
Organ Donation Inspiring Story: डॉ. निशा वरदराजन एक जानीमानी हस्ती हैं. जिन्होंने बतौर फिजिशियन चेन्नई में 27 साल तक लोगों का इलाज किया. उनकी जिंदगी में एक मौका ऐसा आया, जब उन्होंने खुद को एक नाजुक मोड़ पर खड़ा पाया. अपने लंबे करियर में उन्होंने कई लोगों की जान बचाई. उन्होंने कितने ही परिवारों को बताया था कि घबराने की जरूरत नहीं, उन्होंने चमत्कार होते हुए देखा है. इसके बावजूद एक दिन जब वो ऑपरेशन थिएटर से बाहर आईं, तो उनकी मनोदशा सही नहीं थी. उनके मन में मिश्रित भाव थे. वो अंदर से दुखी थीं. उन्हें मेडिसिन की किताबों और दवाओं का भरपूर ज्ञान था. उन्हें विज्ञान पर भरोसा था. फैक्ट्स पर यकीन था. फिर भी उन्होंने कभी ऐसा नहीं सोचा था जो उनके साथ हुआ. वो कभी उस रात के लिए तैयार नहीं थीं, जिसका सामना उन्हें करना पड़ा.
डॉक्टर निशा और इंजीनियर अरविंद की कहानी
डॉक्टर निशा के पति अरविंद, सिविल इंजीनियर थे. वो एक इमोशनल इंसान थे जो लोगों के दिलों में उतरकर रिश्ता बना लेते थे. सितंबर की एक देर शाम, श्रीपेरंबदूर के पास की एक साइट से लौटते समय, उनकी गाड़ी को तेज रफ्तार लॉरी ने टक्कर मार दी. ये हादसा डॉक्टर निशा की जिंदगी का एक टर्निंग प्वाइंट था. उनके पास एक अनजान नंबर से फोन आता है. पहले किसी पुलिस अफसर, फिर मेडिकल स्टाफ की उनसे बात होती है.
जब तक डॉक्टर निशा ट्रॉमा सेंटर पहुंची, पति अरविंद का शुरुआती ट्रीटमेंट हो चुका था. अरविंद को गंभीर चोटें आई थीं. इसलिए डॉक्टर निशा के साथ सालों से काम कर रहे डॉक्टर उनसे नजरें चुरा रहे थे. CT स्कैन से उन्हें अरविंद के ब्रेन में चोट का पता चला. सूजन थी. ब्लीडिंग थी. सर्जरी का ऑप्शन नहीं था. जैसे-तैसे सांसें चल रही थीं.
एक डॉक्टर होने के नाते, उन्होंने भविष्य की तस्वीर पढ़ ली थी. वो एक डॉक्टर होने के साथ एक पत्नी भी थीं. दो दिन तक वो अरविंद का हाथ थामकर बैठी रहीं. उनके दिमाग में बवंडर उठ रहे थे. उनकी तंत्रा तब भी नहीं टूटती, जब उनकी 17 साल की बेटी मीनल, अपने बोर्ड एग्जाम के बारे में कुछ कहती. अरविंद का कई बार मेडिकल टेस्ट और चेकअप कराया गया. हर बार एक इंडिपेंडेंट स्पेशलिस्ट मरीज का क्लिनिकल एग्जामिनेशन करता था. आखिर में मेडिकल प्रोटोकॉल के हिसाब से ब्रेन डेथ की बात कही गई. ये वो शब्द थे जो डॉक्टर निशा के कानों में बार-बार गूंज रहे थे.
