किसी भी घर पर खानेपीने की चीजों की बढ़ती कीमतों का असर एक ही बार में नहीं दिखता. यह धीरेधीरे महीने के बजट पर असर डालता है. प्याज और खाना पकाने के तेल की बढ़ती कीमतें, दालों की कीमतों में उछाल—इन सबके कारण समय के साथ वही सामान खरीदना काफी महंगा हो सकता है. लेकिन इस बार खानेपीने की सभी चीजों की कीमतों पर एक जैसा असर नहीं पड़ा है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त में प्याज की कीमतें पिछले साल के मुकाबले 48.27% बढ़ीं, जबकि टमाटर की कीमतों में 31.09% और आलू की कीमतों में 13.14% की गिरावट आई. फिर भी, कुछ चीजों की कीमतों में आई गिरावट, दूसरी चीजों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी की भरपाई करने के लिए काफी नहीं थी. इस बीच, खानेपीने की चीजों की महंगाई दर जुलाई के 5.52 फीसदी से बढ़कर अगस्त में 5.95 फीसदी हो गई, जबकि मुख्य खुदरा महंगाई दर 4.45 फीसदी से बढ़कर 4.82 फीसदी हो गई.
अब बड़ा सवाल यह है कि घरों के खानेपीने के खर्च पर यह दबाव कब तक बना रहेगा. मानसून के सामान्य से कम रहने, खरीफ की फसल के आने और अलनीनो की वजह से मौसम से जुड़े जोखिमों के कारण, आने वाले कुछ महीनों से यह तय हो सकता है कि खानेपीने की चीजों की महंगाई आखिरकार कब कम होनी शुरू होगी.
ज्यादा रह सकता है फूड इंफ्लेशन
फिलहाल हालात कुछ अच्छे नहीं दिख रहे हैं. 360 वल असेट के सीनियर इकोनॉमिस्ट विक्रम छाबड़ा ने ईटी की रिपोर्ट में अनुमान जताया है कि खानेपीने की चीजां की महंगाई अगस्त में लगभग 6 फीसदी से बढ़कर अगले तीन से छह महीनों में 78 फीसदी तक पहुंच जाएगी. इसका मतलब है कि जल्द ही किराने का बिल कम होने की उम्मीद नहीं है. दूसरे इकोनॉमिस्ट भी मोटे तौर पर इसी राय से सहमत हैं.
ICRA की चीफ इकोनॉमिस्ट अदिति नायर का अनुमान है कि खानेपीने की चीजों की महंगाई अक्टूबर 2026 तक 7% से ऊपर चली जाएगी और बाकी फाइनेंशियल ईयर में 5% से ऊपर बनी रहेगी. नायर ने कहा कि महंगाई के और बढ़ने का जोखिम है. उन्होंने मानसून के असमान वितरण और फसल की पैदावार पर इसके असर को लेकर अनिश्चितता की ओर इशारा किया.
इसी तरह, ANZ के अर्थशास्त्री और FX स्ट्रैटेजिस्ट धीरज निम का मानना है कि कम से कम अक्टूबरनवंबर तक दबाव बना रहेगा. हालांकि, सर्दियों की रबी फसल और खरीफ की नई फसल मंडियों में आने पर कुछ राहत मिल सकती है. इसलिए, अगली फसल का समय और उसकी क्वालिटी बहुत अहम है. अगर सप्लाई बेहतर होती है, तो अभी का दबाव कुछ कम हो सकता है. अगर ऐसा नहीं होता है, तो परिवारों को एक बार फिर ऊंची कीमतों का सामना करना पड़ सकता है.
प्याज की कीमतों में अचानक उछाल
प्याज से पता चलता है कि सप्लाई में रुकावट कितनी तेजी से घरों की रसोई तक पहुंच सकती है. PHDCCI के जुनेजा ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि प्याज की थोक कीमतों में बढ़ोतरी का असर रिटेल मार्केट में काफी तेज़ी से दिख सकता है, क्योंकि लोग अक्सर प्याज खरीदते हैं और रिटेलर नियमित रूप से स्टॉक भरते रहते हैं. हालांकि, उन्होंने कहा कि कीमतों में यह बदलाव सीधे तौर पर एक जैसा नहीं होता. ट्रांसपोर्टेशन, हैंडलिंग, स्टोरेज, बर्बादी और थोक व रिटेल मार्जिन भी अंतिम कीमत पर असर डालते हैं.
प्याज की कीमतों में मौजूदा उछाल आम तौर पर सब्ज़ियों की कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी के मुक़ाबले ज्यादा समय तक बना हुआ है. IDFC फर्स्ट बैंक की चीफ इकोनॉमिस्ट गौरा सेन गुप्ता ने मीडिया रिपोर्ट में कहा कि सब्जियों की कीमतों में उछाल आम तौर पर लगभग दो महीने तक रहता है और सप्लाई से जुड़े उपाय दबाव कम करने में मदद करते हैं. प्याज की कीमतों में बढ़ोतरी का यह तीसरा महीना है और यह त्योहारों के मौसम के साथ हो रहा है, जिससे शायद मांग का दबाव और बढ़ गया होगा.
