पैसे की महत्ता को समझाता है। कभी सोचा है कि जब भी पैसे की बात होती है, तो डॉलर को इतनी तवज्जो क्यों दी जाती है? हां दुनिया की सबसे मजबूत मुद्राओं के कारण। अमेरिकी डॉलर भैया डॉलर का इतना भौकाल है कि सब देश अपना फॉरेक्स रिजर्व्स डॉलर्स में क्यों मेंटेन करते हैं। ऐसा कब से शुरू हुआ, किसने लिया ये फैसला और हम सब यस-यस कहकर मानते चले गए। इन्हीं मुद्दों पर बात करेंगे।
आरक्षित मुद्रा केंद्रीय बैंक और प्रमुख फाइनेंसर संस्थानों फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस द्वारा अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए इस्तेमाल की जाने वाली मुद्रा की एक बड़ी राशि को कहते हैं। जैसे अपने देश का सेंट्रल बैंक आरबीआई फॉरेक्स रिजर्व्स ड़ॉलर्स में मेंटेन करता है। हम वैश्विक स्तर पर व्यापार करते वक्त डॉलर में ही भुगतान करते हैं। साथ ही पेमेंट भी डॉलर में ही ली जाती है। आरक्षित मुद्रा के अनेक फायदे भी होते रिजर्व करेंसी एक्सचेंज रेट के रिस्क को कम करती है। ऐसा इसलिए क्योंकि किसी देश को व्यापार करने के लिए अपनी करंसी मुद्रा को आरक्षित मुद्रा के साथ एक्सचेंज करने की आवश्यकता नहीं होती। केवल यही नहीं यही रिजर्व वैश्विक लेनदेन को सुविधाजनक बनाने में भी सहायक सिद्ध होता है। दुनिया भर में वस्तुओं की कीमत रिजर्व करेंसी में होती है मसलन डॉलर सो देशों को उसी करेंसी में रिजर्व मेंटेन करना पड़ता है ताकि इन वस्तुओं को खरीदने बेचने में। दूसरे देश इसीलिए अमेरिका की मौद्रिक नीति माने मॉनिटरी पॉलिसी की बारिकी से निगरानी करते हैं। ताकि सुनिश्चित कर सके क्योंकि फॉरेन रिजर्व्स आफ इन्फ्लेशन या बढ़ती कीमतों से प्रभावित ना हो।
जब करेंसी नहीं थी तब क्या होता था
आज से हजारों साल पहले करेंसी नहीं होती थी। उस टाइम पर लोग बाटर सिस्टम करते थे। मतलब किसी के पास अगर टमाटर है और उसे चावल की जरूरत है तो जिसके पास चावल हैं। उसको टमाटर देकर चावल ले लिया। इसी तरह अपनी जरूरत के हिसाब से लोग गुड्स एंड सर्विसेज को एक्सचेंज करते थे। लेकिन इस बाटर सिस्टम में छोटे मोटे लेन देन तो ठीक थे। लेकिन जब व्यापक स्तर पर लेन देन करना होता था तो दिक्कत आती थी। टमाटर, चावल जैसी चीजें कुछ वक्त बाद खराब हो जाती थी। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। ऐसे में बड़े ट्रेड करने में लोगों को दिक्कत आती थी। लेकिन कुछ टाइम बाद लोगों ने इसका भी तोड़ निकाला और ऐसी चीज में डील करना चालू किया जो खराब न हो। इसके बाद से ही सोना, चांदी, तांबा में व्यापार शुरू हुआ। लीडिया ने सोना, चांदी, तांबा सभी के सिक्के बना दिए ताकी आसानी से ट्रेड किया जा सके। लेकिन इसमें भी धीरे धीरे समस्या आने लगी। जैसे अगर लोग व्यापार करने के लिए निकलते थे और ज्यादा माल लेना होता था तो बदले में देने के लिए सिक्के ज्यादा मात्रा में ले जाना होता था और ये काफी भारी हो जाते थे। इन्हें चोरी से बचाकर रखना और ट्रांसपोर्ट करने में दिक्कत आती थी। इसका ये तरीका निकाला गया कि मान लीजिए अगर दिल्ली से मुंबई किसी को व्यापार करने जाना होता था। तो वो दिल्ली के किसी व्यापारी को ढूंढ़ लेते थे और कहते थे कि हमें इतना सारा सोना लेकर नहीं जाना है। आप अपने पास ये सोना रख लो। जब हम मुंबई पहुंच जाएंगे तो आप मुंबई में आपके जानने वाले व्यापारी हैं उन्हें वहां पर बोल देना कि हमें वहां पहुंचने पर इतने की मात्रा में सोना दे देगा। आपका जो इसमें बनेगा वो ले लेना। ऐसे में व्यापारी दिल्ली में सोना रखकर एक पेपर पर मुहर