बीते कुछ बरस में करीब आधा दर्जन ऐसे आईपीओ आए, जिनका साइज 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का देखने को मिला था. उनमें से कुछ ऐसे भी रहे जिन्हें उस समय का देश का बड़ा आईपीओ भी कहा गया. लेकिन सवाल ये है कि क्या उन आईपीओ ने देश के आम निवेशकों को अमीर बनाया? क्या उन आईपीओ ने आम निवेशकों को कमाई कराने में कोई अहम भूमिका निभाई. जवाब मिलेगा नहीं. आंकड़ों को देखें तो उन आधा दर्जन में से 4 आईपीओ अपने इश्यू प्राइस से नीचे की ओर ट्रेड कर रहे हैं. वहीं दो ही आईपीओ ऐसे हैं, जोकि मौजूदा समय में अपने इश्यू प्राइस से मामूली तेजी पर हैं.

आखिर आज हम ये सवाल क्यों उठा रहे हैं? उसका सबसे बड़ा कारण है एनएसई का आईपीओ. जो कि 22,500 करोड़ रुपए से ज्यादा का है. हुंडई के बाद ये देश का दूसरा सबसे बड़ा आईपीओ भी है. बीते कुछ दिनों में एनएसई के आईपीओ का जीएमपी अपने पीक से करीब 70 फीसदी नीचे आ गया है. मात्र 3 फीसदी के आसपास के प्रीमीयम पर दिखाई दे रहा है. जिसका मतलब है कि निवेशकों को एनएसई के आईपीओ से ज्यादा कमाई की उम्मीद नहीं है. भले ही उसका सब्सक्रिप्शन कितना ही हो जाए. जैसा कि एलआईसी के मामले में देखने को मिला था. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। बंपर आईपीओ होने के बाद भी एलआईसी की लिस्टिंग काफी खराब देखने को मिली थी. आइए इस पूरी कहानी को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं….
6 आईपीओ और एक करोड़
क्या भारत में 10,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के IPO निवेशकों के लिए पैसे कमाने का सुरक्षित जरिया नहीं है? हाल के समय में ऐसे छह बड़े IPO से कुल मिलाकर लगभग 1.06 लाख करोड़ रुपए जुटाए गए, लेकिन इनमें से चार अभी भी अपने इश्यू प्राइस से नीचे ट्रेड कर रहे हैं. NSE, जो IPO के जरिए 22,562 करोड़ रुपए जुटा रहा है, भारत की दूसरी सबसे बड़ी पब्लिक लिस्टिंग बनने जा रहा है.
Ace Equity के डेटा के अनुसार, Hyundai India, जिसने 27,870 करोड़ रुपए जुटाकर देश का सबसे बड़ा IPO लॉन्च किया था, अपने इश्यू प्राइस से 11 फीसदी ऊपर है. Tata Capital, जिसने 15,511 करोड़ रुपये जुटाए, 8 फीसदी ऊपर है. ये दो ही ऐसे नाम हैं जिन्होंने अच्छा रिटर्न दिया है.
बाकी IPO ने निवेशकों को नुकसान पहुंचाया है. LIC, जिसने 20,557 करोड़ रुपए जुटाए थे, अपने इश्यू प्राइस से 57 फीसदी नीचे है. Paytm, जिसका इश्यू साइज 18,300 करोड़ रुपए था, 15 फीसदी नीचे है. HDB Financial, जिसने 12,500 करोड़ रुपए जुटाए, 6 फीसदी नीचे है, जबकि LG Electronics, जिसने 11,607 करोड़ रुपए जुटाए, 49 फीसदी नीचे है.
आसान शब्दों में कहें तो, 10,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के छह IPO में से चार ने नेगेटिव रिटर्न दिया है. इश्यू प्राइस से औसत रिटर्न लगभग माइनस 18 फीसदी है. इश्यू साइज के आधार पर देखें तो भी रिटर्न लगभग 16 फीसदी नेगेटिव है. इससे पता चलता है कि सिर्फ बड़े साइज को देखकर IPO में निवेश करने वालों के लिए यह एक चेतावनी है.
बीते कुछ सालों में आए 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के इश्यू
| कंपनी का नाम | इश्यू का साइज | रिटर्न |
| हुंडई इंडिया | 27,870 | 11 |
| एलआईसी | 20,557 | 57 |
| पेटीएम | 18,300 | 15 |
| टाटा कैपिटल | 15,511 | 8 |
| एचडीबी फाइनेंशियल | 12,500 | 6 |
| एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स | 11,607 | 49 |
NSE के लिए आगे क्या है?
NSE अब ज्यादातर IPOs के मुकाबले एक मजबूत ब्रांड के साथ इस क्लब में शामिल हो रहा है, लेकिन इसके साथ ही बड़े ऑफर वाली चुनौतियां भी हैं. यह इश्यू पूरी तरह से ‘ऑफर फ़ॉर सेल’ है, जिसका मतलब है कि NSE को IPO से नया पैसा नहीं मिलेगा.
