बिहार विधानमंडल में पेश की गई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की वित्त वर्ष 202425 की रिपोर्ट ने राज्य के प्रशासनिक और वित्तीय तंत्र में हड़कंप मचा दिया है. रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के विभिन्न सरकारी विभागों ने वर्षों से खर्च किए गए 92,132.75 करोड़ रुपए की भारीभरकम राशि के 62,632 उपयोगिता प्रमाणपत्र महालेखाकार कार्यालय में जमा नहीं कराए हैं.

सरकारी खजाने की इतनी बड़ी धनराशि का हिसाब पेंडिंग होना वित्तीय अनुशासनहीनता और संभावित गड़बड़ियों पर गंभीर सवाल खड़े करता है. रिपोर्ट में 5 विभागों का प्रमुखता से जिक्र किया गया है कि, जिनके सबसे ज्यादा रकम के यूसी पेंडिंग हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। उनमें स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, शहरी विकास, शिक्षा और पंचायती राज शामिल है. आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट क्या होता है, सीएजी रिपोर्ट में क्याक्या खुलासे हुए हैं और इसका राज्य की व्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा.

क्या होता है उपयोगिता प्रमाणपत्र?

जब भी सरकार किसी विकास कार्य, योजना या संस्थान को बजट से वित्तीय सहायता या फंड आवंटित करती है, तो संबंधित विभाग या एजेंसी का यह कानूनी और प्रशासनिक कर्तव्य होता है कि वह तय समय सीमा के भीतर यह प्रमाणपत्र प्रस्तुत करे. यह सर्टिफिकेट साबित करता है कि स्वीकृत धनराशि का उपयोग उसी काम के लिए किया गया है, जिसके लिए बजट जारी किया गया था. विभाग द्वारा खर्च का पूरा ब्योरा देने के बाद ही महालेखाकार कार्यालय द्वारा उस आवंटन को पूर्ण माना जाता है. बिना पिछले खर्च का यूसी जमा किए अगला फंड जारी नहीं किया जाना चाहिए.

कैग की रिपोर्ट में बड़े खुलासे

गुरुवार को राज्य विधानसभा में पेश की गई CAG रिपोर्ट में “फाइनेंशियल रिपोर्टिंग प्रैक्टिसेज” शीर्षक के तहत कहा गया कि 31 मार्च, 2025 तक प्रधान महालेखाकार , बिहार को 92,132.75 करोड़ रुपए के 62,632 बकाया उपयोगिता प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं हुए थे. इस दौरान सबसे ज्यादा रकम के UC वाले पांच विभाग स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, शहरी विकास, शिक्षा और पंचायती राज हैं.

रिपोर्ट में कहा गया कि UC जमा न करने से इनके गलत इस्तेमाल का जोखिम रहता है, इसलिए राज्य सरकार को इस पहलू पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए और UC समय पर जमा करने के लिए संबंधित लोगों को जवाबदेह ठहराना चाहिए. साथ ही यह भी कहा गया कि यह मामला बिहार सरकार के वित्त विभाग के सामने उठाया गया था, लेकिन जनवरी 2026 से जवाब का इंतज़ार है.

बजट खर्च और सरेंडर की राशि

“बजट प्रबंधन” सेक्शन के तहत रिपोर्ट में कहा गया है कि फाइनेंशियल ईयर 202425 के दौरान, राज्य के कुल बजट में से केवल 2,87,178.49 करोड़ रुपए ही खर्च हुआ, जिससे 77,340.38 करोड़ रुपए की बचत हुई. कुल बचत में से 10,388.35 करोड़ रुपए की राशि सरेंडर कर दी गई, और आगे कहा गया कि इससे अवास्तविक अनुमानों और बजट व खर्च के बीच तालमेल की कमी का पता चलता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि सप्लीमेंट्री बजट के जरिए बजट अनुमान में 28.81 फीसदी की बढ़ोतरी की गई थी, लेकिन फाइनेंशियल ईयर 202425 में खर्च मूल बजट से केवल 1.48 फीसदी ज्यादा रहा.

आखिरी समय में काफी खर्च

इसमें आगे कहा गया है कि सबसे ज्यादा खर्च फाइनेंशियल ईयर की आखिरी तिमाही में हुआ, जिससे पता चलता है कि आखिर में खर्च करने की जल्दबाजी की गई और तय सीमा का उल्लंघन हुआ. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 202425 के दौरान, राज्य सरकार ने केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए जरूरी केंद्रीय हिस्से से 441.29 करोड़ रुपए कम ट्रांसफर किए. इसके अलावा, राज्य के खजाने से संबंधित SNA को केंद्रीय और राज्य का हिस्सा ट्रांसफर करने में क्रमशः 167 दिन और 246 दिन की देरी हुई, जिससे राज्य के खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा.

मनरेगा लागू करने के पद खाली

बिहार में मनरेगा के तहत रिपोर्ट में बताया गया है कि 201924 के दौरान किसी भी बेसलाइन सर्वे के न होने के कारण, विभाग के पास ग्राम पंचायत स्तर पर काम की मांग की मात्रा और समय का आकलन करने, साथ ही आजीविका के तरीकों और काम के अवसरों में किसी भी स्थानीय बदलाव का पता लगाने के लिए कोई सिस्टम नहीं था. इसमें आगे बताया गया है कि बिहार में मनरेगा को लागू करने के लिए मंजूर 13,798 पदों में से 6,086 पद खाली थे.

