दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला इस्लामिक देश इंडोनेशिया, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पहल का स्थायी सदस्य बनने से पीछे हट गया है। इस मुद्दे पर इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो को देश के भीतर कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। बढ़ते विरोध के बीच सुबियांतो ने स्पष्ट किया कि इंडोनेशिया स्थायी सदस्यता के लिए मांगी जा रही 1 अरब डॉलर की राशि नहीं देगा। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। राष्ट्रपति के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर जारी बयान में उन्होंने कहा कि इंडोनेशिया ने इस पहल के तहत केवल शांति स्थापना के लिए सैनिक भेजने की प्रतिबद्धता जताई थी, न कि स्थायी सदस्य बनने की।
बजट को लेकर मामला अटका
फरवरी की शुरुआत में इंडोनेशियाई सरकार के बड़े अधिकारियों के बयानों से काफी भ्रम की स्थिति पैदा हो गई। 3 फरवरी को वित्त मंत्री पुरबय युधि सदेवा ने सुझाव दिया कि गाजा की मदद के लिए पैसा रक्षा मंत्रालय के बजट से निकाला जा सकता है। उसी दिन विदेश मंत्री सुगियोनो ने कहा कि पैसा देना अनिवार्य (जरूरी) नहीं है। हालांकि, उन्होंने उस वक्त साफ मना भी नहीं किया था। बैद में राष्ट्रपति प्रबोवो ने स्पष्ट किया कि गाजा के पुनर्निर्माण के लिए इंडोनेशिया जो भी मदद देगा, वह अपनी मर्जी से देगा। यह मदद मानवीय संस्थाओं के जरिए भेजी जाएगी और इसका बोर्ड ऑफ पीस की सदस्यता से कोई लेना-देना नहीं होगा।
कोई पैसा देने का वादा नहीं
19 फरवरी को वाशिंगटन, डीसी में बोर्ड ऑफ पीस की पहली बड़ी बैठक हुई। इस बैठक में अमेरिका और मिडिल-ईस्ट (खाड़ी) के देशों ने मिलकर कुल $17 बिलियन (लगभग 1.4 लाख करोड़ रुपये) देने का वादा किया। इंडोनेशिया का रुख: इतनी बड़ी रकम के वादों के बावजूद इंडोनेशिया ने एक भी पैसा देने का वादा नहीं किया। टेम्पो की रिपोर्ट के मुताबिक प्रबोवो ने कहा बाकी सभी देशों ने कुछ न कुछ योगदान दिया, कुछ ने तो बहुत बड़ी रकम दी। लेकिन इंडोनेशिया उनमें शामिल नहीं था। जब मुझसे पूछा गया, तो मैंने कोई भी फंड देने का वादा नहीं किया। इंडोनेशिया अंतरराष्ट्रीय बैठकों में शामिल तो हो रहा है, लेकिन वह किसी भी दबाव में आकर पैसा देने को तैयार नहीं है। उनका कहना है कि वे अपनी मर्जी और सही समय पर ही मदद करेंगे।



