पाकिस्तान की आर्थिक हालत काफी खस्ता है. देश में कफन और दफन के दाम आसमान पर पहुंच गए हैं. ये बात हम नहीं कह रहे हैं. बीते दिनों में पाकिस्तान से ही ऐसी खबरें छनकर बाहर आई थी. पाक में पेट्रोल और डीजल की कीमतें आसमान पर है. जिसकी वजह से महंगाई का डंक लगातार पड़ोसी देश को सता रहा है. वहीं दूसरी ओर अमेरिका और ईरान के बीच का वॉर किसी अभिशाप से कम साबित नहीं हो रहा. जिसकी वजह से कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है. इन सबके बीच पाकिस्तान को एक बड़ा मौका या यूं कहें जैकपॉट हाथ में लग गया है. जिसकी वजह से पाकिस्तान की पेट्रोलियम की परेशानी लंबे समय तक दूर हो सकती है. साथ ही देश में महंगाई के साथ और दूसरी मुसीबतें भी कम हो सकती है.

वास्तव में कई अरब देश सैन्य साझेदार के तौर पर इस्लामाबाद की ओर देख रहे हैं. सऊदी अरब पहले ही पाकिस्तान के साथ आपसी रक्षा समझौता कर चुका है. कुवैत अब एक बड़े समझौते पर विचार कर रहा है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, बहरीन और जॉर्डन भी रक्षा सहयोग बढ़ाने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं. पाकिस्तान के लिए, इससे लंबे समय के लिए तेल की आपूर्ति, नए निवेश और बड़ी भूराजनीतिक भूमिका हासिल करने की संभावना बनती हुई दिखाई दे रही है. लेकिन हर फायदे की एक कीमत भी होती है. इस्लामाबाद खाड़ी की सुरक्षा व्यवस्था में जितना ज़्यादा शामिल होगा, ईरान की नजर में विरोधी खेमे का हिस्सा माने जाने से बचना उतना ही मुश्किल होगा.
खाड़ी देश पाकिस्तान की ओर क्यों देख रहे हैं?
पाकिस्तान में मौजूदा दिलचस्पी को समझना मुश्किल नहीं है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। खाड़ी के राजशाही वाले देश लगातार अस्थिर होते सुरक्षा माहौल का सामना कर रहे हैं. ईरान के मिसाइल हमलों, ईरानसमर्थित समूहों के हमलों और व्यापक क्षेत्रीय युद्ध के डर ने खाड़ी देशों की सरकारों को अपने रक्षा विकल्पों पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर किया है. पाकिस्तान फायदों का एक अनूठा मेल पेश करता है. उसके पास मुस्लिम दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है. उसके पास युद्ध का अनुभव, एक बड़ी स्थायी सेना, घरेलू डिफेंस प्रोडक्शन कैपेसिटी और आधुनिक लड़ाकू विमानों से लैस वायु सेना है. साथ ही, एक मुस्लिम देश होने के बावजूद अमेरिका के साथ भी उसके अच्छे कामकाजी संबंध हैं.
यह पाकिस्तान को उन देशों के लिए एक आकर्षक सुरक्षा साझेदार बनाता है जो पारंपरिक अमेरिकी सुरक्षा के विकल्प या पूरक की तलाश में हैं. सऊदी अरब ने पिछले साल इस्लामाबाद के साथ आपसी रक्षा समझौता करके पहल की थी. अब कुवैत भी ऐसी ही व्यवस्था में दिलचस्पी दिखा रहा है और खबरों के अनुसार पाकिस्तानी सैनिक, लड़ाकू विमान, ड्रोन, एयर डिफेंस सिस्टम और अन्य सैन्य साजोसामान चाहता है. बातचीत अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन इससे पता चलता है कि खाड़ी देश तेजी से ऐसी सुरक्षा गारंटी चाहते हैं जो पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर न हों.
