Himachal Se: पूरी दुनिया में बकरीद का त्योहार मनाया जा रहा है. बाजार सज गए हैं. घरों में कुर्बानी की तैयारी हो चली है. पूरी दुनिया में इस्लाम को मानने वाले लोग इस त्योहार को अपने तरीके से मनाते आ रहे हैं. पर, एक देश ऐसा भी है जिसने कई बार कुर्बानी पर प्रतिबंध लगाया. यह देश है मोरक्को. आइए, जानते हैं कि कुर्बानी पर प्रतिबंध क्यों लगाया, जबकि यहां मुस्लिम आबादी 99 फीसदी के आसपास बताई जाती है. प्रतिबंध कबकब लगाया गया?

मोरक्को एक मुस्लिम बहुल देश है. यहां करीब 99 फीसदी आबादी इस्लाम मानती है. ऐसे देश में ईद उल अजहा पर कुर्बानी रुक जाना बहुत बड़ी बात थी. यह पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना. मोरक्को में कुर्बानी पर रोक किसी धार्मिक विरोध के कारण नहीं लगी थी. यह फैसला मजबूरी में लिया गया था. देश सूखे, महंगाई और पशुधन संकट से गुजर रहा था. सरकार और शाही परिवार का कहना था कि ऐसे हालात में कुर्बानी से सामाजिक और आर्थिक बोझ बहुत बढ़ जाएगा.
बैन कब लगा था?
मोरक्को में कुर्बानी पर रोक का ऐलान 26 फरवरी 2025 को किया गया था. यह घोषणा मोरक्को के राजा मोहम्मद छठे की ओर से की गई. राजा का संदेश देश के इस्लामी मामलों के मंत्री ने सरकारी टीवी पर पढ़ा. उस समय साफ कहा गया कि साल 2025 की ईद उल अजहा पर आम लोग कुर्बानी न करें. राजा ने यह भी कहा कि वह प्रतीकात्मक रूप से पूरे देश की ओर से कुर्बानी अदा करेंगे. इस फैसले के बाद जून 2025 की ईद पर पूरे मोरक्को में सामान्य तरीके से कुर्बानी नहीं हुई.
मोरक्को में कुर्बानी पर रोक के ऐलान से पूरी दुनिया चौक गई थी. फोटो: Pexels
बैन की सबसे बड़ी वजह क्या थी?
इस रोक की सबसे बड़ी वजह लंबा सूखा था. मोरक्को कई साल से कम बारिश झेल रहा था. सूखे ने खेती को कमजोर किया. चारा महंगा हो गया. पानी की कमी बढ़ी. इसका सीधा असर पशुपालन पर पड़ा. रिपोर्ट्स के अनुसार 2016 के बाद से देश में भेड़ और मवेशियों की संख्या में बड़ी गिरावट आई. कई जगह कहा गया कि पशुधन में करीब 38 फीसदी तक कमी आई. जब पशु कम हुए, तो कीमतें बहुत तेजी से बढ़ीं. महंगाई भी बड़ी वजह बनी. मोरक्को में सिर्फ सूखा ही समस्या नहीं था.
आम परिवारों के लिए रोजमर्रा का खर्च संभालना मुश्किल हो रहा था. ऐसे में कुर्बानी के लिए भेड़ खरीदना और कठिन हो गया. एक भेड़ की कीमत 600 डॉलर तक पहुंच गई थी. यह रकम मोरक्को के कई गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों की मासिक आय से भी ज्यादा थी. यानी कुर्बानी धार्मिक भावना से जुड़ी थी, लेकिन आर्थिक बोझ बहुत भारी हो चुका था.
मोरक्को केराजा मोहम्मद छठे को धार्मिक नेतृत्व का भी दर्जा प्राप्त है. फोटो: Pexels/wikipedia
राजा मोहम्मद छठे ने क्या कहा?
राजा मोहम्मद छठे सिर्फ देश के शासक नहीं हैं. उन्हें धार्मिक नेतृत्व का भी दर्जा प्राप्त है. इसलिए उनका बयान बहुत अहम माना गया. राजा ने कहा कि मौजूदा हालात में कुर्बानी करना समाज के कमजोर वर्गों के लिए नुकसानदेह होगा. उन्होंने लोगों से अपील की कि वे इस साल कुर्बानी से दूर रहें. साथ ही उन्होंने कहा कि वह स्वयं पूरी जनता की ओर से कुर्बानी करेंगे. यह संदेश सिर्फ प्रशासनिक आदेश नहीं था. इसे धार्मिक और सामाजिक राहत के रूप में भी देखा गया.
क्या यह पहली बार हुआ था?
यह पहली बार नहीं था. मोरक्को में पहले भी ऐसे फैसले हो चुके हैं. राजा मोहम्मद छठे के पिता राजा हसन द्वितीय के शासन में भी कई बार कुर्बानी रोकी गई थी. ऐसे कदम साल 1963, 1981 और 1996 में भी लिए गए थे. उस समय वजह अलगअलग थीं. कभी युद्ध का असर था. कभी सूखा था. कहीं आर्थिक संकट था. इसलिए 2025 का फैसला नया जरूर था, पर बिल्कुल अभूतपूर्व नहीं था.
