Saturday, March 21, 2026
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प्रशांत महासागर में फटा ‘न्यूक्लियर डोम’, अंदर 120000 टन रेडियोएक्टिव कचरा, 24 हजार साल तक नहीं खत्म होगा जहर!!..

प्रशांत महासागर में फटा ‘न्यूक्लियर डोम’, अंदर 120000 टन रेडियोएक्टिव कचरा, 24 हजार साल तक नहीं खत्म होगा जहर!!..
प्रशांत महासागर में फटा ‘न्यूक्लियर डोम’, अंदर 120000 टन रेडियोएक्टिव कचरा, 24 हजार साल तक नहीं खत्म होगा जहर!!..

Runit Dome Leaking: प्रशांत महासागर के नीले पानी के बीच एक ऐसी जगह है, जिसे दुनिया ‘मौत का गुंबद’ या रूनिट डोम के नाम से जानती है. मार्शल आइलैंड्स में मौजूद यह डोम अमेरिका के दर्जनों परमाणु परीक्षणों से निकले घातक रेडियोधर्मी कचरे का कब्रिस्तान है. हालिया रिपोर्ट्स और वैज्ञानिकों की जांच में यह बात सामने आई है कि यह विशालकाय कंक्रीट का ढांचा अब कमजोर पड़ रहा है. समुद्र का बढ़ता जलस्तर और जलवायु परिवर्तन इस ‘न्यूक्लियर टॉम्ब’ की दीवारों में दरारें डाल रहे हैं. अगर यह कचरा पूरी तरह समुद्र में मिल गया, तो इसका परिणाम इतना भयानक होगा कि इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है.

साल 1958 में अमेरिकी सेना ने मार्शल आइलैंड्स के रूनिट द्वीप पर ‘कैक्टस’ नाम का एक परमाणु परीक्षण किया था. यह धमाका 18 किलोटन का था, जिसने जमीन पर एक बहुत बड़ा गड्ढा बना दिया था. 1970 के दशक के अंत में, अमेरिका ने एनेवेटक एटोल के आसपास बिखरे हुए रेडियोधर्मी मलबे और दूषित मिट्टी को इकट्ठा करना शुरू किया.

इस सफाई अभियान के दौरान करीब 1,20,000 टन जहरीला कचरा इसी गड्ढे में भर दिया गया. इसके ऊपर 18 इंच मोटी कंक्रीट की एक चादर बिछा दी गई, जिसे आज हम रूनिट डोम कहते हैं. इसे केवल एक अस्थायी समाधान के तौर पर बनाया गया था, लेकिन दशकों बाद भी यह वहीं मौजूद है.

इस डोम के नीचे जो कचरा दबा है, उसमें प्लूटोनियम-239 की भारी मात्रा मौजूद है. यह एक ऐसा खतरनाक तत्व है जो 24,000 सालों तक इंसानों और पर्यावरण के लिए जानलेवा बना रह सकता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि डोम के नीचे की जमीन छिद्रपूर्ण कोरल से बनी है, जिसके कारण समुद्री पानी नीचे से अंदर घुस रहा है.

कोलंबिया यूनिवर्सिटी की रिसर्च के अनुसार, डोम के बाहर की मिट्टी में पहले से ही रेडिएशन का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया है. यह इस बात का संकेत है कि या तो डोम लीक हो रहा है या फिर सफाई के वक्त भारी लापरवाही बरती गई थी.

मार्शल आइलैंड्स का ज्यादातर हिस्सा समुद्र तल से केवल 2 मीटर ऊपर है. जलवायु वैज्ञानिकों का अनुमान है कि साल 2100 तक यहां समुद्र का स्तर 1 मीटर तक बढ़ सकता है. ऐसी स्थिति में रूनिट डोम पूरी तरह लहरों की चपेट में आ जाएगा. समुद्री तूफान और ऊंची लहरें इस कमजोर हो चुके ढांचे को कभी भी तोड़ सकती हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कंक्रीट का यह कवच टूटा, तो प्रशांत महासागर में रेडिएशन का ऐसा सैलाब आएगा जो समुद्री ईकोसिस्टम को तबाह कर देगा. स्थानीय लोग जो इस द्वीप से महज 20 मील दूर रहते हैं, उनके लिए यह जीवन और मरण का सवाल बन चुका है.

संयुक्त राष्ट्र और कई अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं ने अमेरिका से इस कचरे की जिम्मेदारी लेने की अपील की है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। 2024 की एक रिपोर्ट में बताया गया कि तूफान और बढ़ता जलस्तर इस जहरीले कचरे को पूरे एटोल में फैला सकते हैं. मार्शल आइलैंड्स के निवासियों का कहना है कि विदेशी ताकतों के परमाणु परीक्षणों ने उन्हें पीढ़ियों से विस्थापित किया है. अब जलवायु परिवर्तन उनके अस्तित्व के लिए दूसरा बड़ा खतरा बन गया है.

me.sumitji@gmail.com

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