
शादी के बाद पहली होली अपने पति के साथ खेलना रोमांचक अनुभव होता है, लेकिन दूसरी तरफ नवविवाहिता को होली पर ससुराल में रहने की मनाही होती है. दरअसल, नई दुल्हनों को होलिका दहन देखना निषिद्ध होता है. इसलिए नवविवाहिताएं पहली होली पर मायके जाती हैं और फिर वहीं अपने पति और बाकी परिजनों के साथ होली खेलती हैं.
नई दुल्हन ससुराल में पहली होली क्यों नहीं मनातीं?
शास्त्रों में नव विवाहित दुल्हन को फाल्गुन पूर्णिमा की रात होने वाला होलिका दहन देखना वर्जित बताया गया है. इसके पीछे जो वजहें बताई जाती हैं, उनके अनुसार राजा हिरण्यकश्यप की बहन होलिका की कुछ दिन पहले ही शादी हुई थी और जब वो अपने भतीजे भक्त प्रहलाद को लेकर उसे मारने के लिए चिता में बैठी तो जल गई. जबकि उसे मिला वरदान मिला था कि उसे अग्नि भी नहीं जला पाएगी. इसलिए नवविवाहिताओं के लिए होलिका दहन देखना अशुभ माना जाता है.
दूसरा कारण यह भी है होलिका दहन को होलिका की चिता कहा जाता है. ऐसे में शादी के मांगलिक आयोजन के बाद ससुराल में रहकर होलिका की चिता जलती देखना अशुभ माना जाता है. इसलिए कहा जाता है कि लड़कियां शादी के बाद पहली होली ससुराल में ही मनाएं तो अच्छा होता है. वैसे तो यह भी कहा जाता है कि मायका हो या ससुराल नवविवाहिताओं को शादी के बाद पहला होलिका दहन देखने से बचना चाहिए.
होली की कहानी
होलिका दहन भगवान विष्णु के परम भक्त बालक प्रहलाद को मारने के लिए किया गया था. होलिका दहन से पहले 8 दिन तक प्रहलाद को मारने के लिए उसके पिता असुरराज हिरण्यकश्यप ने कई तरीके अपनाए थे, लेकिन वे सब नाकाम रहे. भगवान विष्णु की कृपा से हर बार प्रहलाद बच गए. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। फिर हिरण्यकश्यप की बहन होलिका ने कहा कि मैं प्रहलाद को लेकर जलती चिता में बैठ जाती हूं, लेकिन होलिका जलकर मर गई और प्रहलाद फिर बच गए. इसके बाद स्वयं भगवान विष्णु ने नरसिंह रूप में अवतार लिया और हिरण्यकश्यप को मारा.




