आज के दौर में कुछ सेकंड की रील देखने की आदत कब घंटों के स्क्रीन टाइम में बदल जाती है, पता ही नहीं चलता. इसका असर सिर्फ हमारी नींद, आंखों और मानसिक सेहत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आदत हमारी आर्थिक सेहत को भी नुकसान पहुंचा रही है. रील्स में दिखने वाली चमकदार लाइफस्टाइल, फर्जी निवेश सलाह और गैरजरूरी खरीदारी लोगों को आर्थिक नुकसान की तरफ धकेल सकती है. वहीं, काम के दौरान लगातार रील्स देखने से समय और प्रोडक्टिविटी का नुकसान भी होता है.

यानी 1530 सेकंड की ये रील्स सिर्फ आपका समय नहीं खा रहीं, बल्कि आपकी हेल्थ और इकोनॉमी दोनों पर असर डाल रही हैं. आखिर रील्स कैसे बन रही हैं इस नुकसान की वजह, समझिए पूरी कहानी.

रील्स क्या है और कैसे शुरुआत हुई?

रील्स वर्टिकल वीडियो का एक शॉर्ट फॉर्मेट है. इसकी शुरुआत का क्रेडिट मुख्य रूप से टिकटॉक को दिया जाता है. यह एक चीनी ऐप है, जिसे 2017 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में लॉन्च किया गया था. भारत में यह ऐप साल 2018 के दौरान बेहद लोकप्रिय हुआ था. देखते ही देखते हजारों क्रिएटर इस ऐप का इस्तेमाल करने लगे. इन्हें देखने वाले लोगों की संख्या भी लाखों तक पहुंच गई. इसी लोकप्रियता को देखते हुए मेटा ने इंस्टाग्राम के लिए 2020 में इसे भारत सहित दुनियाभर में आधिकारिक तौर पर लॉन्च किया गया. टिकटॉक की लोकप्रियता और उसके बाद भारत में प्रतिबंध लगने के बाद मेटा ने इसे तेजी से आगे बढ़ाया. बाद में फेसबुक, यूट्यूब समेत कई प्लेटफॉर्म्स पर रील्स का फीचर दिया जाने लगा और करोड़ों लोग इन्हें देखने लगे.

लोगों को क्यों लग जाती है रील्स की लत?

रील्स की लत सिर्फ मनोरंजन की आदत नहीं है, बल्कि इसके पीछे दिमाग का रिवार्ड सिस्टम और हमारी रोजमर्रा की आदतें भी काम करती हैं. रील्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि यूजर लगातार अगली वीडियो देखने के लिए प्रेरित होता रहे. जब कोई मजेदार, चौंकाने वाली या पसंदीदा रील सामने आती है, तो दिमाग के रिवार्ड सिस्टम में डोपामिन से जुड़ी एक्टिविटी बढ़ती है. इससे हमें अच्छा महसूस होता है और हम उसी अनुभव को दोबारा पाने के लिए अगली रील देखने लगते हैं.

खास बात यह है कि अगली रील कैसी होगी, इसका पता नहीं होता. यह अनिश्चितता भी बारबार स्क्रॉल करने की आदत को मजबूत कर सकती है. रील्स का कम टाइम इसमें बड़ी भूमिका निभाता है. कुछ सेकंड में नया कंटेंट और मनोरंजन मिलने से दिमाग को लगातार नए स्टिमुलस मिलते रहते हैं. एक रील खत्म होते ही दूसरी अपने आप सामने आ जाती है, इसलिए रुकने का स्वाभाविक मौका भी कम मिलता है.

अब समझते हैं कि ये 1530 सेकेंड की रील्स हमारी सेहत के साथसाथ आर्थिक सेहत को कैसे नुकसान पहुंचा रही हैं?

1. वर्कफोर्स पर प्रोडक्टिविटी का नुकसान

लगातार छोटे वीडियो देखने से दिमाग में डोपामाइन रीलीज होता है. इससे किसी भी काम पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो जाती है. समस्या सुलझाने की क्षमता घटने लगती है. दफ्तरों में काम के दौरान कर्मचारियों का लगातार ध्यान भटकना कंपनियों के आउटपुट को कम करता है. कंसल्टिंग फर्म Redseer की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय यूजर्स अपने स्मार्टफोन टाइम का करीब पांचवां हिस्सा शॉर्टफॉर्म वीडियो पर खर्च करते हैं. रिपोर्ट में 64% यूजर्स ने माना कि उनका शॉर्ट वीडियो कन्जप्शन बढ़ा है. यानी रील्स पर जाने वाला समय सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि काम के बीच मिलने वाले ब्रेक में भी इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। ऐसे में अगर कर्मचारी काम के दौरान बारबार रील्स देखने लगें, तो इससे प्रोडक्टिव टाइम प्रभावित होने की आशंका बढ़ सकती है.

2. इम्पल्स बाइंग और अनप्लांड कर्ज

एल्गोरिदम यूजर्स को ऐसे वीडियो दिखाता है जो तुरंत खरीदारी की इच्छा जगाते हैं. इसके कारण युवा बिना सोचेसमझे गैरजरूरी सामान खरीदते हैं. इसे इम्पल्स बाइंग कहते हैं. नतीजा यह होता है कि बचत दर घटती है और लोग पर्सनल लोन या क्रेडिट कार्ड के कर्ज में फंसते हैं. रिपोर्ट के अनुसार देश फाइनेंशियल सेविंग 7 से 8 फीसदी के पीक से नीचे आते हुए 5 फीसदी के आसपास आ गई है. जोकि कि बड़ा चिंता का विषय है. अगर बात कर्ज ही की करें तो देश में पर्सनल लोन की ग्रोथ सालाना आधार पर 16 फीसदी तक बढ़ रही है.

