दो पीढ़ी पहले भारत में अच्छी और सुरक्षित नौकरी का मतलब सरकारी नौकरी और तय पेंशन माना जाता था. अगली पीढ़ी के लिए यह सोच बदली और निजी कंपनियों की नौकरी और हर महीने मिलने वाली सैलरी रोजगार की पहचान बन गई. लेकिन आज तस्वीर एक बार फिर बदल रही है. अब नौकरी की सुरक्षा सिर्फ कंपनी या पेंशन से नहीं, बल्कि व्यक्ति के पास मौजूद स्किल और आगे मिलने वाले अवसरों से तय होने लगी है. यानी तीन पीढ़ियों में एक ही सवाल का जवाब तीन बार बदल चुका है कि नौकरी आखिर हमें क्या गारंटी देती है?

ET की रिपोर्ट के मुताबिक, आजादी के बाद से भारत का जॉब मार्केट करीब पांच बड़े दौर से गुजर चुका है. हर दौर में सिर्फ यह नहीं बदला कि किस सेक्टर में ज्यादा रोजगार था, बल्कि यह भी बदला कि नौकरी करने वाले व्यक्ति को उससे क्या मिल रहा था.
1980 तक नौकरी मतलब सुरक्षा
1947 से लेकर 1980 के दशक के आखिर तक भारत में सरकारी नौकरी और खेती रोजगार के सबसे बड़े आधार थे. उस समय नौकरी का मतलब अक्सर एक ही संस्थान के साथ लंबे समय तक काम करना और भविष्य की सुरक्षा माना जाता था. खेती भी करोड़ों लोगों की रोजीरोटी का मुख्य साधन थी. RBI KLEMS के आंकड़ों के मुताबिक, 198384 में भारत के करीब 70 फीसदी कामगार खेती से जुड़े हुए थे. यानी उस समय ज्यादातर लोगों की रोजीरोटी जमीन और खेती पर निर्भर थी. यह रोजगार बाजार से ज्यादा मानसून और परिवार की जमीन पर निर्भर करता था. इसके अलावा सरकारी नौकरी इस व्यवस्था का दूसरा मजबूत आधार थी. सरकार ने रोजगार और तकनीकी प्रशिक्षण के लिए कई योजनाएं शुरू कीं. हालांकि नौकरी की सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा एक जैसी चीजें नहीं थीं.
जब नौकरी का बाजार खुलने लगा
भारत के रोजगार बाजार में सबसे बड़ा बदलाव 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद आया. LPG मॉडल ने भारतीय अर्थव्यवस्था को दुनिया के लिए ज्यादा खोल दिया. इस सुधार ने भारत में IT सेक्टर के तेजी से बढ़ने का रास्ता बनाया. 1991 के बाद IT सेक्टर ने भारतीय रोजगार बाजार को पूरी तरह बदलने में बड़ी भूमिका निभाई. बेंगलुरु जैसे शहरों के टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल्स अब दुनिया के बड़े टेक हब्स के साथ मुकाबला करने लगे. मौजूदा समय में भारत का टेक्नोलॉजी सेक्टर अब 58 लाख से ज्यादा प्रोफेशनल्स को रोजगार देता है. IT बूम ने सिर्फ नौकरियों की संख्या नहीं बढ़ाई, बल्कि काम करने का तरीका भी बदला. पहले जहां करियर को एक तय रास्ते के रूप में देखा जाता था, वहीं अब लगातार नई स्किल सीखना जरूरी हो गया. नौकरी के पद से ज्यादा यह मायने रखने लगा कि कर्मचारी के पास कौनसी स्किल है.
