
नई दिल्ली। आजकल सोशल मीडिया पर आपने कई ऐसे पोस्ट देखे होंगे, जिसमें आपसे कहा जाता है कि हमेशा अच्छा सोचो, पॉजिटिव सोचो। सुनने में यह काफी मोटिवेटिंग लगता है।
लेकिन जब हम हर बात में सिर्फ पॉजिटिव पहलुओं पर ध्यान देना शुरू कर देते हैं और उससे जुड़ी नेगेटिव बातों को अनदेखा करना शुरू कर देते हैं, तो उसे टॉक्सिक पॉजिटिविटी कहा जाता है।
क्या है पॉजिटिव टॉक्सिसिटी?
पॉजिटिव टॉक्सिसिटी का मतलब है कि इंसान को चाहे कितनी भी बड़ी समस्या क्यों न हो, उसे हमेशा खुश रहना चाहिए और केवल पॉजिटिव पॉइन्ट ऑफ व्यू ही रखना चाहिए। यह उदासी, गुस्सा, डर या हताशा जैसे ह्यूमन इमोशन्स को पूरी तरह से नकार देती है।
दरअसल, जब हम सिर्फ पॉजिटिव बातों पर ही ध्यान देना शुरू कर देते हैं, तो अनजाने में हम अपने दर्द और तकलीफ को इनवैलिडेट कर देते हैं। इसके कारण हमारे अंदर दबी भावनाएं बाहर नहीं निकल पातीं और इसका असर हमारी मेंटल हेल्थ पर भी दिखाई देता है।
यह आपकी मेंटल हेल्थ को कैसे प्रभावित करती है?
भावनाओं को दबाना- जब हम अपनी सच्ची भावनाओं को स्वीकार नहीं करते, तो वे खत्म नहीं होतीं, बल्कि अंदर ही अंदर जमा होने लगती हैं। भावनाओं को दबाने से तनाव बढ़ता है और एंग्जायटी या डिप्रेशन का खतरा बढ़ जाता है।
गिल्ट और शर्म की भावना- अगर आप किसी बुरे दौर से गुजर रहे हैं और हर तरफ से आपको पॉजिटिव रहने की सलाह मिल रही है, तो आप खुद को ही दोषी मानने लगते हैं। आपको लगता है कि शायद आप ही कमजोर हैं जो पॉजिटिव नहीं रह पा रहे।
कनेक्शन में कमी- जब हम अपनी तकलीफें शेयर नहीं करते, तो हमारे रिश्ते सतही हो जाते हैं। हम दूसरों के सामने एक परफेक्ट इमेज बनाए रखने के चक्कर में अकेले पड़ जाते हैं।
समस्या का समाधान न होना- दुख या डर हमें संकेत देते हैं कि कुछ गलत है जिसे ठीक करने की जरूरत है। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। अगर हम जबरन मुस्कराते रहेंगे, तो हम समस्या के मूल कारण तक कभी नहीं पहुंच पाएंगे।
इससे कैसे बचें?
हर भावना को स्वीकारें- यह समझना जरूरी है कि उदास होना, गुस्सा करना या असफल महसूस करना सामान्य है। ये भावनाएं आपको कमजोर नहीं, बल्कि इंसान बनाती हैं।
सोशल मीडिया से दूरी- सोशल मीडिया की परफेक्ट लाइफ वाली दुनिया से प्रभावित न हों। वह केवल एक पहलू है, पूरी सच्चाई नहीं।
रियलिस्टिक बनें- जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहेंगे। हर समय खुश रहना संभव नहीं है।
सुनना सीखें- अगर कोई अपना दुख बता रहा है, तो उसे तुरंत पॉजिटिव सलाह देने के बजाय बस उसे सुनें।