खाली पदों का यह आंकड़ा डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम ऑफिसर के मामले में 16 फीसदी से लेकर कंप्यूटर ऑपरेटर के लिए 80 फीसदी तक था. रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि मार्च 2024 तक, अलगअलग लागू करने वाली एजेंसियों के पास पांच साल से ज्यादा समय से 36.22 करोड़ रुपए का बिना एडजस्ट किया हुआ एडवांस पैसा पड़ा था.

यहां भी मिली दिक्कत

CAG रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य सरकार ने ‘स्टेट एम्प्लॉयमेंट गारंटी काउंसिल’ की बैठकों की बारंबारता, जगह और प्रक्रिया के बारे में कोई नियम नहीं बनाए थे. ऐसे नियमों के अभाव में, SEGC ने 202123 के दौरान केवल तीन बैठकें कीं, जिससे पता चलता है कि राज्य स्तर पर योजना की निगरानी ठीक से नहीं हो रही थी. जल संसाधन विभाग के तहत तटबंधों के निर्माण, ऊंचाई बढ़ाने और उन्हें मजबूत करने” वाले सेक्शन के तहत रिपोर्ट में कहा गया है कि अधवारा बेसिन के तहत झिम जमुरा और बांके नदियों के किनारे ज़मीन न मिलने के कारण टुकड़ों में तटबंध बनाने से, 5.26 लाख आबादी और 17,400 हेक्टेयर कृषि भूमि की सुरक्षा का जो मकसद था, वह पूरा नहीं हो सका, जिससे 28.97 करोड़ रुपए बेकार चले गए.

हर घर नल का जल योजना

इसी तरह, रिपोर्ट में बताया गया है कि शिक्षा विभाग ने 1995 से 2023 की अवधि के लिए अपनी 161 इमारतों के सर्विस चार्ज का आकलन और भुगतान तय समय के भीतर नहीं किया, जिसके परिणामस्वरूप पेनल्टी ब्याज के तौर पर 8.47 करोड़ रुपए का ऐसा खर्च हुआ जिसे टाला जा सकता था. बिहार में “हर घर नल का जल योजना” को लागू करने पर आई रिपोर्ट में कहा गया है कि शुरुआती सर्वे न होने या ठीक से न होने के कारण, योजना के तहत घरों की पहचान और कवरेज के अनुमान भरोसेमंद नहीं थे.

PHED 46,633 ग्रामीण वार्डों में 11.22 लाख घरों तक सुविधा नहीं पहुंचा सका, जिनमें पानी की गुणवत्ता से प्रभावित वार्डों के 8.07 लाख घर भी शामिल हैं. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि जांच किए गए पांच जन स्वास्थ्य डिवीजनों में, ठेकेदारों को उन कामों के लिए 2.31 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया जो असल में हुए ही नहीं थे. इसके बावजूद, राज्य के उपमुख्यमंत्री, जो राज्य के वित्त और वाणिज्यिक कर मंत्री भी हैं, बिजेंद्र प्रसाद यादव ने फिर से कहा कि राज्य में “फंड की कोई कमी नहीं” है.

यूसी जमा न होने से क्याक्या जोखिम हैं?

कैग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि जब तक किसी योजना का यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट जमा नहीं होता, तब तक निम्नलिखित गंभीर जोखिम बने रहते हैं:

  • फंड की हेरफेर और भ्रष्टाचार: यह पता लगाना बेहद मुश्किल हो जाता है कि जारी किया गया पैसा वास्तव में जमीन पर खर्च हुआ या कागजों पर ही बांट लिया गया.
  • फंड का डायवर्जन: इस बात की प्रबल संभावना रहती है कि जिस काम के लिए बजट मिला था, उसकी जगह पैसा किसी अन्य अनधिकृत मद में लगा दिया गया हो.
  • केंद्र से मिलने वाली मदद पर असर: केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित योजनाओं में समय पर यूसी जमा न करने से केंद्र से मिलने वाली अगली किश्तें रुक सकती हैं, जिससे विकास कार्य ठप हो सकते हैं.

CAG ने क्या सिफारिशें दी हैं?

इस बड़ी प्रशासनिक लापरवाही को दूर करने के लिए सीएजी ने राज्य सरकार को निम्नलिखित कदम उठाने की सलाह दी है:

  • समय सीमा तय हो: सभी लंबित यूसी को निपटाने के लिए एक विशेष अभियान चलाकर सख्त समय सीमा तय की जाए.
  • जवाबदेही तय की जाए: जिन अधिकारियों की लापरवाही के कारण वर्षों से यूसी पेंडिंग हैं, उनके खिलाफ सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की जाए.
  • नए फंड जारी करने पर रोक: जब तक पिछला यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट जमा न हो, तब तक अगली किश्त का आवंटन रोका जाए.
  • डिजिटल मॉनिटरिंग: यूसी ट्रैकिंग को पूरी तरह से डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए ताकि किसी भी स्तर पर पेंडेंसी को तुरंत पकड़ा जा सके.