पाकिस्तान के लिए आर्थिक सहारा
पाकिस्तान के लिए ऐसे समझौतों के फायदे साफ हैं. देश बाहरी फंडिंग के दबाव, फॉरेक्स की कमी कमी और लंबे समय से चली आ रही ऊर्जा असुरक्षा से जूझ रहा है. तेल का आयात उसके बैलेंस ऑफ पेमेंट पर सबसे बड़े बोझ में से एक है. ग्लोबल एनर्जी की कीमतों में हर बढ़ोतरी इस्लामाबाद पर नया दबाव बनाती है.
रक्षा सहयोग एक संभावित समाधान हो सकता है. खाड़ी देशों के पास ठीक वही चीजें हैं जिनकी पाकिस्तान को कमी है तेल, पूंजी और रणनीतिक निवेश की तलाश में सॉवरेन वेल्थ फंड. कुवैत के साथ बातचीत की रिपोर्टों से पता चलता है कि इस्लामाबाद ऊर्जा सहयोग, फ्यूल भंडारण की व्यवस्था और लंबी अवधि की आपूर्ति व्यवस्था में रुचि रखता है. ऐसी व्यवस्थाएं पाकिस्तान को बड़े रणनीतिक भंडार बनाने और आपूर्ति में रुकावट के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती हैं.
सऊदी अरब ने पिछले कुछ वर्षों में कई बार पाकिस्तान को आर्थिक मदद दी है. एक गहरी सुरक्षा साझेदारी बुनियादी ढांचे, ऊर्जा परियोजनाओं, खनन उद्यमों और औद्योगिक विकास में अतिरिक्त निवेश को बढ़ावा दे सकती है. अगर बहरीन, कुवैत और अन्य खाड़ी देश सऊदी मॉडल का पालन करते हैं, तो पाकिस्तान अपनी सैन्य क्षमताओं को आर्थिक ताकत में बदल सकता है. असल में, इस्लामाबाद सुरक्षा गारंटी के बदले ऊर्जा सुरक्षा और निवेश प्रवाह हासिल करने की कोशिश में है. .
मध्यस्थता की समस्या
समस्या यह है कि पाकिस्तान एक ही समय में दूसरी भूमिका निभाने की भी कोशिश कर रहा है. इस्लामाबाद ने खुद को अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ के तौर पर पेश करने की कोशिश की है. उसने बातचीत के रास्ते बनाए रखने और प्रतिस्पर्धी क्षेत्रीय ताकतों के बीच खुद को एक पुल के तौर पर दिखाने में अपनी कूटनीतिक ताकत लगाई है. खाड़ी देशों के साथ रक्षा समझौतों का विस्तार उस रणनीति को मुश्किल बना सकता है. ट्रेनिंग समझौता एक अलग बात है, लेकिन सैनिकों, लड़ाकू विमानों और एयर डिफेंस सिस्टम्स से जुड़ा समझौता बिल्कुल अलग बात है. तेहरान के नजरिए से, रक्षात्मक तैनाती और ईरानविरोधी गठबंधन में शामिल होने के बीच बहुत कम अंतर हो सकता है.
चुनौती तब और बढ़ जाती है जब यह कहा जाता है कि सऊदी अरब पर हमलों को पाकिस्तान पर हमले माना जाएगा. ऐसे बयानों से खाड़ी सहयोगियों के लिए सुरक्षा का भरोसा तो बढ़ता है, लेकिन साथ ही एक निष्पक्ष मध्यस्थ के तौर पर इस्लामाबाद की छवि कमजोर होने का खतरा है. कोई देश हमेशा के लिए मध्यस्थ और सैन्य गारंटर दोनों की भूमिका नहीं निभा सकता. किसी न किसी मोड़ पर, क्षेत्रीय ताकतें उसे एक नजरिए से देखने लगती हैं.
