मध्य पूर्व में चल रहा अमेरिका-ईरान युद्ध तेजी से महंगा और जटिल होता जा रहा है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार युद्ध के केवल शुरुआती छह दिनों में ही अमेरिका को कम से कम ग्यारह अरब तीन सौ मिलियन डॉलर से अधिक का खर्च उठाना पड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संघर्ष इसी तरह जारी रहा तो यह अमेरिका के लिए एक और लंबा और अत्यधिक महंगा युद्ध साबित हो सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी अधिकारियों ने सांसदों को एक बंद कमरे की बैठक में बताया कि युद्ध के पहले छह दिनों में ही करीब ग्यारह अरब तीन सौ मिलियन डॉलर खर्च हो चुके हैं। इसमें से लगभग पांच अरब छह सौ मिलियन डॉलर के हथियार और गोला बारूद केवल पहले दो दिनों में ही इस्तेमाल कर लिये गये थे। यह आंकड़ा इस युद्ध की तीव्रता और महंगाई को स्पष्ट रूप से दिखाता है।
हालांकि यह अनुमान केवल शुरुआती युद्ध खर्च को ही दर्शाता है। इसमें उन संसाधनों और सैन्य तैयारियों का खर्च शामिल नहीं है जो हमले से पहले सैनिकों की तैनाती और सैन्य उपकरणों की तैयारी में लगाया गया था। न्यू यार्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार वास्तविक लागत इससे कहीं अधिक हो सकती है क्योंकि कई खर्च अभी जोड़े ही नहीं गये हैं।
गौरतलब है कि बारह मार्च तक अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को तेरह दिन हो चुके हैं। यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ था जब अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर संयुक्त हवाई हमले किये थे। इन हमलों के बाद क्षेत्र में तनाव तेजी से बढ़ गया और संघर्ष लगातार जारी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस अभियान को ऑपरेशन एपिक फ्यूरी नाम दिया है। ट्रंप ने दावा किया है कि इस अभियान के शुरुआती चरण में अमेरिका ने बड़ी जीत हासिल की है और ईरान की वायु सेना, राडार तंत्र तथा मिसाइल क्षमता को काफी हद तक नष्ट कर दिया गया है। हालांकि कई विश्लेषकों और आलोचकों का कहना है कि यह दावा पूरी तरह सही नहीं हो सकता और युद्ध अभी लंबा चल सकता है।
युद्ध के खर्च को लेकर सामने आये आंकड़े भी चौंकाने वाले हैं। न्यू यार्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी सेना ने युद्ध के पहले दो दिनों में ही करीब पांच अरब छह सौ मिलियन डॉलर के हथियार इस्तेमाल कर लिये थे। यह वह आंकड़ा है जो सार्वजनिक रूप से बताये गये खर्च से कहीं अधिक माना जा रहा है।
इसी बीच ट्रंप की नीतियों को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। आलोचक पूछ रहे हैं कि यदि अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद उनका बेटा ही उनका उत्तराधिकारी बन गया है तो फिर अमेरिका ने आखिर किस उद्देश्य से यह महंगा युद्ध छेड़ा? क्या ट्रंप ने एक खामेनेई को हटाकर दूसरे खामेनेई को सत्ता में लाने के लिए ही अरबों डॉलर फूंक डाले। यह सवाल अब अमेरिकी राजनीति और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के बीच बहस का विषय बनता जा रहा है।
हम आपको यह भी बता दें कि रणनीतिक और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र नामक संस्था ने भी इस युद्ध के शुरुआती सौ घंटों के खर्च का अनुमान लगाया था। संस्था के अनुसार युद्ध के पहले सौ घंटों में करीब तीन अरब सात सौ मिलियन डॉलर खर्च हुए, यानी लगभग आठ सौ इक्यानबे मिलियन डॉलर प्रतिदिन। यह खर्च किसी भी आधुनिक युद्ध के लिए अत्यंत अधिक माना जाता है।
ईरान पर हमले की पहली लहर में अमेरिका ने एजीएम-154 ग्लाइड बम जैसे अत्याधुनिक हथियारों का इस्तेमाल किया। एक ऐसे बम की कीमत लगभग आठ लाख छत्तीस हजार डॉलर तक बतायी जाती है। अमेरिकी नौसेना ने लगभग बीस वर्ष पहले ऐसे करीब तीन हजार बम खरीदे थे और अब इनका उपयोग इस संघर्ष में किया जा रहा है।
इस बीच अमेरिकी संसद में भी युद्ध को लेकर चिंता बढ़ने लगी है। माना जा रहा है कि युद्ध जारी रखने के लिए सरकार को जल्द ही संसद से अतिरिक्त धन की मंजूरी लेनी पड़ सकती है। रिपोर्टों के अनुसार ट्रंप प्रशासन युद्ध के बढ़ते खर्च को देखते हुए लगभग पचास अरब डॉलर तक की अतिरिक्त राशि की मांग कर सकता है।
कुछ सांसदों ने चिंता जतायी है कि लगातार हथियारों के इस्तेमाल से अमेरिकी सैन्य भंडार तेजी से खाली हो सकते हैं, जबकि रक्षा उद्योग पहले से ही बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा है। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। पिछले सप्ताह राष्ट्रपति ट्रंप ने सात रक्षा ठेकेदार कंपनियों के प्रमुखों के साथ बैठक भी की थी ताकि हथियार और सैन्य सामग्री की आपूर्ति को फिर से मजबूत किया जा सके।
उधर, न्यू यार्क के सेनेटर चक शूमर ने भी सरकार से स्पष्ट जानकारी देने की मांग की है। उन्होंने कहा कि जब सैनिकों को खतरे वाले क्षेत्र में भेजा जाता है तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि ऐसा क्यों किया जा रहा है, लेकिन अभी तक लोगों को इसका स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है।
इसके अलावा, युद्ध के मानवीय परिणाम भी गंभीर होते जा रहे हैं। अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद अब तक लगभग दो हजार लोगों की मौत होने की खबर है। लगातार बढ़ते खर्च, हथियारों की खपत और मानवीय नुकसान को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो यह संघर्ष पूरे क्षेत्र को और अधिक अस्थिर कर सकता है।





