घर में एक दिन पानी न आए तो सबकी दिनचर्या बदल जाती है. बाल्टियां लग जाती हैं. कोई टैंकर खोजता है. चिड़चिड़ाहट बढ़ती है और हर गिलास पानी सोचकर खर्च होता है. पानी लौटता है तो कुछ दिनों में परेशानी भूल जाते हैं. पानी की याद अक्सर उसके चले जाने पर आती है.

1977 की गर्मियों में राजस्थान के लापोड़िया गांव से पानी बहुत पहले जा चुका था. जयपुर से करीब पचासी किलोमीटर दूर, दूदू इलाके के इस गांव में भयानक सूखा था. किसानों के पास काम नहीं था. कुएं सूखे थे. बारिश का पानी रोकने वाला तालाब करीब बीस साल से टूटा पड़ा था. सत्रह साल के लक्ष्मण सिंह छुट्टियों में घर आए तो गाँव निराशा में डूबा मिला. परिवारों और समुदायों में तनाव था. उन्होंने पढ़ाई पर वापस न जाने का फैसला किया. यहीं रहकर पानी लौटाने की कोशिश करेंगे.
977 में तालाब की टूटी पाल की मरम्मत शुरू हुई
बड़ों ने बात हंसी में उड़ा दी. कहा, तालाब संवारने के बजाय पिता का खेती में हाथ बंटाओ. दो लोगों ने सुना. एक मित्र और गांव के पुजारी ने. कुछ और लोगों को जोड़कर मई 1977 में तालाब की टूटी पाल की मरम्मत शुरू हुई. किसी को मजदूरी नहीं मिली. राजस्थान की तपती गर्मी में सबने मिलकर अपना श्रम दिया. जुलाई तक काम पूरा हुआ. बरसात आई और बीस साल बाद तालाब में पानी ठहरा.
1950 के दशक के अंत में जन्मा कोई बच्चा उस जुलाई में करीब बीस साल का रहा होगा. उसने अपने गांव का तालाब जीवन में पहली बार भरा देखा होगा.
गांव का भरोसा बदला, हंसने वाले भी साथ आए
इसके बाद गांव का भरोसा बदला. हंसने वाले भी साथ काम करने आए. लक्ष्मण सिंह बताते हैं कि पानी के काम ने झगड़ते परिवारों को भी साथ खड़ा किया. करीब दस साल युवाओं ने तालाबों की गाद निकाली, पालें बनाईं. मेहनत अपनी थी और कई बार पैसा लक्ष्मण सिंह का. 1986 में जाकर ग्राम विकास नवयुवक मंडल लापोड़िया का पंजीकरण हुआ.
सख्त जमीन से बारिश का पानी बह जाता था
गांव के अधिकांश परिवार गायभैंस और बकरियां पालते थे. लेकिन साझा चरागाह सूने थे. सख्त जमीन से बारिश का पानी बह जाता था. लक्ष्मण सिंह ने गांव वालों और कृषि विशेषज्ञों के साथ मिलकर चौका पद्धति विकसित की. हल्की ढलान वाली जमीन पर कम गहराई के आयताकार हिस्से बनाए गए. तीन तरफ मिट्टी की छोटी मेड़ें थीं. पहले हिस्से में पानी लगभग नौ इंच भरता तो धीरे से अगले में जाता. अंत में बचा पानी तालाब पहुंचता. पानी को मिट्टी में उतरने का समय मिला. घास लौटी और ज़मीन के नीचे पानी बढ़ा.
पानी के लिए एक लड़के को पढ़ाई छोड़नी पड़ी
चरागाह फिर हरे हुए. बाद के एक विवरण में तीस से अधिक तरह की घास दर्ज हुई. गांव में अन्न सागर, फूल सागर और देव सागर, तीन तालाब हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। 2001 के भीषण सूखे में लापोड़िया उन गांवों में बताया गया, जहां नुकसान कम हुआ. किसान साल में दो फसलें लेने लगे. दूध आमदनी का बड़ा सहारा बना. लक्ष्मण सिंह खुशी से कहते हैं कि लापोड़िया जयपुर को दूध पिलाता है. इसी गांव में कभी पानी के लिए एक लड़के को पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी.
ज़मीन और पेड़ों की रक्षा के नियम बनाए
हर कदम आसान नहीं था. गांव ने साझा ज़मीन और पेड़ों की रक्षा के नियम बनाए. पेड़ काटने वाले को पांच पौधे लगाने थे. अधिकारियों ने नोटिस भेजकर पूछा कि उन्होंने ऐसे अधिकार कैसे लिए. समय के साथ साझा ज़मीन से कब्ज़े हटे. चुनी हुई ग्राम समिति तालाबों और चरागाहों की देखभाल करने लगी.
पड़ोसी गांवों ने देखा और अपनाया. चौका पद्धति इलाके के करीब सत्तावनअट्ठावन गांवों तक पहुंची. अफगानिस्तान से भी लोग देखने आए. लक्ष्मण सिंह खुद को संयोग से बना जल विशेषज्ञ कहते हैं. मार्च 2023 में, उस गर्मी के लगभग छियालीस साल बाद, उन्हें पद्मश्री मिला. वह कहते हैं कि उनके यहां लोग तालाब, नदी और धरती को हमेशा पूजते आए हैं.उन्होंने उनकी देखभाल की परंपरा फिर जगाने की कोशिश की है.
38 वर्षों से वह साथियों के साथ हर साल धरती जतन यात्रा पर भी निकलते रहे हैं. गांवगांव पैदल जाकर लोगों के साथ बैठते हैं. उनके तालाबों, चरागाहों और साझा ज़मीन की बात करते हैं.
हमारे घर के पानी के पीछे भी कोई होगा, जिसने कभी पाल बनाई, नहर खोदी या पाइपलाइन के लिए आवाज़ उठाई. शायद हमारे जन्म से पहले. हम नल खोलते हैं और उसे याद नहीं करते. लापोड़िया में हर बरसात उस तालाब को भरती है, जिसे 1977 की गर्मियों में एक सत्रह साल के लड़के, उसके मित्र और एक पुजारी ने मिलकर संवारा था.