फिर भी, उन्हें उम्मीद है कि सब्जियों की कई फसल सीजन और सरकार की ओर से सप्लाई बढ़ाने के उपायों की वजह से जल्द ही प्याज की कीमतों का दबाव कम हो जाएगा. इससे राहत मिलने की एक उम्मीद तो है, लेकिन अर्थशास्त्री चेतावनी देते हैं कि प्याज खानेपीने की चीजों की एक बहुत बड़ी बास्केट का सिर्फ एक हिस्सा है.
अल नीनो खड़ी कर सकती है मुसीबत
मौसम से जुड़ा जोखिम सबसे ज्यादा गंभीर है. आरबीआई कई महीनों से इस जोखिम के बारे में चेतावनी दे रहा है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। अप्रैल में, सेंट्रल बैंक ने कहा था कि एनर्जी की ज्यादा कीमतों और मौसम में संभावित गड़बड़ी की वजह से खानेपीने की चीजों की कीमतों पर महंगाई का दबाव बढ़ गया है.
जून तक, मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी ने कहा कि दक्षिणपश्चिम मानसून के सामान्य से कम रहने के अनुमान और अल नीनो की वजह से खानेपीने की चीजों की सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.
ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि यह चिंता क्यों बनी हुई है. इंडिया मेटियोरोलॉजिकल डिपार्टमेंट के अनुसार, 21 सितंबर तक मानसून की कुल बारिश में लगभग 15 फीसदी की कमी रही है, और बारिश का वितरण भी असमान रहा है.
360 वन असेट के छाबड़ा ने मीडिया रिपोर्ट में कहा कि अनियमित मानसून सबसे बड़ा जोखिम है, और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों को दूसरे नंबर पर रखा.
ANZ के निम ने अल नीनो को “सबसे बड़ा रिस्क फैक्टर” बताते हुए चेतावनी दी कि यह खरीफ की पैदावार और जलाशयों में पानी भरने, दोनों पर असर डाल सकता है. जलाशयों में पानी का स्तर कम होने से 2027 की शुरुआत में सिंचाई पर निर्भर रबी फसलों, जैसे गेहूं और दालों, पर असर पड़ सकता है.
IDFC फर्स्ट के सेन गुप्ता ने भी इसी तरह चेतावनी दी कि अल नीनो की तेज स्थिति खरीफ और रबी, दोनों के उत्पादन पर असर डाल सकती है. सर्दियों में तापमान ज्यादा रहने से भी जल्दी खराब होने वाली चीजों पर दबाव बना रह सकता है और रबी की फसल की पैदावार पर असर पड़ सकता है.
चावल, तिलहन और दालों पर नजर
सभी फसलों पर रिस्क एक जैसा नहीं है. क्रिसिल इंटेलिजेंस के डायरेक्टर पूशन शर्मा ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि तिलहन की कीमतों में बढ़ोतरी का काफी जोखिम है. इसकी वजह है कम शुरुआती स्टॉक , क्रशिंग की मजबूत मांग और दुनिया भर में खाने वाले तेल की ऊंची कीमतें. घरेलू और एक्सपोर्ट की मजबूत मांग के कारण धान की कीमतें भी स्थिर रहने की उम्मीद है, हालांकि शुरुआती स्टॉक की अच्छीखासी मात्रा से कुछ राहत मिल सकती है.
नय्यर ने कहा कि पिछले साल के मुकाबले चावल की बुवाई में कमी आई है, जिससे कीमतों पर दबाव पड़ सकता है, जबकि दालों की बुवाई पिछले साल के स्तर से ज्यादा है. हालांकि, ज्यादा बुवाई का मतलब यह नहीं है कि फसल भी ज्यादा होगी, क्योंकि पैदावार नमी की स्थिति और जरूरी चीजों की उपलब्धता पर भी निर्भर करेगी.
शर्मा ने आगे कहा कि दालें और मोटे अनाज मौसम की गड़बड़ी से प्रभावित हो सकते हैं, खासकर अरहर और मक्का पर इसका ज्यादा असर पड़ सकता है. क्वांटइको रिसर्च के इकोनॉमिस्ट विवेक कुमार ने भी खरीफ की बुवाई के ताज़ा आंकड़ों में चावल, कपास, गन्ना और तिलहन के रकबे में कमी की ओर इशारा किया.
हालांकि, कुछ अनाजों के मामले में स्थिति थोड़ी बेहतर है. सेन गुप्ता के अनुसार, ज्यादा समय तक खराब न होने वाले अनाजों की कीमतों में स्थिरता रहनी चाहिए क्योंकि भारत के पास जरूरत से ज्यादा बफर स्टॉक है.
