
Which Organs Can be Donated: चेन्नई में रहने वाली डॉ. निशा वरदराजन बतौर फिजिशियन 27 साल तक लोगों का इलाज करने की वजह से एक जानीमानी हस्ती हैं. लेकिन एक घटना ने उन्हें पूरे देश में विख्यात कर दिया. जब उन्होंने एक्सिडेंट में ब्रेथ डेड घोषित किए अपने पति अरविंद के अंगों को डोनेट करने का फैसला किया. यह डिसीजन लेना उनके लिए आसान नहीं था लेकिन पति की इच्छा और दूसरे जरूरतमंदों की जान बचाने के लिए उन्हें कलेजे पर पत्थर रखकर यह फैसला ले ही लिया. इस फैसले की वजह से कई लोगों को नई जिंदगी मिली, जो अब उनका आभार जताते हुए नहीं थक रहे हैं. वहीं खुद डॉ. निशा का जीने के प्रति नजरिया एकदम बदल गया है. ऐसे में आज हम सबको भी जानना चाहिए कि ये ब्रेन डेथ क्या होता है और ऐसी स्थिति में हमारे शरीर के कौन-कौन से अंग डोनेट किए जा सकते हैं.
ब्रेन डेथ क्या होती है?
मेडिकल भाषा में ब्रेन डेथ एक ऐसी स्थिति होती है. जिसमें ब्रेनस्टेम समेत मस्तिष्क की सारी गतिविधियां स्थाई रूप से खत्म हो जाती हैं. यह स्थिति किसी गंभीर चोट, स्ट्रोक या बीमारी की वजह से मस्तिष्क में रक्त और ऑक्सीजन की अचानक भारी कमी आने से बनती है. ऐसी स्थिति आने पर मस्तिष्क मर जाता है, लेकिन वेंटिलेटर की मदद से हृदय और फेफड़े काम करते सकते हैं.
अमेरिकन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी के अनुसार, ब्रेन डेथ अपरिवर्तनीय स्थिति है और यह कानूनी रूप से मौत मानी जाती है. ब्रेन डेथ वाले व्यक्ति का रिकवर होना असंभव होता है क्योंकि मस्तिष्क में कोई गतिविधि नहीं बचती है. ब्रेन डेथ घोषित किया गया कोई भी मरीज वापस ठीक नहीं हो सकता. जबकि कोमा जैसी अन्य बेहोशी की स्थितियों में सुधार संभव है.
ब्रेन डेथ बनाम कोमा में अंतर
ब्रेन डेथ और कोमा में मुख्य अंतर यह है कि कोमा में मस्तिष्क की कुछ गतिविधियां बनी रहती हैं. डॉक्टरों के मुताबिक, कोमा गहरी बेहोशी की वह स्थिति होती है. जिसमें मरीज स्वस्थ इंसान की तरह प्रतिक्रिया नहीं दे पाता. लेकिन उसका मस्तिष्क जीवित रहता है और रिकवरी की संभावना भी बनी रहती है. वह किसी भी दिन कोमा से निकलकर स्वस्थ जीवन में वापस आ सकता है या फिर वेजिटेटिव स्टेट में जा सकता है.
जबकि ब्रेन डेथ में मस्तिष्क पूरी तरह मृत होता है. उसमें सभी तरह की गतिविधियां मर चुकी होती हैं. उसकी पुतलियां कोई प्रतिक्रिया नहीं देती है और दर्द पर भी कोई रिस्पॉन्स नहीं आता है. ब्रेन डेथ नून की ओर से घोषित मौत है. जबकि कोमा जीवित रहने की स्थिति है. कोमा से रिकवरी कब होगी, यह समय पर निर्भर करता है. लेकिन ब्रेन डेथ अपरिवर्तनीय है और उसमें व्यक्ति कभी ठीक नहीं हो पाता.
ऑर्गन डोनेशन की प्रक्रिया क्या है?
