Rohtas SC-ST Case News : रोहतास में बच्चों के बीच मारपीट हुई थी। 7 दिसंबर 2025 को बच्चे की मां ने थाने में आवेदन दिया था। उसके आधार पर एफआईआर में 4 बच्चों समेत अन्य लोगों को आरोपी बनाया गया

Bihar Child SC-ST Case News : जब खेल के मैदान में बच्चे आपस में भिड़ते हैं तो अक्सर बड़े उन्हें समझा-बुझाकर अलग कर देते हैं। मगर, बिहार के रोहतास जिले के नौहट्टा थाना क्षेत्र में बच्चों का मामूली विवाद एक ऐसी कानूनी उलझन बन गया, जिसने न्याय व्यवस्था को भी हैरान कर दिया है। यहां महज 9 साल के एक मासूम बच्चे पर एससी-एसटी (SC-ST) एक्ट जैसी गंभीर धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है।
घटना की शुरुआत 7 दिसंबर 2025 को हुई थी। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। बताया जा रहा है कि बच्चों के बीच खेलने के दौरान कहासुनी और मारपीट हुई थी। इस विवाद के बाद एक पक्ष की मां ने थाने में आवेदन दिया। पुलिस ने बिना उम्र की पड़ताल किए, आवेदन के आधार पर चार बच्चों समेत अन्य लोगों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर ली। इस एफआईआर में मारपीट के साथ-साथ जातिसूचक गाली-गलौज के आरोप लगाते हुए एससी-एसटी एक्ट की धाराएं भी जोड़ दी गईं।
किशोर न्याय बोर्ड की तल्ख टिप्पणी
मामला तब सुर्खियों में आया, जब 19 फरवरी को यह 9 वर्षीय बच्चा किशोर न्याय परिषद (JJB) के समक्ष पेश हुआ। बच्चे की मासूमियत और उसकी छोटी सी उम्र ( 9-10 वर्ष) देखकर बोर्ड के मजिस्ट्रेट अमित कुमार पांडेय और सदस्य तेज बली सिंह दंग रह गए। बोर्ड ने जब एफआईआर की समीक्षा की तो पुलिसिया लापरवाही की कलई खुल गई। प्राथमिकी में कई महत्वपूर्ण कॉलम खाली थे और आरोपियों की उम्र का कहीं कोई जिक्र नहीं था। बोर्ड ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए बच्चे को उसके अभिभावकों के सुपुर्द कर दिया।
थानाध्यक्ष से 24 घंटे में मांगा जवाब
किशोर न्याय परिषद ने इसे गंभीर चूक मानते हुए नौहट्टा थानाध्यक्ष को 24 घंटे के भीतर स्पष्टीकरण देने का अल्टीमेटम दिया है। बोर्ड ने साफ कहा कि नाबालिगों से जुड़े मामलों में उम्र दर्ज करना अनिवार्य है। दूसरी ओर थानाध्यक्ष दिवाकर कुमार का कहना है कि उन्होंने वरीय अधिकारियों के निर्देशानुसार त्वरित कार्रवाई के तहत आवेदन मिलते ही केस दर्ज किया था।
कानून का दुरुपयोग या संवेदनशीलता का अभाव?
विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी कम उम्र के बच्चे पर ऐसी गंभीर धाराएं लगाना कानून के मूल उद्देश्य के खिलाफ है। भारतीय कानून के अनुसार 7 से 12 वर्ष के बच्चों के मामलों में उनकी मानसिक समझ को परखना जरूरी होता है। इस घटना ने एक बार फिर बहस छेड़ दी है कि क्या पुलिस केवल टारगेट पूरा करने के लिए बिना सोचे-समझे गंभीर धाराओं का प्रयोग कर रही है? फिलहाल सबकी नजरें थानाध्यक्ष के जवाब पर टिकी हैं।