इसलिए, कुल मिलाकर स्थिति एक जैसी रहने की उम्मीद नहीं है: फसलों, स्टॉक और मौसम की स्थितियों के आधार पर कुछ खाद्य पदार्थों की कीमतें कम हो सकती हैं, जबकि दूसरों की कीमतें दबाव में रह सकती हैं.
पश्चिम एशिया से दबाव
जिस तरह किसान और परिवार लगातार मौसम से जुड़े जोखिमों का सामना कर रहे हैं, उसी तरह पश्चिम एशिया के टकराव ने महंगाई का एक और जरिया खोल दिया है. इसका असर रसोई के बजट पर तुरंत नहीं दिखता, लेकिन यह लंबे समय तक बना रह सकता है. कच्चे तेल का इस्तेमाल खेती की मशीनों और सिंचाई पंपों में होने वाले डीजल के लिए किया जाता है, जबकि लिक्विफाइड नेचुरल गैस यूरिया बनाने के लिए एक जरूरी कच्चा माल है. ढुलाई का खर्च फसलों को खेतों से मंडियों और रिटेलर्स तक पहुंचाने पर असर डालता है, जबकि ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स की ज्यादा कॉस्ट से प्रोसेसिंग और स्टोरेज का खर्च भी बढ़ सकता है.
भारत में थोक महंगाई पर आधारित महंगाई दर अगस्त में सालाना आधार पर बढ़कर 9.92 फीसदी हो गई, जो जुलाई में 9.78 फीसदी थी, जबकि WPI फूड इंडेक्स 6.65 फीसदी से बढ़कर 7.05 फीसदी हो गया. अगस्त में फ्यूल और बिजली की महंगाई दर 22.93 फीसदी थी. हालांकि, अर्थशास्त्री सलाह देते हैं कि खानेपीने की चीजों की कीमतों में हर उछाल को इस टकराव से नहीं जोड़ना चाहिए.
जुनेजा ने कहा कि प्याज, लहसुन और अदरक की कीमतों में हालिया तेजी फसल की उपलब्धता, मौसम के हालात, बाजार में आवक और सप्लाई से जुड़े दूसरे फैक्टर्स को भी दिखाती है. हालांकि, कुछ उत्पादों के मामले में ग्लोबल कनेक्शन पहले से ही साफ है. सेन गुप्ता ने कहा कि भारत खाने के तेल के लिए आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर है, जिससे यह कैटेगरी अंतरराष्ट्रीय कीमतों के असर में ज्यादा रहती है.
इसके अलावा, क्रिसिल के शर्मा के अनुसार, ढुलाई की ज्यादा दरों, पेट्रोकेमिकल कच्चे माल और पैकेजिंग की कॉस्ट ने फसलसुरक्षा उत्पादों की कीमतों को अनुमानित 515 फीसदी तक बढ़ा दिया है. सेब, अंगूर, धान, सोयाबीन और कपास जैसी फसलें इन इनपुट पर अपनी ज्यादा निर्भरता के कारण खास तौर पर प्रभावित होती हैं.
अहम होता जा रहा है 2027 का सवाल
एशियन डेवलपमेंट बैंक का ताजा आउटलुक खानेपीने की चीजों से जुड़ी मौजूदा स्थिति पर एक लंबा प्रकाश डालता है. ADB ने चेतावनी दी है कि उम्मीद से ज्यादा जोरदार अलनीनो फसल की पैदावार को नुकसान पहुंचा सकता है और खानेपीने की चीजों की महंगाई बढ़ा सकता है. साथ ही, सिंचाई, ऊर्जा और खाद की बढ़ती लागत भी इस दबाव को और बढ़ा सकती है. 2027 में इसके असर का दायरा काफी बढ़ सकता है. उस समय कमोडिटी की कीमतों में उतारचढ़ाव के चरम पर पहुंचने की आशंका है.
इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में खानेपीने की चीजों की महंगाई तब तक ऊंची ही बनी रहेगी. लेकिन इससे यह साफ होता है कि अर्थशास्त्री खानेपीने की चीजों की कीमतों पर मौजूदा दबाव के जल्द खत्म होने की कोई निश्चित तारीख बताने से क्यों हिचकिचा रहे हैं.
फिलहाल, हालात कई फैक्टर्स के एक साथ अनुकूल होने पर निर्भर करते हैं. अगर खरीफ फसल की आवक अच्छी रहती है, प्याज की कीमतें कम होती हैं, जलाशयों में पानी का स्तर सुधरता है और पश्चिम एशिया में ऊर्जा संकट का असर कम होता है, तो 2026 के आखिर या 2027 की शुरुआत से खानेपीने की चीजों की महंगाई में कमी आनी शुरू हो सकती है. अगर अलनीनो का असर गंभीर बना रहता है, रबी की बुआई प्रभावित होती है और ऊर्जा व खाद की लागत ऊंची बनी रहती है, तो स्थिति को सामान्य होने में ज्यादा समय लग सकता है.