टेढ़ी हो सकती है ईरान की नजर
पाकिस्तान के पॉलिसी मेकर्स यह तर्क दे सकते हैं कि ये समझौते बचाव के मकसद से किए गए हैं. लेकिन ईरान शायद इन्हें इस नजरिए से न देखे. जो खाड़ी देश अभी इस्लामाबाद के साथ रक्षा संबंध मज़बूत कर रहे हैं, उनमें से ज़्यादातर सुन्नी अरब राजशाही वाले देश हैं जो ईरान को अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं. सऊदी अरब, बहरीन और कुवैत, सभी को ईरान के बढ़ते प्रभाव और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को लेकर चिंता है. अगर पाकिस्तान के सैनिक, लड़ाकू विमान और एयर डिफेंस सिस्टम इन देशों की सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं, तो तेहरान के लिए इस व्यवस्था को निष्पक्ष मानना मुश्किल होगा.
यह बात इसलिए भी अहम है क्योंकि पाकिस्तान की ईरान के साथ लंबी सीमा लगती है. सऊदी अरब या कुवैत के उलट, ईरान इस्लामाबाद के लिए कोई दूर का भूराजनीतिक मुद्दा नहीं है. यह एक पड़ोसी देश है जिसके साथ पाकिस्तान को व्यापार, सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मामलों को संभालना होता है. 2024 में, ईरान ने सुन्नी चरमपंथी समूह ‘जैशअलअदल’ को निशाना बनाते हुए पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में मिसाइलें और ड्रोन दागे थे. इसके जवाब में पाकिस्तान ने ईरान के अंदर हमले किए और दावा किया कि उसने आतंकवादियों के ठिकानों को निशाना बनाया है.
हालांकि, यह टकराव तुरंत सुलझा लिया गया. अगर ईरान की मौजूदा सरकार इस टकराव से बच जाती है और कमजोर होने के बावजूद बनी रहती है, तो उसे याद रह सकता है कि संकट के समय कौन से देश उसके प्रतिद्वंद्वियों के करीब आए थे. पाकिस्तान को आने वाले कई सालों तक एक ऐसे ईरान का सामना करना पड़ सकता है जो उस पर ज्यादा शक करता हो और कम सहयोग करता हो.
क्या पाकिस्तान इन जिम्मेदारियों को उठाने की स्थिति में है?
एक और सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान के पास उन सभी उम्मीदों को पूरा करने की क्षमता है जो उससे की जा रही हैं. कुवैत की बताई गई जरूरतों की लिस्ट में हजारों सैनिक, लड़ाकू विमान, ड्रोन और एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं. खाड़ी के कई देशों की ऐसी ही मांगों से पाकिस्तान के सैन्य संसाधनों पर दबाव पड़ सकता है.
पाकिस्तान को अपने देश के भीतर गंभीर सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. उसकी पश्चिमी सीमा अस्थिर बनी हुई है. अफगानिस्तान के साथ सीमा पर घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं. बलूच विद्रोह के कारण सेना का ध्यान और संसाधन लगातार उस तरफ लगाने पड़ते हैं. आतंकवादविरोधी अभियान भी लगातार जरूरी बने हुए हैं. और फिर भारत का मुद्दा है.
पूर्वी सीमा पाकिस्तान की मुख्य सैन्य चिंता बनी हुई है. खाड़ी देशों में चाहे कुछ भी हो, इस्लामाबाद भारत के सामने अपनी सैन्य तैनाती को बहुत ज्यादा कम नहीं कर सकता. सैनिकों या रणनीतिक संसाधनों को विदेश भेजने के किसी भी बड़े फैसले पर इन वास्तविकताओं को ध्यान में रखना होगा. इससे यह तय हो जाता है कि पाकिस्तान असल में कितनी मदद दे सकता है, चाहे आर्थिक फायदे कितने भी आकर्षक क्यों न हों.
पाकिस्तानी सेना पर निर्भरता का लंबा इतिहास
पाकिस्तान में मौजूदा दिलचस्पी कोई नई बात नहीं है. 1947 में बनने के बाद से ही, कई अरब देशों ने सैन्य मदद, ट्रेनिंग और विशेषज्ञता के लिए बारबार पाकिस्तान का रुख किया है. सऊदी अरब इसका सबसे पुराना उदाहरण है. 1960 के दशक से ही पाकिस्तानी अधिकारियों, पायलटों और ट्रेनरों ने सऊदी सैन्य क्षमताएं बढ़ाने में मदद की. दशकों तक औपचारिक रक्षा सहयोग बढ़ता गया और आखिरकार सऊदी अरब में बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती हुई.
