भारत में महिलाओं का फर्टिलिटी आज घटकर 1.9 हो गया है. ये आंकड़ा एनएफएचएस6 रिपोर्ट में सामने आया है. देखा जाए तो एवरेज फर्टिलिटी 2 से ऊपर होना चाहिए जबकि देश में ये लगातार घट रहा है. इनर्फिटिलिटी के पीछे कई कारण हो सकते हैं जिनमें से एक जॉब कल्चर भी है. महिलाएं और पुरुष अपने काम के स्ट्रेस में इस कदर बिजी हैं कि उनकी नौकरी ही मातापिता बनने का सुख छीन रही है.

कई रिसर्च में पाया गया है कि नौकरी का तनाव लोगों की इनफर्टिलिटी से संबंधित समस्याओं से जुड़ा होता है. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे जॉब और बिजी लाइफ का ये रूटीन लोगों को इनफर्टिलिटी का शिकार बना रहा है.
फर्टिलिटी का क्या मतलब है
आयुर्वेदिक डॉक्टर चंचल शर्मा कहती हैं कि फर्टिलिटी किसी व्यक्ति की नेचुरली बच्चा पैदा करने की क्षमता को कहते है. यह सुनने में जितना आसान लगता है उतना ही नाजुक विषय भी है. ऐसे कई तरीके हैं जिनसे आपका कॉर्पोरेट रूटीन आपकी फर्टिलिटी में रुकावट डाल सकता है.
कॉर्पोरेट कल्चर कैसे बढ़ा रहा इनफर्टिलिटी का डर
डेस्क पोटैटो क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि काम के घंटों के बीच आप कितनी देर तक अपनी डेस्क पर बैठते हैं? लोग सोचते है की काम करने के लिए ध्यान और निरंतरता ज़रूरी है इसलिए ज्यादा देर तक बैठना आम माना जाता है. हालांकि, यह लगातार बैठने का जाल आपकी ताकत खा रहा है, जिससे आपकी मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं. यह तब होता है जब आप अचानक मसल्स की मूवमेंट करने की कोशिश करते हैं. इससे न सिर्फ़ पीठ दर्द होता है, बल्कि आपके पेल्विक एरिया में ब्लड सर्कुलेशन भी काफी धीमा हो जाता है, जिससे आपकी फर्टिलिटी पर असर पड़ता है.
मेलाटोनिन ट्रैप हम अक्सर यह मान लेते हैं कि हमारी स्क्रीन से निकलने वाली नीली किरणें सिर्फ हमारी नींद में रुकावट डालती हैं. लेकिन असल में वो नीली किरणें शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पत्ति को रोक सकती हैं. मेलाटोनिन न सिर्फ बेहतर नींद लेने में मदद करता है बल्कि यह एक असरदार एंटीऑक्सीडेंट भी है जो महिलाओं के एग्स को किसी भी तरह के नुकसान से बचाता है.
कॉफी कल्चर कई रिसर्च से पता चला है कि जो गर्भवती महिलाएं रोजाना तीन कप से ज्यादा कॉफी पीती हैं उनमें कंसीव करने की क्षमता कम होने का डर बना रहता है या फिर ये 50% तक कम हो सकती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि कैफीन फैलोपियन ट्यूब में होने वाली नेचुरल एक्टिविटीज को रोकता है, जिससे सफल गर्भाधान और नेचुरल प्रेगनेंसी की संभावना में रुकावट आती है.
बढ़ती उम्र और देर से फैसले लेना आज के व्यस्त कामकाज के माहौल ने युवा पीढ़ी के बीच फैमिली प्लानिंग के फैसले में रुकावट डाली है. इसका नतीजा यह हुआ है कि फैमिली प्लानिंग देर से होती है, जिससे उम्र की कमी के कारण महिलाओं की फर्टिलिटी पर असर पड़ता है. जन्म के समय, महिलाओं के एग्स की क्वांटिटी तय होती है. जब कोई महिला 30 साल या उससे ज़्यादा उम्र की हो जाती है तो एग्स की संख्या कम होने लगती है, जिसे लो AMH भी कहते हैं. जब तक वह गर्भधारण के लिए तैयार होती है, तब तक उनका शरीर थक चुका होता है, इसलिए उन्हें कंसीव करने में मुश्किल हो सकती है.
स्ट्रेस साइकिल भी है कारण डेडलाइन, लगातार मीटिंग, समय पर रिजल्ट देने के दबाव से दिमाग पर बहुत ज्यादा तनाव पढता है जिससे कोर्टिसोल निकलता है, जो स्ट्रेस से निपटने वाला मुख्य हार्मोन है. लंबे समय तक कोर्टिसोल का ज़्यादा लेवल LH और FSH के निर्माण में रुकावट डालता है, जिससे कुछ महिलाओं के ओव्यूलेशन साइकिल पर भी असर पड़ता है. आसान शब्दों में कहें तो, तनाव के समय फ़र्टिलिटी का महत्व ख़तम हो जाता है. यही वजह है कि नौकरी के स्ट्रेस की वजह से कई महिलाओं को हार्मोनल इम्बैलेंस या असंतुलित पीरियड्स का अनुभव होता है.
केमिकल्स और टॉक्सिन्स के संपर्क में आना: अगर आप मैन्युफैक्चरिंग, केमिकल या हेल्थ केयर इंडस्ट्री में काम करते हैं, तो आप भी उनके साइड इफ़ेक्ट्स के संपर्क में आ सकते हैं. आपके आसपास छिपे हुए बैक्टीरिया, जिन पर किसी का ध्यान नहीं जाता. ये केमिकल आपके हॉर्मोन में दखल दे सकते हैं, जिससे आपकी फर्टिलिटी पर असर पड़ सकता है.
एक्सपर्ट ने क्या कहा का सुझाव: एक्सपर्ट चंचल शर्मा कहती हैं कि सावधानी बरतने और प्रोटेक्टिव गियर पहनने से इनफर्टिलिटी का रिस्क कम हो सकता है. इसलिए लोगों में जॉब का स्ट्रेस कम करने के लिए ज़रूरी उपाय ढूंढ़ना तथा उन्हें लागू करना बेहद ज़रूरी है.


