भारत के निर्यात की जब भी बात होती है, तो इंजीनियरिंग सेक्टर की चर्चा कम ही सुनाई देती है. हकीकत ये है कि देश के कुल निर्यात में अकेले इस सेक्टर की हिस्सेदारी 27 से 28 फीसदी है. देश से बाहर भेजे जाने वाले कुल तैयार माल यानी मैन्युफैक्चर्ड गुड्स में इसका हिस्सा करीब 40 फीसदी बैठता है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इसमें स्टील, धातु के सामान, मशीनरी, गाड़ियां, ऑटो पार्ट्स, रक्षा उपकरण से लेकर हवाई जहाज के पुर्जे तक शामिल हैं. किसी एक उद्योग का दबदबा न होने की वजह से ये सेक्टर सुर्खियों से दूर रहता है. लेकिन पिछले एक साल में अमेरिकी प्रशासन के भारीभरकम टैरिफ के बावजूद इसी सेक्टर ने वापसी की सबसे शानदार कहानी लिखी है.

पिछले साल सितंबरअक्टूबर में जब अमेरिका ने 50 फीसदी का अतिरिक्त टैरिफ लगाया था, तब भारतीय इंजीनियरिंग निर्यात में दोहरे अंकों की बड़ी गिरावट आई थी. लेकिन भारतीय कारोबारियों ने बहुत तेजी से हालात संभाले. इस साल अप्रैल से अगस्त के बीच अमेरिका को होने वाला निर्यात 15.5 फीसदी बढ़कर 9.97 अरब डॉलर पर पहुंच गया है. अकेले अगस्त महीने में इसमें 31 फीसदी का उछाल आया.
अमेरिकी सप्लाई चेन में भारतीय कंपनियों की मजबूत पकड़
स्टील व एल्युमीनियम उत्पादों पर 50 फीसदी का टैक्स भी भारतीय निर्यात की रफ्तार को रोक नहीं पाया. स्टील फोर्जिंग के निर्यातक अविनाश गुप्ता बताते हैं कि ये 50 फीसदी शुल्क सभी देशों पर लागू है. ऐसे में अमेरिकी खरीदारों के पास इसे स्वीकार करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है. इससे उनकी खरीदने की क्षमता में बस मामूली अंतर आया है.
कोरोना स्टील के मैनेजिंग डायरेक्टर व इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष अरुण कुमार गड़ोदिया के मुताबिक, जो कंपनियां एक बार अमेरिकी सप्लाई चेन में जगह बना लेती हैं, उन्हें तुरंत बदलना आसान नहीं होता. जब तक कोई दूसरा देश बहुत सस्ते दाम पर माल न दे, तब तक ग्राहक अपना सप्लायर नहीं बदलते. इसकी वजह ये है कि नए सिरे से सप्लाई सिस्टम व लॉजिस्टिक्स खड़ा करना बेहद मुश्किल काम है. अमेरिकी ट्रेड एक्सपेंशन एक्ट 1962 की धारा 232 के तहत ऑटो पार्ट्स व तांबे के उत्पादों पर भी 50 फीसदी टैरिफ लगा है, लेकिन वहां भारतीय सामानों की मांग में कोई कमी नहीं आई है.
बाजार बचाने के लिए कारोबारियों ने उठाया नुकसान
इस कामयाबी के पीछे भारतीय सप्लायर्स व अमेरिकी ग्राहकों की आपसी समझदारी का बड़ा हाथ रहा. दोनों पक्षों ने मुनाफे में अस्थायी नुकसान सहकर भी कारोबार जारी रखा. EEPC के चेयरमैन व ज्योति स्टील इंडस्ट्रीज के मैनेजिंग पार्टनर पंकज चड्ढा का कहना है कि अमेरिका से लगातार मांग आ रही है. पिछले पांच महीनों की ये तेजी आगे भी जारी रहने की उम्मीद है. अगस्त 2025 के आखिर से फरवरी 2026 की शुरुआत तक जब 50 फीसदी टैरिफ लागू रहा, तब भारतीय निर्यातकों ने अपना बाजार बचाने के लिए डिस्काउंट पर भी माल भेजा.
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशंस के अध्यक्ष व श्री टूल्स के एमडी एस सी रल्हन बताते हैं कि कई भारतीय कारोबारियों ने अमेरिकी खरीदारों के साथ मिलकर 50 फीसदी टैरिफ का बोझ आपस में बांटा. कुछ मामलों में तो अमेरिकी सप्लाई चेन में बने रहने के लिए घाटे में भी सामान भेजा गया. अब जब अमेरिका में इन टैरिफ के रिफंड की प्रक्रिया शुरू हो गई है, तो भारतीय निर्यातकों को उम्मीद है कि अमेरिकी आयातक वादे के मुताबिक रिफंड का हिस्सा उन्हें देंगे. हालांकि रिफंड मिलने की ये प्रक्रिया अभी काफी धीमी है.
चीन से लेकर यूरोप तक नए बाजारों में विस्तार
सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि दुनिया के दूसरे बाजारों में कदम फैलाने से भी इस सेक्टर को बड़ा सहारा मिला है. इंजीनियरिंग सेक्टर का कुल वैश्विक निर्यात 4.9 फीसदी बढ़कर 122.43 अरब डॉलर पर पहुंच गया है. वित्त वर्ष 202526 के दौरान चीन के बाजार में भारतीय निर्यात 32.4 फीसदी, ब्रिटेन में 18.2 फीसदी, इटली में 16 फीसदी व जर्मनी में 14.6 फीसदी बढ़ा है. इसके अलावा कोरिया, जापान, ब्राजील व नीदरलैंड में भी दोहरे अंकों की ग्रोथ दर्ज की गई है.
भारतीय कारोबारी अब यूरोप, ब्रिटेन व कनाडा के बाजारों में अपनी पैठ बढ़ा रहे हैं. स्टील उत्पादों के लिए भारत को यूरोपीय संघ से 19 लाख टन का विशेष कोटा मिला है. इस सीमा के अंदर भेजे जाने वाले माल पर जीरो ड्यूटी लगती है, जबकि इससे ज्यादा निर्यात होने पर 50 फीसदी टैरिफ देना पड़ता है.