ब्रेन डेथ के बाद ऑर्गन डोनेशन संभव होता है. इसकी वजह ये है कि बॉडी को वेंटिलेटर पर रखने से उसके कई ऑर्गन स्वस्थ रहते हैं. इस प्रक्रिया में सबसे पहले डॉक्टर ब्रेन डेथ की पुष्टि करते हैं. इसके बाद पीड़ित परिवार की सहमति या व्यक्ति की पूर्व इच्छा से ऑर्गन प्रोक्योरमेंट ऑर्गनाइजेशन (OPO) को सूचित किया जाता है. इसके बाद अस्पताल के डॉक्टर मृतक के शरीर की मेडिकल जांच करते हैं कि उसके ऑर्गन ट्रांसप्लांट के योग्य हैं या नहीं. अगर सब कुछ सही मिलता है तो फिर परिवार की सहमति मिलने पर, सर्जिकल टीम ऑपरेशन रूम में ऑर्गन निकालती है. इसके बाद पुलिस के सहयोग से ग्रीन कॉरिडोर बनाकर ऑर्गन को तुरंत प्राप्तकर्ताओं तक पहुंचाया जाता है. ऑर्गन डोनेशन की यह प्रक्रिया जीवन बचाने में बेहद महत्वपूर्ण है. लेकिन ध्यान रखने वाली बात ये है कि केवल ब्रेन डेथ के बाद ही इसे अंजाम दिया जा सकता है. उससे पहले ऐसा करना गैर-कानूनी है और इसके लिए कठोर सजा का इंतजाम है.
कौन से ऑर्गन डोनेट किए जा सकते हैं?
हमारे शरीर में कई जरूरी अंग ऐसे हैं, जो ब्रेन डेथ के बाद भी निष्क्रिय नहीं होते. लिहाजा उन्हें डोनेट किया जा सकता है. जैसे कि हमारा हृदय, फेफड़े, लीवर, किडनी, पैनक्रियास और आंतें. इसके अलावा कॉर्निया, त्वचा, हड्डियां और ब्लड वेसल्स भी डोनेट किए जा सकते हैं. एक ब्रेन डेड डोनर 8 लोगों की जान बचा सकता है. साथ ही 75 से अधिक को लाभ पहुंचा सकता है. यह ऑर्गन की स्थिति पर निर्भर करता है कि वह डोनेट किए जाने के योग्य है या नहीं.
ऑर्गन डोनेशन पर क्या कहता है भारत का कानून?
भारत में ऑर्गन डोनेशन को कानून और पूरी प्रक्रिया बनी हुई है. ट्रांसप्लांटेशन ऑफ ह्यूमन ऑर्गन्स ऐक्ट (THOA) 1994 ब्रेन डेथ को मौत के रूप में मान्यता देता है. यह एक्ट ऑर्गन डोनेशन के मामलों की निगरानी रखता है और उसके व्यावसायिक व्यापार पर रोक लगाता है. ब्रेन डेथ की पुष्टि के लिए मेडिकल बोर्ड की व्यवस्था की गई है, जिसमें चार विशेषज्ञ शामिल होते हैं. वर्ष 2011 में इस एक्ट में संशोधन ने नियमों को और सख्त किया गया. इसमें फॉर्म 10 का प्रावधान किया गया, जिससे ब्रेन डेथ प्रमाणित होती है. अंगदान की इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी नैशनल ऑर्गन एंड टिशू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (NOTTO) करता है. यह कानून जीवित डोनर से भी ऑर्गन लेने की अनुमति देता है, लेकिन केवल नजदीकी रिश्तेदारों से.
लोगों में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत
कुल मिलाकर कहें तो ब्रेन डेथ एक अपरिवर्तनीय स्थिति है, जिसे बदला नहीं जा सकता. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। वो जीवन रक्षा की संभावना को पूरी तरह खत्म कर देता है लेकिन ऐसी स्थिति ऑर्गन डोनेशन से दूसरों को नया जीवन जरूर दे जाती है. भारत का कानून इस प्रक्रिया को नैतिक और सुरक्षित बनाता है. इसके बावजूद इस बारे में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है.