जॉर्डन ने भी पाकिस्तानी सैन्य विशेषज्ञता का सहारा लिया. 1967 के अरबइजरायल वॉर के दौरान पाकिस्तानी पायलटों ने अरब सैन्य अभियानों में हिस्सा लिया, जबकि बाद में पाकिस्तानी अधिकारियों ने जॉर्डन की सेना के लिए सलाहकारों के तौर पर काम किया. 1970 के ‘ब्लैक सितंबर’ संकट के दौरान, जियाउलहक के नेतृत्व में पाकिस्तानी सेना ने फिलिस्तीनी उग्रवादियों के खिलाफ जॉर्डन की सरकारी सेना का साथ देने में अहम भूमिका निभाई और हजारों उग्रवादियों को मार गिराया.
संयुक्त अरब अमीरात के बनने से पहले और बाद में, पाकिस्तानी अधिकारियों और पायलटों ने स्थानीय सैन्य संस्थानों को विकसित करने में मदद की. ओमान ने अपनी सेना को आधुनिक बनाने और विद्रोहियों के खतरों से निपटने के दौरान पाकिस्तान से मदद ली. कतर, कुवैत और बहरीन, सभी को अलगअलग समय पर पाकिस्तानी ट्रेनरों, सलाहकारों और सुरक्षा कर्मियों से फायदा हुआ. यहां तक कि मिस्र और सीरिया को भी इजरायल के साथ टकराव के समय पाकिस्तानी पायलटों और सैन्य पेशेवरों से मदद मिली.
अमीर अरब देशों के पास वित्तीय संसाधन तो थे, लेकिन अनुभवी सैन्य जनशक्ति की कमी थी. पाकिस्तान के पास एक बड़ा सैन्य ढांचा था और वह विशेषज्ञता के साथसाथ लड़ाके भी उपलब्ध कराने को तैयार था. इसका नतीजा एक ऐसा रक्षा संबंध रहा जो दशकों से चला आ रहा है और अब एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है.
आगे की रणनीतिक चुनौती
सुरक्षा की तलाश कर रहे इस इलाके में पाकिस्तान की सैन्य अहमियत अचानक बढ़ गई है. खाड़ी संकट इस्लामाबाद को निवेश, ऊर्जा के इंतजाम और ज़्यादा कूटनीतिक प्रभाव हासिल करने का मौका दे रहा है. इलाके में बदलते हालात का फायदा उठाने के लिए बहुत कम देश ही इतनी अच्छी स्थिति में हैं.
लेकिन टकराव से पैदा होने वाले मौकों में शायद ही कभी कोई जोखिम न हो. हर नया रक्षा समझौता पाकिस्तान के आर्थिक विकल्पों को तो बढ़ाता है, लेकिन साथ ही उसके कूटनीतिक दायरे को भी सीमित करता है. वह सऊदी अरब, कुवैत और खाड़ी के दूसरे देशों की सुरक्षा व्यवस्थाओं में जितना ज़्यादा शामिल होता जाएगा, ईरान के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखना उतना ही मुश्किल होता जाएगा.
इस्लामाबाद ने दशकों तक रियाद और तेहरान के बीच बहुत सावधानी से संतुलन बनाए रखा है. खाड़ी में उभरती सुरक्षा व्यवस्था उसे यह तय करने पर मजबूर कर सकती है कि यह संतुलन कब तक बना रह सकता है. पाकिस्तान को इस संकट से तेल, निवेश और रणनीतिक अहमियत मिल सकती है. सवाल यह है कि क्या ये फायदे किसी पड़ोसी को लंबे समय के लिए दुश्मन बनाने की कीमत से ज्यादा होंगे?