और साइन करके दे देता था। फिर पेपर लेकर मुंबई पहुंचने पर पेपर दिखाकर वहां के व्यापारी से सोना-चांदी जो भी है ले लो। रास्ते की धातु के सिक्के ले जाने की दिक्कत इससे खत्म हो गई। आज कल का आपने हवाला का काम सुना है वो भी इसी सिस्टम पर बेस्ड है। ये जो पेपर पर साइन औऱ स्टैंप लगकर मिलता है, इसी से करेंसी का मार्ग प्रशस्त होता है। आज भी आप 500 के नोट पर देखते हो मैं धारक को पांच सौ रुपए अदा करने का वचन देता हूं। ये वही तो है। लेकिन ये पूरी चीज अन आर्गनाइज्ड था और भरोसे पर ही चलता था। आगे चलकर इसे सिस्टम में डालने की दिशा में कदम बढ़ाए गए। साल 1154 में चीन में वेनयान लियांग ने चीन की अथॉरिटी के साथ मिलकर पूरे सिस्टम को आर्गनाइज किया। इसने इसी काम के लिए चीन के अंदर बैंक बना दिए। चीन के लोग बैंक के अंदर जाते थे और अपना सोना जमा करते थे, उसके बदले बैंक नोट ले आते थे।
डिमांड एंड सप्लाई
पूरी अर्थव्यवस्था ही डिमांड और सप्लाई चेन पर बेस्ड है जैसे किसी चीज की मांग बढ़े तो उसकी कीमत बढ़ जाती है । ठीक उसी तरह से करेंसी के मामले में भी यही होता है। अगर डॉलर की मांग बढ़ जाती है तो डॉलर की कीमत भी ऑटोमेटिक बढ़ ही जाती है। इसको भी उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए कि भारत के व्यापारियों को अमेरिका से बड़ी मात्रा में सामान खरीदने की जरूरत है। इसके लिए उन्हें डॉलर की आवश्यकता होगी। अगर डॉलर की सप्लाई लिमिटेड हो और भारत को डॉलर की ज्यादा जरूरत हो, डॉलर की जो कीमत है वह अपने आप ही बढ़ जाएगी। इससे डॉलर का मूल्य रुपए के मुकाबले भी बढ़ेगा और रुपया कमजोर हो जाएगा।
क्या था ब्रिटेन गुड्स एग्रीमेंट
आज से करीब 75 साल पहले साल था 1944। अमेरिका तब आज के चाइना की तरह मैन्युफैक्चरिंग पावर हाउस हुआ करता था। 1945 में दुनिया के 50% गुड्स अकेले यूएस में ही प्रोड्यूस होते थे। लेकिन और रिच बनने के लिए यूएस एक प्लान लाता है। जो बाद में ब्रिटेन गुड्स एग्रीमेंट बना। इसका कोर पर्पस यूएस के डॉलर को ग्लोबल करेंसी बनाने का था। इसमें अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों को प्रेशर किया कि वह अपनी करेंसी की वैल्यू यूएस डॉलर के साथ पैक कर दे। इन रिटर्न यूएस ने प्रॉमिस दिया कि यह कंट्रीज डॉलर को कभी भी गोल्ड में कन्वर्ट करवा सकती है एक फिक्स रेट पर। यानी यूएस के डॉलर की वैल्यू गोल्ड जितनी रहेगी। यानी रातोंरात यूएस का यह पेपर का टुकड़ा गोल्ड की वैल्यू का हो गया। इसके कुछ ही सालों में डॉलर की डिमांड स्काई रॉकेट हो गई। क्योंकि ऑलमोस्ट सारी कंट्रीज डॉलर में ट्रेड करने लगी। 1971 तक यूएस डॉलर को मैसिव स्केल पर प्रिंट करता गया। और तब तक मार्केट में इतने डॉलर्स आ चुके थे जितने का यूएस के पास सोना भी नहीं था। जिसका मतलब ब्रिटेन वुड एग्रीमेंट का पार्ट बनी एक कंट्रीज अपने डॉलर के रिजर्व को लेकर यूएस के पास पहुंच जाती है कि यूएस अपने प्रॉमिस किया था कि डॉलर को गोल्ड में कभी भी कन्वर्ट करवा सकते हैं तो हमें हमारे डॉलर्स के बदले गोल्ड दे दो। तो यूएस सपने में भी यह प्रॉमिस पूरा नहीं कर सकता था। तब यूएस के प्रेसिडेंट रिचर्ड निक्सन एक बड़ा कदम उठाते हैं। 15 अगस्त 1971 को यूएस डॉलर को गोल्ड में कन्वर्ट करवाने का सिस्टम ही खत्म कर देता है। लेकिन फिर भी डॉलर ग्लोबली इंपॉर्टेंट बना रहता है। अमेरिका की तरफ से दूसरे देशों को कम टैरिफ ऑफर की जाती थी। दुनिया भर में अपना कैपिटल इन्वेस्ट करता है। ये सब डॉलर के भौकाल को बनाए रखने के लिए किया जाता रहा।




