M&A Funding: जब कोई एक कंपनी किसी दूसरी कंपनी को खरीदती है, तो उसे भारीभरकम रकम की जरूरत पड़ती है. लंबे समय तक भारतीय कंपनियों को ऐसे सौदों के लिए विदेशी बैंकों या प्राइवेट फंड्स के भरोसे रहना पड़ता था. इसकी वजह ये थी कि भारतीय बैंकों पर इस तरह का कर्ज देने को लेकर कड़ी पाबंदियां थीं. लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. भारतीय रिजर्व बैंक ने 1 जुलाई से टेकओवर फाइनेंसिंग के नियमों में ढील दी थी. इस बदलाव के बाद से अबतक देसी बैंकों ने कंपनियों के विलय व खरीदफरोख्त से जुड़े करीब एक दर्जन सौदों के लिए 10,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की फंडिंग कर दी है.

दरअसल, अलगअलग सेक्टरों में इस तरह के कर्ज की मांग तेजी से बढ़ रही है. नए नियमों के तहत अब भारतीय बैंक किसी भी कंपनी को खरीदने के लिए उस डील की स्वतंत्र रूप से आंकी गई कीमत का 75 फीसदी तक कर्ज दे सकते हैं. ये सुविधा शेयर बाजार में लिस्टेड के साथसाथ गैरलिस्टेड कंपनियों को खरीदने के लिए भी मिल रही है. हालांकि, इसके लिए कर्ज लेने वाली कंपनी की योग्यता, उस पर पहले से मौजूद कर्ज का बोझ व जोखिम संभालने की क्षमता से जुड़ी शर्तों को पूरा करना जरूरी है.
SBI सबसे आगे, प्राइवेट बैंक भी मैदान में उतरे
इस नए कारोबार में देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया सबसे आगे निकलकर उभरा है. मार्केट वैल्यू के लिहाज से सबसेस बड़ी सरकारी संस्था एसबीआई ने अकेले ही करीब एक दर्जन सौदों में हाथ डाला है. इनमें से कई सौदे पूरे हो चुके हैं, जबकि कुछ अलगअलग चरणों में चल रहे हैं.
सिर्फ एसबीआई ही नहीं, बल्कि देश के बड़े प्राइवेट बैंकों ने भी हाल के महीनों में टेकओवर फंडिंग के सौदों में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया है. इनमें एचडीएफसी बैंक , कोटक महिंद्रा बैंक , आईसीआईसीआई बैंक , एक्सिस बैंक व आरबीएल बैंक शामिल हैं. ये देसी बैंक अब एचएसबीसी , सिटीबैंक , एमयूएफजी व बार्कलेज जैसे विदेशी बैंकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं.
2 लाख करोड़ रुपए के बाजार पर देसी बैंकों की नजर
भारतीय बैंकों के लिए ये नया बिजनेस कर्ज बांटने का एक बहुत बड़ा मौका लेकर आया है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक, भारत में कंपनी खरीदने के लिए फंडिंग देने का ये बाजार करीब 2 लाख करोड़ रुपए का हो सकता है. पिछले तीन सालों के आंकड़े देखें, तो भारत में हर साल औसतन 50 अरब डॉलर के बराबर M&A डील्स हुई हैं.
पहले भारतीय बैंकों पर पाबंदी होने के कारण इस बड़े बाजार का ज्यादातर फायदा विदेशी बैंक, प्राइवेट क्रेडिट फंड्स उठा ले जाते थे या फिर कंपनियों को अपनी जेब से पैसा लगाना पड़ता था. कोटक महिंद्रा बैंक में कॉर्पोरेट व ट्रांजैक्शन बैंकिंग की प्रमुख अनु अग्रवाल के मुताबिक, जुलाई के बाद से इस फंडिंग की मांग ने जोर पकड़ा है. अलगअलग बैंकों के साथ मिलकर एक दर्जन से ज्यादा सौदे पूरे किए जा चुके हैं. उन्होंने बताया कि सौदे के आकार को देखते हुए कोटक बैंक या तो अपनी बैलेंस शीट से पूरा पैसा खुद देता है, या फिर उसकी जिम्मेदारी लेकर दूसरे बैंकों के साथ मिलकर फंड जुटाता है.
क्रिस्टल क्रॉप से लेकर वारी तक हुए ये बड़े सौदे
बैंकों की मदद से हाल ही में कई बड़े कॉर्पोरेट सौदे पूरे हुए हैं. इनमें सबसे प्रमुख डील क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन की है, जिसने 2,268 करोड़ रुपए में एफएमसी कॉर्पोरेशन के भारत स्थित कारोबार को खरीदा है. इसके अलावा वारी रिन्यूएबल टेक्नोलॉजीज ने एसोसिएटेड पावर स्ट्रक्चर्स में 55 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के लिए 1,225 करोड़ रुपए की डील की है, जिसमें बैंकों ने फंडिंग दी है.
इसी तरह टाटा ऑटोकॉम्प सिस्टम्स से जुड़ी खरीदारी के लिए भी बैंकों ने पैसा दिया है. सूत्रों के मुताबिक, राशि पेरिफेरल्स , बीडीआर फार्मास्यूटिकल्स , नोवार्टिस , एक्शन कंस्ट्रक्शन व जेनेक्स हेल्थकेयर से जुड़े सौदों में भी फंडिंग के मौके सामने आए हैं.
सिर्फ ब्याज से ही नहीं, फीस से भी हो रही मोटी कमाई
प्राइवेट बैंकों ने इस मौके को भुनाने के लिए अपनी इन्वेस्टमेंट बैंकिंग टीमों को भी काम पर लगा दिया है. इससे बैंकों को सिर्फ लोन के ब्याज से ही नहीं, बल्कि अलगअलग सेवाओं की फीस से भी कमाई का रास्ता मिल गया है.
कोटक बैंक की अनु अग्रवाल बताती हैं कि कंपनी खरीदने या बेचने से जुड़ा हर सलाहकार का काम बैंक के लिए फंडिंग का एक मौका होता है. जब बैंक किसी डील के लिए लोन देते हैं, तो साथ में कई दूसरे बिजनेस भी अपने आप मिल जाते हैं. उदाहरण के लिए, फंडिंग का पैसा सुरक्षित रखने के लिए एस्क्रो अकाउंट खोलना, शेयरों के लेनदेन के लिए डीमैट सर्विस देना व विदेशी मुद्रा का काम शामिल है. खासकर जब किसी डील में विदेशी कंपनियां या प्राइवेट इक्विटी निवेशक खरीदार या विक्रेता के तौर पर शामिल होते हैं, तो बैंकों को फॉरेक्स सर्विस से काफी अच्छा कारोबार मिल जाता है.