अंगदान की शपथ
तभी एक ऑर्गन ट्रांसप्लांट कॉर्डिनेटर उनके पास आता है. जिसे डॉक्टर निशा प्रोफेशनली जानती थीं. जिससे उन्होंने पहले भी ऑर्गन डोनेशन पर बात की थी. दोनों इस विषय पर लोगों को जागरूक करते थे. ब्रेन डेड मरीजों के ऑर्गन ट्रांसप्लांट की वकालत करते थे. लेकिन खुद के पति के लिए ऐसा सोचना आसान नहीं था. वो एकदम शांत थीं. उनके मन में उथल-पुथल थी, तभी कॉर्डिनेटर ने वहां छाई चुप्पी को तोड़ते हुए धीरे से कहा- डॉक्टर निशा! अरविंद ने कुछ साल पहले ड्राइविंग लाइसेंस रिन्यू कराते समय एक डोनर कार्ड पर साइन किया था. ये बात सुनकर निशा ने गहरी सांस छोड़ी. उन्हें उस दिन की याद आ गई जब अरविंद ने घर आने के बाद मजाक में अपना लैमिनेटेड कार्ड लहराते हुए कहा – देखो, मेरे जाने के बाद भी, मैं लोगों के काम आऊंगा.’
केस स्टडी
तब वो पति की बात सुनकर मुस्कुराई थीं. हालांकि तब किसी ने सोचा न होगा कि इतनी जल्दी ये नौबत आ जाएगी, जिसके बारे में लोग सोचने से भी डरते हैं. वहीं खड़ी, उनकी बेटी मीनल चुपचाप सब सुन रही थी. डॉक्टर निशा ऑर्गन डोनेशन पर बात कर रही थीं. जैसे- हार्ट, लिवर, किडनी और शायद लंग्स और कॉर्निया भी.
बेटी मीनल ने पूछा- क्या ऐसा करने से दर्द होगा?
निशा ने हालात की सच्चाई स्वीकार करते हुए कहा- ‘नहीं. ऐसी स्थिति में किसी को दर्द महसूस नहीं हो सकता.’ इसके बाद वहां सन्नाटा छा जाता है. तभी मीनल ने कुछ ऐसा किया जिसकी उम्मीद नहीं थी. उसने बैकपैक से पिता की छोटी डायरी निकाली. जिसे वो हमेशा साथ रखते थे. उसमें वो अपने प्रोजेक्ट स्केच उतार लेते थे. दिमाग में आने वाले विचारों तक को लिखकर सहेज लेते थे. मीनल तभी डायरी का छह महीने पहले लिखा एक पेज खोलती है. उस पन्ने पर लिखा था- ‘अगर मुझे कुछ होता है, तो उसमें भी कुछ अच्छा होना चाहिए. मौत में भी पुल जुड़ने चाहिए’. शब्द आसान नहीं थे, लेकिन उन्हीं के थे. उन्होंने अंगदान का वचन दिया था. इसलिए ऑर्गन डोनेशन यानी अंगदान की मंजूरी दे दी गई. इस तरह दक्षिण भारत में, ह्यूमन ट्रांसप्लांट नेटवर्क का काम तेजी से आगे बढ़ता है.
कई लोगों को मिली नई जिंदगी
समय का पहिया आगे घूमता है. घड़ी की सुइयां टिक-टिक करके आगे बढ़ती हैं. उसी समय ऑर्गन डोनेशन की टीम अपने ई-मेल्स का डाटा तेजी से खंगाल रही होती है. तभी पता चलता है कि बेंगलुरु में 25 साल के सॉफ्टवेयर डेवलपर कविराज ऑटोइम्यून डिसऑर्डर के शिकार थे. उनका लिवर आखिरी स्टेज में था. उनकी त्वचा पीली पड़ चुकी थी. एनर्जी लेवल घटता जा रहा था. माता-पिता से अस्पताल के बेड पर लेटे बेटे की हालत देखी नहीं जाती थी. खुद उन्हें अपनी आने वाली हर सांस भारी लगती थी. किस्मत कहें या भगवान की मर्जी, कविराज के घरवाले वक्त के आगे खुद को बेबस और लाचार पाते थे.
वहीं हैदराबाद में, आठ साल के जुड़वां बच्चे दिया और दिवित एक रेयर जन्मजात दिल की बीमारी के साथ पैदा हुए थे. दिवित को ज्यादा दिक्कत थी. उस मासूम ने खेल के मैदान और पार्क से ज्यादा जन्मदिन हॉस्पिटल में बिताए थे. इसी तरह कोच्चि में, एक रिटायर्ड स्कूल प्रिंसिपल लीलम्मा की आखों की रोशनी पांच सालों में घटते-घटते लगभग खत्म हो गई थी.
