बांग्लादेश में इन दिनों हवाओं का रुख बदला हुआ है। सड़कों पर ‘Gen Z’ का शोर है, तो सत्ता के गलियारों में पुराने चेहरों की वापसी की जद्दोजहद। भारत के लिए यह सिर्फ एक पड़ोसी देश का चुनाव नहीं है, बल्कि हमारी सुरक्षा और कूटनीति से जुड़ा एक बड़ा इम्तिहान है। ज्यादातार लोग पूछ रहे हैं कि क्या शेख हसीना के बिना बांग्लादेश पहले जैसा रहेगा? क्या बॉर्डर पर हालात बिगड़ेंगे?तो आपके लिए हमने इन सभी सवालों के जवाब इस आर्टिकल में दिए हैं, आइए इन सभी सवालों के जवाब आसान भाषा में समझते हैं।
प्रश्न: क्या इस चुनाव के बाद भारत में घुसपैठ (Infiltration) का खतरा बढ़ जाएगा?
देखिए, जब भी किसी पड़ोसी देश में राजनीतिक अस्थिरता (instability) आती है, तो उसका सीधा असर सरहद पर दिखता है। अगर बांग्लादेश में चुनावों के दौरान या बाद में हिंसा बढ़ती है, तो सीमा पर दबाव बढ़ना लाजिमी है। भारत इस मामले में बेहद सतर्क है; न केवल बॉर्डर पर चौकसी बढ़ाई गई है, बल्कि अपनी डिप्लोमैटिक फैमिलीज़ को भी एहतियातन वापस बुला लिया गया है। फिलहाल, हमारी सुरक्षा एजेंसियां हर मूवमेंट पर पैनी नज़र रखे हुए हैं ताकि घुसपैठ की किसी भी कोशिश को नाकाम किया जा सके।
प्रश्न: इस बार के चुनाव में शेख हसीना और उनकी पार्टी ‘अवामी लीग’ गायब क्यों हैं?
यह इस चुनाव का सबसे बड़ा ‘ट्विस्ट’ है। 2024 के भारी विद्रोह और तख्तापलट के बाद शेख हसीना फिलहाल भारत में शरण लिए हुए हैं। बांग्लादेश की नई कानूनी व्यवस्था ने उन पर ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ (crimes against humanity) के गंभीर आरोप लगाए हैं और उनकी पार्टी ‘अवामी लीग’ को फिलहाल बैन कर दिया गया है। ऐसे में मैदान अब BNP (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) और जमात-ए-इस्लामी के लिए खुला है। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। यानी इस बार मुकाबला पूरी तरह बदल चुका है।
प्रश्न: भारत के ‘चिकन नेक’ (Siliguri Corridor) को लेकर एक्सपर्ट्स इतने परेशान क्यों हैं?
भारत का नक्शा देखें तो सिलीगुड़ी कॉरिडोर (जिसे चिकन नेक कहते हैं) वह पतला सा रास्ता है जो पूरे नॉर्थ-ईस्ट को बाकी भारत से जोड़ता है। अगर बांग्लादेश में कोई ऐसी सरकार आती है जो भारत-विरोधी हो, तो वहां चीन और पाकिस्तान का दखल बढ़ सकता है। यह स्थिति भारत की संप्रभुता के लिए एक बड़ा ‘रेड फ्लैग’ है। अगर पड़ोस में हमारे दुश्मनों को पनाह मिली, तो इस पतले गलियारे की सुरक्षा संभालना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।
प्रश्न: क्या कट्टरपंथी झुकाव वाली ‘जमात-ए-इस्लामी’ भारत से दोस्ती का हाथ बढ़ा रही है?
यह काफी दिलचस्प मोड़ है। जमात-ए-इस्लामी के चीफ शफीकुर रहमान आजकल बराबरी और सम्मान वाले रिश्तों की बात कर रहे हैं। सुनने में तो यह अच्छा लगता है, लेकिन भारत के लिए भरोसा करना इतना आसान नहीं है। जमात का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से उनकी नज़दीकियां जगजाहिर हैं। कूटनीति में शब्दों से ज़्यादा इरादे मायने रखते हैं, और भारत फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ (इंतज़ार करो और देखो) की स्थिति में है।
प्रश्न: यह ‘July Charter’ क्या बला है और इसमें युवाओं (Gen Z) का क्या रोल है?
इस बार के चुनावों को ‘Gen Z-inspired’ रिवोल्यूशन कहा जा रहा है। देश के लगभग 44% वोटर्स 18 से 37 साल के बीच हैं, और यही युवा तय करेंगे कि नया बांग्लादेश कैसा होगा। रही बात ‘July Charter’ की, तो यह एक तरह का जनमत संग्रह (Referendum) है। इसके ज़रिए देश के संविधान में बड़े बदलावों की तैयारी है, ताकि भविष्य में फिर कभी वैसी तानाशाही न लौटे जैसी पिछली सरकार पर आरोप लगे थे।
कुल मिलाकर, बांग्लादेश इस समय एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है। यह चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का जरिया नहीं है, बल्कि इस बात का फैसला है कि आने वाले दशकों में दक्षिण एशिया की राजनीति किस दिशा में मुड़ेगी। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अपनी सुरक्षा और ‘चिकन नेक’ की संप्रभुता से समझौता किए बिना बांग्लादेश की नई लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाए। चाहे ‘Gen Z’ का जोश हो या जमात-ए-इस्लामी के बदलते सुर, दिल्ली की नजरें ढाका के हर छोटे-बड़े घटनाक्रम पर टिकी हैं। अब देखना यह है कि क्या यह नया बदलाव दोनों देशों के रिश्तों में स्थिरता लाएगा या कूटनीति की एक नई बिसात बिछाएगा।