मोरक्को 99 फीसदी मुस्लिम आबादी वाला देश है. फोटो: Pexels
बैन लागू कैसे किया गया?
सरकार ने सिर्फ अपील पर ही बात खत्म नहीं की. फैसले को लागू कराने के लिए कई प्रशासनिक कदम उठाए गए. देश के अलगअलग हिस्सों में पशु बाजार बंद किए गए. साप्ताहिक मवेशी मंडियां रोकी गईं. कई इलाकों में अस्थायी बिक्री केंद्रों पर रोक लगी. कुछ जगहों पर बूचड़खाने भी बंद किए गए. कुर्बानी से जुड़े औजारों की बिक्री पर भी नजर रखी गई. इन कदमों का मकसद था कि फैसला केवल कागज पर न रहे, बल्कि जमीन पर भी लागू हो.
जनता की प्रतिक्रिया कैसी रही?
मोरक्को में इस फैसले पर मिलीजुली प्रतिक्रिया देखने को मिली. कई लोगों ने इसे सही बताया. उनका कहना था कि गरीब परिवार हर साल सामाजिक दबाव में महंगी भेड़ खरीदते हैं. ऐसे में रोक से उन्हें राहत मिलेगी. दूसरी ओर कुछ लोग दुखी भी थे. उनके लिए ईद उल अजहा की पहचान ही कुर्बानी से जुड़ी है. उन्हें लगा कि एक अहम धार्मिक परंपरा रुक गई. सोशल मीडिया पर भी बहस हुई. कुछ लोगों ने समर्थन किया. कुछ ने नाराजगी जताई. लेकिन कुल मिलाकर राज्य, धर्म और समाज के बड़े हिस्से ने इसे असाधारण हालात का फैसला माना.
मोरक्को सरकार ने पशुधन बचाने के लिए कई कदम उठाए.
2025 में ईद कैसे मनाई गई?
रोक के बावजूद ईद मनाई गई. नमाज हुई. परिवार मिले. रिश्तेदारों से मुलाकात हुई. दान और खैरात पर जोर दिया गया. लोगों ने त्योहार की रूह को जिंदा रखने की कोशिश की. राजा ने प्रतीकात्मक कुर्बानी की. इसका संदेश यह था कि धर्म की भावना बनी रहे, लेकिन जनता पर आर्थिक दबाव न पड़े. यानी ईद खत्म नहीं हुई थी. बस उसका एक बड़ा रूप सीमित कर दिया गया था.
सरकार ने संकट से निपटने के लिए क्या किया?
मोरक्को सरकार ने पशुधन बचाने के लिए कई कदम उठाए. पशुपालकों के लिए राहत योजनाएं शुरू कीं.वित्तीय पैकेज दिया गया. पशु आहार और नस्ल सुधार पर काम किया गया. कुछ कर और आयात शुल्क भी कम किए गए. विदेश से भेड़ें आयात करने की तैयारी भी की गई. इसका मकसद बाजार में आपूर्ति बढ़ाना था. सरकार चाहती थी कि भविष्य में कीमतें कुछ नियंत्रित रहें और राष्ट्रीय पशुधन फिर से मजबूत हो.
आज क्या स्थिति है?
अब सबसे अहम सवाल यही है. इस साल 2025 जैसी स्थिति नहीं है. इस साल ईद उल अजहा पर कुर्बानी फिर से सामान्य रूप में लौट आई है. यानी 2025 वाली रोक स्थायी नहीं थी. वह एक साल की असाधारण व्यवस्था थी. इस साल मोरक्को के परिवार फिर से पारंपरिक तरीके से कुर्बानी की ओर लौटे. हालांकि सरकार ने पूरी तरह हाथ नहीं खींचा. साल 2026 में पशु बाजारों की निगरानी बढ़ाई गई. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। कालाबाजारी रोकने के लिए नियम बनाए गए. अनधिकृत बिक्री, जमाखोरी और कृत्रिम महंगाई पर नजर रखने के निर्देश दिए गए. इसका मतलब साफ है. बैन अब लागू नहीं है, लेकिन सरकार अभी भी बाजार को नियंत्रित रखना चाहती है.
क्या संकट पूरी तरह खत्म हो गया?
यह कहना सही नहीं होगा कि सारी समस्याएं खत्म हो गईं. सूखे और महंगाई का असर अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं माना जा सकता. लेकिन 2025 जैसी कठोर स्थिति फिलहाल नहीं दिख रही. इस साल सरकार का रुख यह रहा कि कुर्बानी की इजाजत दी जाए, लेकिन बाजार पर सख्त निगरानी रखी जाए.
मोरक्को के इस फैसले ने एक बड़ा संदेश दिया. धार्मिक समाज भी कठिन आर्थिक हालात में व्यावहारिक फैसला ले सकता है. कुर्बानी इस्लामी परंपरा का अहम हिस्सा है, लेकिन उसे मजबूरी और दिखावे का बोझ नहीं बनना चाहिए. मोरक्को ने यह दिखाया कि जब पशुधन, किसान और गरीब परिवार संकट में हों, तब राज्य हस्तक्षेप कर सकता है. यह फैसला धार्मिक भावना को खत्म करने के लिए नहीं, बल्कि समाज को राहत देने के लिए लिया गया था.