डॉक्टर की कई टीमें एक साथ काम कर रही है. ऑर्गन कॉर्डिनेटर की मदद से डॉक्टर निशा वरदराजन के पति अरविंद के अंगों को बहुत ध्यान से क्रॉस-चेक करके मैच कराया गया. ब्लड ग्रुप, टिशू कम्पैटिबिलिटी और मेडिकल अर्जेंसी जैसी चीजों को जांचा गया. फ्लाइट्स का इंतजाम हुआ. पुलिस से बात करके ग्रीन कॉरिडोर बनाए गए. सर्जिकल टीमें अपने ऑपरेशनल मिशन के दौरान पूरी मुस्तैदी से काम कर रही थीं.
डॉक्टर निशा ने रिट्रीवल सर्जरी नहीं देखी. वो हॉस्पिटल परिसर में उस जगह एकदम शांत बैठी थीं, जहां से वो सैकड़ों बार गुजरी होंगी. लेकिन उस दिन डॉक्टर निशा ने जो किया, वो आसान नहीं था. उनके दिल में कुछ जिंदगियों के बचने का संतोष था तो दूसरी ओर पति के बिछड़ने का गम भी था. कुछ घंटों बाद खबर आई कि लिवर ट्रांसप्लांट सफल रहा. किडनी ने फौरन काम करना शुरू कर दिया. इसी तरह कॉर्नियल रिट्रीवल का काम पूरा हो गया.
सर्जरी के बाद जिस अरविंद ने नदियों और सड़कों पर पुल बनाए थे, वो खुद कुछ अजनबियों के बीच अनदेखा पुल बन चुके थे. हालांकि अगले कई हफ्तों का वक्त निशा के लिए आसान नहीं था. दिल में पति की यादें थीं. मन उदास था. जीवनसाथी, अब साथ नहीं था. हर पल भारी था. खासकर हर सुबह जब अरविंद के गुनगुनाने की आवाज नहीं सुनाई पड़ती तो मन उदास हो जाता था. अरविंद के बिना घर सूना था. उनका इंजीनियरिंग हेलमेट भी उसी शेल्फ पर रखा था, जहां हमेशा रखा जाता था. बेटी मीनल अक्सर पापा को याद करते समय टेबल पर एक एक्स्ट्रा प्लेट रख देती थी.
लोगों ने खत भेजकर जताया आभार
अचानक उदासी के बीच उनके घर की डोर बेल बजने लगीं. डॉक्टर निशा के लिए चिठ्ठियां आने लगीं. डॉक्टर निशा को पहला पत्र कविराज ने लिखा. उसने लिखा- ‘मेरी जिंदगी पटरी पर लौट आई है. मां कहती हैं कि उन्होंने महीनों बाद मुझे बिना दर्द के मुस्कुराते देखा. मैं आपसे वादा करता हूं कि दूसरी जिंदगी मिलने के इस मौके को नए मकसद के साथ आगे बढ़ाऊंगा.
वहीं दिवित के माता-पिता ने अपने बेटे की एक तस्वीर भेजी जिसमें वह बेड पर लेटा नहीं बल्कि एकदम सीधा बैठा था. उसके शरीर में पहले से कम ट्यूब लगी थीं. उसकी आंखें खुशी से चमक रही थीं. चिट्ठी में उसने लिखा था- ‘मैम, मैं कब से क्रिकेट खेल सकूंगा.’ लीलम्मा ने अपने पोते से जो चिठ्ठी लिखवाई उसमें लिखा था- ‘मैंने आज अपनी खिड़की से सूरज की रोशनी देखी. ऐसा लगा जैसे मुझे किसी गलती की माफी मिल गई हो. ईश्वर आपको खुश रखे.’