3. युवा वर्कफोर्स और स्किल गैप

किसी भी देश की आर्थिक प्रगति उसके युवाओं के स्किल पर निर्भर करती है. रील्स की लत युवाओं के उस बहुमूल्य समय को छीन रही है जो नई स्किल सीखने, पढ़ाई करने या रचनात्मक काम में लग सकता था. Metacommissioned IPSOS study के मुताबिक, Gen Z के लिए शॉर्टफॉर्म वीडियो का सबसे लोकप्रिय और साझा प्लेटफॉर्म बन गया है. 89% Gen Z यूजर्स रोजाना Reels देखते हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार देश का जेन जी रोज 2 घंटे से ज्यादा रील्स कंज्यूम करता है. इस दौरान यही युवा वर्कफोर्स अपने स्किल को डेवलप करने में लगा सकता है. जिससे देश और खुद की इकोनॉमी को सुधार हो सकता है.

4. मेंटल हेल्थ पर करीब 2 लाख करोड़ रुपए खर्च

घंटों ‘डूमस्क्रॉलिंग’ करने से नींद की कमी, एंग्जाइटी, डिप्रेशन और मानसिक थकावट बढ़ती है. इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार खराब मानसिक स्वास्थ्य के कारण वर्कप्लेस एब्सेंटिज़्म बढ़ती है, जिससे इकोनॉमी को अरबों डॉलर का प्रत्यक्ष नुकसान होता है. मौजूदा समय में देश में मेंटल हेल्थ को लेकर कुल हेल्थ बजट का 1 फीसदी है. जबकि देश के मेंटल हेल्थ का मार्केट करीब 2 लाख करोड़ रुपए का है, जोकि करीब 10 साल में 3 लाख करोड़ रुपए के आंकड़े को पार कर सकता है. लेकिन इस मेंटल हेल्थ बदौलत देश की इकोनॉमी को इससे कहीं ज्यादा का नुकसान हो रहा है.

5. प्रोफेशनल क्लिपिंग का कारोबार 1,000 करोड़

जैसेजैसे पॉडकास्ट, लाइवस्ट्रीम और लंबे वीडियो कंटेंट बढ़ रहे हैं, क्रिएटर्स को ऐसे एक्सपर्ट्स की जरूरत बढ़ती जा रही है, जो कंटेंट को कई फॉर्मैट में बदल सकें और अलगअलग प्लेटफॉर्म पर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकें. मार्केटिंग एजेंसी ‘सोशल पिल’ के कोफाउंडर और डिजिटल मीडिया हेड नीलेश पेडनेकर का अनुमान है कि अगले तीन से पांच सालों में प्रोफेशनल क्लिपिंग का कारोबार 1,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा का इकोसिस्टम बन सकता है.

6. रील्स से गलत फैसले

सोशल मीडिया रील्स पर शेयर बाजार, क्रिप्टोकरेंसी, म्यूचुअल फंड और नए बिजनेस से जुड़ी आधीअधूरी और भ्रामक जानकारियां तेजी से फैल रही हैं. मात्र 30 से 60 सेकंड के इन छोटे वीडियो में जटिल वित्तीय बाजारों को बेहद आसान और शतप्रतिशत फायदेमंद दिखाकर पेश किया जाता है. रील्स बनाने वाले कई ‘फिनफ्लुएंसर्स’ के पास न तो कोई आधिकारिक डिग्री होती है और न ही वे सेबी जैसी सरकारी संस्थाओं से रजिस्टर्ड होते हैं. वे केवल व्यूज, लाइक्स और स्पॉन्सरशिप से पैसा कमाने के लिए बिना किसी ठोस रिसर्च के निवेश की सलाह देने लगते हैं. ऐसे सलाह की वजह से लोग गलत निवेश कर बैठते हैं, जिससे सीधे आर्थिक नुकसान होने की संभावना बढ़ जाती है.

कैसे पा सकते हैं रील्स देखने की आदत पर काबू?

1. समय निर्धारित करें: रील्स देखने के लिए रोजाना एक तय समय रखें. शुरुआत में 1520 मिनट की लिमिट लगाएं और कोशिश करें कि इससे ज्यादा समय न दें.

2. नोटिफिकेशन बंद करें: सोशल मीडिया के नोटिफिकेशन बारबार आपका ध्यान भटकाते हैं. इन्हें बंद करने से बिना जरूरत ऐप खोलने और रील्स देखने की आदत कम होगी.

3. अच्छी आदतों पर ध्यान दें: खाली समय में रील्स देखने की बजाय किताब पढ़ें, वॉक पर जाएं, पेंटिंग करें या म्यूजिक सुनें. इससे धीरेधीरे रील्स की आदत कम करने में मदद मिलेगी.

4. डिजिटल डिटॉक्स करें: हफ्ते में एक दिन सोशल मीडिया से दूरी बनाएं. इस दौरान मोबाइल की जगह परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताएं या बाहर घूमने जाएं.

5. खुद से सवाल करें: जब भी रील्स देखने लगें, खुद से पूछें कि क्या यह समय आपके लिए उपयोगी है? रील्स में बिताए समय को पढ़ाई, काम या किसी जरूरी एक्टिविटी में लगाया जा सकता है.

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