सुलझाया जा सकता है. दरअसल, ब्रोकरेज का कहना है कि मौजूदा बाजार न तो इतना सस्ता है कि बिना सोचेसमझे आक्रामक खरीदारी की जाए, और न ही इतना महंगा है कि निवेशक घबराकर पूरी तरह सतर्क हो जाएं. इसी वजह से फर्म ने इक्विटी पर अपना नजरिया न्यूट्रल रखा है, लेकिन मिडकैप और स्मॉलकैप स्पेस पर उसका भरोसा बना हुआ है.

एकमुश्त निवेश या धीरेधीरे कदम बढ़ाना सही

मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट के अनुसार, यदि कोई निवेशक पूरी तरह इक्विटी में पैसा लगाने की सोच रहा है, तो उसे एकमुश्त रकम लगाने से बचना चाहिए. इसके बजाय चरणबद्ध तरीके से यानी किस्तों में निवेश की रणनीति अपनाना समझदारी होगी. वहीं अगर निवेशक हाइब्रिड स्ट्रैटेजी चुन रहे हैं, तो वहां एकमुश्त पूंजी लगाई जा सकती है. अगर आने वाले दिनों में बाजार में कोई तेज करेक्शन या गिरावट आती है, तो निवेशक अपने निवेश की रफ्तार को बढ़ा सकते हैं.

फर्म ने अपने सुझाए गए एसेट एलोकेशन मॉडल में कोई बदलाव नहीं किया है. इस मॉडल के तहत निवेशकों को अपने कुल पोर्टफोलियो का 40 फीसदी हिस्सा हाइब्रिड या लार्जकैप में रखना चाहिए. इसके अलावा 10 फीसदी हिस्सा ग्लोबल इक्विटी को देना चाहिए, जबकि 50 फीसदी का सबसे बड़ा आवंटन मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों के लिए तय किया गया है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। ब्रोकरेज का मानना है कि ये आवंटन लंबी अवधि में जोखिम और रिटर्न के बीच सही संतुलन बनाता है.

मिडकैपस्मॉलकैप शेयरों पर मजबूत भरोसे की वजह

मिडकैप और स्मॉलकैप को लेकर ब्रोकरेज का रुख अभी भी ओवरवेट बना हुआ है. इस भरोसे के पीछे कंपनियों की ठोस कमाई सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है. वित्त वर्ष 202627 की पहली तिमाही में निफ्टी 50 की कंपनियों का मुनाफा सालाना आधार पर करीब 18 फीसदी बढ़ा है. इसके साथ ही मझोली और छोटी कंपनियों के नतीजों ने भी बाजार को सुखद संकेत दिए हैं.

मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज यूनिवर्स में जिन कंपनियों के कमाई अनुमान बढ़ाए गए हैं, उनका घटाए गए अनुमान वाली कंपनियों से अनुपात 1.5 गुना हो गया है. ये आंकड़ा पिछले 22 तिमाहियों का सबसे ऊंचा स्तर है. हालांकि ब्रोकरेज ने एक चेतावनी भी दी है कि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयर अपने 10 साल के औसत वैल्यूएशन के मुकाबले अभी भी प्रीमियम पर ट्रेड कर रहे हैं. राहत की बात सिर्फ इतनी है कि ये प्रीमियम सितंबर 2024 के मुकाबले कुछ कम जरूर हुआ है.

अगर लार्जकैप यानी निफ्टी 50 की बात करें, तो ये अगले 12 महीनों की अनुमानित कमाई के 18.3 गुना पर ट्रेड कर रहा है. ये इसके ऐतिहासिक औसत यानी 20.9 गुना से करीब 12 फीसदी सस्ता है. इसके बावजूद ब्रोकरेज बहुत ज्यादा आक्रामक खरीदारी की सलाह नहीं दे रहा है, क्योंकि मजबूत घरेलू इनफ्लो के साथ बाजार में नए शेयरों की सप्लाई भी लगातार बढ़ रही है.

वैश्विक स्तर पर बढ़ते तीन बड़े आर्थिक खतरे

भारत की अंदरूनी आर्थिक बुनियाद दुनिया की तमाम चुनौतियों के बीच काफी मजबूत नजर आ रही है. वित्त वर्ष 202627 की पहली तिमाही में देश की वास्तविक जीडीपी ग्रोथ सालाना आधार पर 7.8 फीसदी रही है. इस दौरान निजी खपत में 7.1 फीसदी और ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन में 11.9 फीसदी का उछाल दर्ज किया गया. मैन्युफैक्चरिंग, घरेलू खपत, निवेश और सर्विसेज सेक्टर ने देश की विकास दर को नई गति दी है. साथ ही घरेलू निवेशकों की तरफ से आ रहा पैसा बाजार को लगातार थामे हुए है.

लेकिन घरेलू मजबूती के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं. पहला बड़ा खतरा कच्चे तेल का है. सितंबर में ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया था और महीने के बीच में तो ये 108 से 109 डॉलर तक जा पहुंचा था. 6 अक्टूबर को भी कच्चा तेल 100 डॉलर के ऊपर बना हुआ है. दूसरा खतरा बॉन्ड यील्ड का है. विकसित देशों में लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड की यील्ड कई सालों के रिकॉर्ड स्तर पर है. तीसरा बड़ा झटका अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने दिया है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने 16 सितंबर को अपनी ब्याज दरें 0.25 फीसदी बढ़ाकर 3.75 से 4 फीसदी कर दी हैं. साल 2023 के बाद ये अमेरिकी फेड की पहली दर बढ़ोतरी थी. बढ़ती बॉन्ड यील्ड और महंगी ब्याज दरें शेयर बाजार के वैल्यूएशन पर दबाव बना सकती हैं.

फिक्स्ड इनकम यानी डेट मार्केट में मोतीलाल ओसवाल का मानना है कि लंबे समय तक ऊंची यील्ड बने रहना अब एक नया सामान्य चलन बन सकता है. भारत की 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड बढ़कर 7 फीसदी के करीब पहुंच चुकी है. ऐसे दौर में ब्रोकरेज ड्यूरेशन के बजाय एक्रुअल स्ट्रैटेजी को प्राथमिकता दे रहा है. इसके तहत प्राइवेट क्रेडिट, ज्यादा यील्ड वाले एनसीडी और इनविट्स जैसे नियमित आय देने वाले विकल्पों पर फोकस किया जा रहा है. लिक्विडिटी के लिए आर्बिट्राज और स्पेशलाइज्ड इन्वेस्टमेंट फंड को बेहतर माना गया है.

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