निशा ने हर चिट्ठी बड़े ध्यान से पढ़ी. हर खत में उन्होंने अंगदान की क्लिनिकल कामयाबी की कहानी पढ़ी ही नहीं, बल्कि उसे महसूस किया. पति को खोने के बाद उनका दुख गहरा था, लेकिन फैसला लेने की समझ उनमें बहुत गहरी थी. कई महीनों बाद, ऑफिशियल तरीकों और आपसी सहमति लेकर, निशा और मीनल एक ट्रांसप्लांट अवेयरनेस कॉन्फ्रेंस में कविराज से मिलीं. जहां वह कुछ घबराया हुआ दिख रहा था. वो दोनों हाथ जोड़कर उनके पास आया. उसके पहले शब्द थे – ‘मुझे नहीं पता क्या कहना है, क्या करना है.’ इसके बाद निशा ने धीरे से जवाब दिया- कुछ मत करो बस जियो.
इस कॉन्फ्रेंस के बाद जब डॉक्टर निशा हॉस्पिटल में काम पर लौटीं, तो उन्होंने महसूस किया कि उसके अंदर कुछ बदल गया था. अब वो उन परिवारों से अलग तरह से बात करतीं. सबको अपनी फैमिली का हिस्सा मानती थीं. वहीं ब्रेन डेथ पर बात करते समय, वो अब सिर्फ चार्ट और डेफिनिशन पर निर्भर न रहकर, खुद एक ब्रिज बन चुकी थीं.
एक दिन पिता की डेस्क साफ करते समय, मीनल को डायरी के पिछले कवर के अंदर एक नोट मिला. जिसमें लिखा था – ‘हम जिंदगी को सालों में नापते हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। शायद हमें इसे दूसरों पर पड़ने वाले असर से मापना चाहिए.’ इसके बाद मीनल ने मेडिकल की पढ़ाई करने का फैसला किया. इस तरह अरविंद अब न होकर भी हर समय अपने परिवार के साथ थे. मीनल को अपने पिता पर गर्व होता था. उसे ये एहसास था कि उसके पिता जैसा सोचते थे, वैसा उन्होंने करके दिखाया.
अरविंद ने अपनी प्रोफेशनल करियर में कई ब्रिज बनाए थे, जिनसे गाड़ियां गुजरती होंगी. लेकिन उनके अंगदान के फैसले ने कुछ खास पुल बनाकर लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचा लिया. इस मार्मिक कहानी से अंगदान के बारे में जागरूकता मिलती है. लोग जिस समय डोनर के तौर पर खुद को रजिस्टर कराकर अपने इरादों के बारे में बता रहे होते हैं, उसी समय वो सदमे और निराशा में डूबे लोगों के मन से अनहोनी का डर निकाल चुके होते हैं.
‘ब्रेन डेथ’ एक मेडिकल और कानूनी आधार पर तय हुई वो स्थिति है, जो कोमा से अलग होती है. एक सख्त प्रोटोकॉल के बाद जब इस स्थिति की पुष्टि की जाती है, तब कहीं ऑर्गन डोनेशन का एक मौका बनता है. ट्रांसप्लांट किया गया हर ऑर्गन आपसी तालमेल, मेडिकल साइंस और गहरे इंसानी भरोसे को दिखाता है. भारत में, डोनर रजिस्ट्रेशन के बारे में जागरूकता बढ़ रही है, फिर भी कुछ मिथकों, सांस्कृतिक चिंताओं और चर्चा की कमी के कारण बहुत से लोगों में झिझक बनी हुई है. अरविंद जैसी कहानियां अंगदान के महत्व को दिखाती हैं.
ऑर्गन डोनेशन बताता है कि कामयाबी का मकसद सिर्फ प्रोफेशनल उपलब्धियां या धन-दौलत जमा करने तक सीमित नहीं है. अंगदान करके एक परिवार समय के साथ आगे बढ़ जाता है. लेकिन यह जानना कि उनके किसी अपने की मौत ने दूसरों को जिंदगी दी, ये अहसान कुछ अलग होता है. ऑर्गन डोनेशन एक-दूसरे से जुड़े होने का ऐलान है. यह इस बात की पुष्टि करता है कि इंसानी शरीर, मौत के बाद भी, जिंदगी की सेवा करते रह सकते हैं और शायद यही सबसे मज़बूत रिश्ता है.