लेकिन स्किल की कमी बनी बड़ी चुनौती
रोजगार बाजार में बदलाव के बावजूद हर व्यक्ति को इसका बराबर फायदा नहीं मिला. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। 2005 में भारत में करीब 10.5 करोड़ ऐसे कामगार थे, जिन्हें नौकरी तो मिली हुई थी, लेकिन उनकी कमाई सामान्य गरीबी रेखा के स्तर तक भी नहीं पहुंचती थी. इसके अलावा भारत में स्किल गैप भी बड़ी समस्या बना हुआ है. इंस्टीट्यूट फॉर कॉम्पिटिटिवनेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश के करीब 88 फीसदी वर्कफोर्स कमकौशल वाले कामों में लगा है. वहीं हाईस्किल वाली नौकरियां कुल रोजगार अवसरों का सिर्फ 1012 फीसदी हिस्सा हैं. युवा ग्रेजुएट्स में बेरोजगारी दर 29.1 फीसदी थी. इसके मुकाबले उन युवाओं में बेरोजगारी दर 3.4 फीसदी थी, जो पढ़ेलिखे नहीं थे. इससे साफ होता है कि सिर्फ डिग्री होना नौकरी की गारंटी नहीं है.
अब आया AI का दौर
अब भारत का रोजगार बाजार AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में प्रवेश कर चुका है. Google, Amazon और Walmart जैसी कंपनियों में हायरिंग का अनुभव रखने वाले WapHire के संस्थापक आकाश कुमार के मुताबिक, AI की वजह से कई नौकरियां प्रभावित हुई हैं और कुछ नौकरियां शायद वापस भी न आएं. उनका मानना है कि आने वाले समय में ज्यादा लोग Gig Work, Freelancing और छोटीछोटी विशेषज्ञता पर आधारित बिजनेस की तरफ जा सकते हैं. हालांकि हर नौकरी पर AI का असर एक जैसा नहीं होगा. कुछ ऐसे काम हैं जिनमें इंसानी मौजूदगी जरूरी रहेगी. ड्राइविंग, सिक्योरिटी, घरेलू काम, फैक्ट्री और दूसरे श्रम आधारित काम लंबे समय तक बने रह सकते हैं. EY की रिसर्च इससे थोड़ा अलग तस्वीर दिखाती है. 10 हजार से ज्यादा कामों और टास्क के अध्ययन में पाया गया कि AI कई नौकरियों को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उन्हें अलगअलग टास्क में बांट रहा है. यानी भविष्य में एक ही नौकरी में कुछ काम इंसान करेंगे और कुछ काम AI करेगा.
सबसे ज्यादा फायदा हाईस्किल कर्मचारियों को
AI के दौर में सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को मिल सकता है, जो लगातार नई स्किल सीख रहे हैं. EY Future of Pay 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, AI, मशीन लर्निंग, साइबर सिक्योरिटी और क्लाउड जैसी स्किल्स के लिए मिलने वाला वेतन प्रीमियम 3040 फीसदी तक बढ़ा है. करीब आधी भारतीय कंपनियां अब स्किल के आधार पर सैलरी तय करने की तरफ बढ़ रही हैं. इसका मतलब साफ है कि आने वाले समय में सिर्फ डिग्री या अनुभव नहीं, बल्कि आपकी स्किल आपकी कमाई तय करने में बड़ी भूमिका निभा सकती है.
2047 तक कैसी होगी नौकरी?
भारत जब 2047 तक विकसित भारत बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, तब रोजगार बाजार में Formalisation यानी ज्यादा व्यवस्थित और औपचारिक रोजगार की जरूरत भी बढ़ेगी. सरकार के अनुमान के मुताबिक, सिर्फ ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर यानी GCC सेक्टर में 2030 तक करीब 28 लाख प्रोफेशनल्स को रोजगार मिल सकता है. इसके अलावा मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर, रिन्यूएबल एनर्जी और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टर भी तेजी से रोजगार पैदा कर सकते हैं. भारत का जॉब मार्केट अब पहले जैसा नहीं रहा. कभी रोजगार एक्सचेंज के जरिए नौकरी तलाशने का दौर था, फिर सरकारी और निजी कंपनियों की स्थायी नौकरियां आईं. इसके बाद IT और ग्लोबल कंपनियों ने स्किल आधारित करियर को बढ़ावा दिया. अब AI, Freelancing और Gig Economy रोजगार की नई तस्वीर बना रहे हैं. यानी आने वाली पीढ़ी के लिए नौकरी की सबसे बड़ी गारंटी शायद नौकरी खुद नहीं, बल्कि लगातार सीखने और अपनी स्किल को अपडेट करने की क्षमता होगी.