मौजूदा शेयरहोल्डर लगभग 12.64 करोड़ शेयर बेच रहे हैं. प्राइस बैंड 1,7001,785 रुपए प्रति शेयर है, और ऊपरी बैंड पर IPO का साइज 22,561.57 करोड़ रुपए है. यह इश्यू 17 सितंबर को खुला और 21 सितंबर को बंद होगा, और BSE पर लिस्टिंग 24 सितंबर को होनी है.
ग्रे मार्केट से पहले ही सावधानी का संकेत मिल रहा है. NSE का GMP, जो प्राइस बैंड की घोषणा के समय लगभग 192 रुपए था, गिरकर लगभग 48 रुपए हो गया है. 1,785 रुपए के ऊपरी प्राइस बैंड पर, इसका मतलब है कि लिस्टिंग प्रीमियम 2.50 से थोड़ा ज्यादा होगा. 2.50 से थोड़ा ज्यादा जीएमपी का मतलब IPO का फेल होना नहीं है, लेकिन यह साफ़ दिखाता है कि लिस्टिंग के समय जबरदस्त उछाल की जो उम्मीद पहले थी, वह अब कम हो गई है.
सब्सक्रिप्शन भी बहुत जबरदस्त नहीं, बल्कि ठीकठाक रहा है. पहले दिन IPO 42 फीसदी सब्सक्राइब हुआ. दूसरे दिन के अंत तक, यह 1.15 गुना सब्सक्राइब हुआ, जिसमें QIBs 1.32 गुना, NIIs 1.44 गुना और रिटेल 0.68 गुना सब्सक्राइब हुए. अगर बात 21 सितंबर में अब तक की बात करें तो सब्सक्रिप्शन तीन गुना तक हो चुका है.
NSE एक अनोखा बिजनेस है, लेकिन इसका IPO सस्ता नहीं है. ऊपरी प्राइस बैंड पर, एक्सचेंज की वैल्यूएशन लगभग 4.42 लाख करोड़ रुपए है, जो वित्त वर्ष 2026 की कमाई का लगभग 43 गुना है. यह वैल्यूएशन कई ग्लोबल एक्सचेंजों से ज्यादा है, लेकिन एनालिस्ट का कहना है कि निवेशक NSE के दबदबे और भारत के लॉन्गटर्म कैपिटल मार्केट की ग्रोथ के लिए पैसे दे रहे हैं.
मजबूत बिजनेस, लेकिन सावधानी जरूरी
अरिहंत कैपिटल मार्केट्स की चीफ स्ट्रैटेजी ऑफिसर श्रुति जैन ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि NSE मजबूत ऑपरेटिंग मार्जिन वाला एक प्रमुख मार्केट लीडर है, लेकिन निवेशकों को वॉल्यूम के प्रति इसकी संवेदनशीलता के बारे में पता होना चाहिए. उन्होंने पहले कहा था कि NSE लॉन्गटर्म निवेशकों के लिए एक बेहतरीन बिजनेस है, लेकिन मार्केट वॉल्यूम के प्रति इसकी संवेदनशीलता को देखते हुए आपको थोड़ी सावधानी बरतनी चाहिए. हालांकि, इसकी लगभग 79 फीसदी कमाई ट्रांजैक्शन चार्ज से होती है, जिससे इसकी कमाई मार्केट में उतारचढ़ाव और डेरिवेटिव्स पर रेगुलेटरी सख्ती के प्रति संवेदनशील हो जाती है. यह निवेशकों के लिए सबसे बड़े सवालों में से एक है. भारत के कैपिटल मार्केट में NSE का दबदबा तो है ही, लेकिन इसकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा कोविड के बाद ऑप्शंस में आई तेजी से बढ़ा है. अगर सेबी के सख्त नियमों के कारण डेरिवेटिव्स वॉल्यूम कम होता है, तो कमाई की रफ्तार धीमी हो सकती है.
जरूरी है इंस्टीट्यूशनल डिमांड
मास्टर कैपिटल सर्विसेज के चीफ रिसर्च ऑफिसर डॉ. रवि सिंह ने भी इसी जोखिम की ओर इशारा किया था. उन्होंने कहा कि NSE एक मजबूत बिजनेस है, लेकिन निवेशकों को इसके वैल्यूएशन और डेरिवेटिव्स पर इसकी निर्भरता पर नजर रखनी चाहिए. एक और इश्यू साइज का है. बड़े IPO को मजबूत लिस्टिंग के लिए लगातार इंस्टीट्यूशनल डिमांड की जरूरत होती है. अविनाश मेंटर रिसर्च सर्विसेज के फाउंडर और हेड रिसर्च अविनाश गोराक्षकर ने मीडिया रिपोर्ट में कहा कि अपने बड़े पैमाने और विजिबिलिटी के कारण NSE का इश्यू इंस्टीट्यूशनल और HNI का पैसा खींच सकता है. लेकिन उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि इसके बहुत बड़े साइज और नए इश्यू से ग्रोथ इंजन न होने के कारण, लिस्टिंग पर फायदा छोटे, हाईग्रोथ वाले IPO की तुलना में कम हो सकता है.



