Mental Health Awareness For Children: आज के दौर में सोशल मीडिया और समाज में बढ़ते परफेक्शन के ट्रेंड ने पेरेंट्स के बीच एक नई तरह की प्रतिस्पर्धा पैदा कर दी है। हर मातापिता चाहते हैं कि उनका बच्चा सबसे आगे रहे, हर क्षेत्र में बेहतरीन प्रदर्शन करे और जिंदगी में बड़ी सफलता हासिल करे। अपने बच्चों के लिए अच्छा सोचना गलत नहीं है, लेकिन जब यही उम्मीदें जरूरत से ज्यादा दबाव में बदल जाती हैं, तब यह बच्चों की मानसिक सेहत पर बुरा असर डाल सकती हैं।

जानिए क्या होती है ‘पुशी पेरेंटिंग’?

जब मातापिता अपनी अधूरी इच्छाएं, सपने या अपेक्षाएं बच्चों पर थोपने लगते हैं और उन्हें हर कीमत पर सफल या परफेक्ट बनने के लिए मजबूर करते हैं, तो इस व्यवहार को मनोविज्ञान की भाषा में ‘पुशी पेरेंटिंग’ कहा जाता है। बाहर से यह अनुशासन और सफलता की तैयारी जैसी लग सकती है, लेकिन लंबे समय में यह बच्चे के भावनात्मक और मानसिक विकास को प्रभावित कर सकती है।

  • हर वक्त बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद बन जाती है तनाव की वजह

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, ऐसे माहौल में बच्चा धीरेधीरे यह महसूस करने लगता है कि उसकी पहचान केवल उसके रिजल्ट या उपलब्धियों से जुड़ी है। वह खेल, रचनात्मकता और सीखने की खुशी छोड़कर सिर्फ अच्छा प्रदर्शन करने के दबाव में जीने लगता है। इससे उसके अंदर लगातार तनाव और असफल होने का डर बढ़ सकता है।

  • अच्छे नंबर भी कम पड़ जाते हैं

पुशी पेरेंटिंग में अक्सर मातापिता बच्चे से हमेशा सबसे ज्यादा अंक लाने या हर प्रतियोगिता में पहला स्थान हासिल करने की उम्मीद रखते हैं। अगर बच्चा अच्छा प्रदर्शन भी कर दे, लेकिन टॉप न कर पाए, तो उसे आलोचना या करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में बच्चे को लगने लगता है कि उसकी मेहनत की कोई अहमियत नहीं है। धीरेधीरे वह खुद को तभी सफल मानता है, जब वह दूसरों की उम्मीदों पर पूरी तरह खरा उतरता है।

  • बच्चे की रुचियों को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी

कई बार बच्चों की दिलचस्पी खेल, संगीत, पेंटिंग या किसी दूसरी रचनात्मक गतिविधि में होती है, लेकिन मातापिता उन्हें अपनी पसंद के करियर या पढ़ाई की दिशा में आगे बढ़ाना चाहते हैं। लगातार ऐसा होने पर बच्चा अपनी इच्छाओं को दबाने लगता है और केवल वही करने की कोशिश करता है जिससे उसके मातापिता खुश रहें।

  • तुलना करने की आदत आत्मविश्वास को पहुंचाती है नुकसान

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि जब बच्चों की लगातार दूसरे बच्चों से तुलना की जाती है, तो उनका होने लगता है। वे खुद को कमतर समझने लगते हैं और उनके अंदर हीन भावना विकसित हो सकती है। इस स्थिति को सेल्फडाउट पैटर्न कहा जाता है, जिसमें बच्चा अपनी क्षमता पर भरोसा खोने लगता है।

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  • हर फैसला मातापिता लेने लगें तो घटती है आत्मनिर्भरता

अगर बच्चे के कपड़े, खाना, दोस्त, शौक या खाली समय का इस्तेमाल जैसे हर छोटेबड़े फैसले मातापिता ही लेने लगते हैं, तो बच्चे को अपनी सोच विकसित करने का अवसर नहीं मिल पाता। धीरेधीरे वह निर्णय लेने में असहज महसूस करने लगता है और बड़े होने के बाद भी छोटीछोटी बातों में दूसरों पर निर्भर रहने की आदत विकसित हो सकती है।

  • मार्गदर्शन दें, दबाव नहीं

विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को सही दिशा देना मातापिता की जिम्मेदारी है, लेकिन उन पर जरूरत से ज्यादा अपेक्षाओं का बोझ डालना उचित नहीं है। बच्चों को अपनी रुचि के अनुसार सीखने, गलतियों से अनुभव लेने और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का अवसर देना उनके मानसिक, भावनात्मक और व्यक्तित्व विकास के लिए अधिक लाभदायक माना जाता है।